🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)

📝 अध्याय: कृषि की परिभाषा एवं संक्षिप्त इतिहास
यह नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, JET Agriculture, MHT CET, ICAR, SSC, UPSC, और RRB NTPC जैसी सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसे सरल, आकर्षक और परीक्षा उपयोगी (Exam-Oriented) बनाया गया है।
🔍 1. कृषि की परिभाषा (Definition of Agriculture)
- शब्द की उत्पत्ति: अंग्रेजी शब्द Agriculture लैटिन भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है:
- Ager: भूमि या मृदा (Soil)
- Cultura: खेत जोतना या खेती करना (Cultivate)
- आधुनिक परिभाषा: पृथ्वी के संसाधनों (भूमि, जल, प्रकाश) के इष्टतम उपयोग द्वारा मानव समुदाय के लिए भोजन, वस्त्र के लिए रेशा और जलावन का उत्पादन करना ही कृषि है।
💡 कृषि के 5 "F" उद्देश्य (5 F's of Agriculture)
कृषि का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजी के "F" अक्षर से शुरू होने वाली 5 चीज़ों की प्राप्ति है:
- 🌾 Food (भोजन)
- 🌾 Feed (दाना - पशुओं के लिए)
- 🍀 Fodder (चारा)
- 🧵 Fibre (रेशा - कपड़ों के लिए)
- 🪵 Fuel (जलावन/ईंधन)
💡 Tip-Trick: याद रखने की ट्रिक – "पशु और इंसान खाएंगे (Food, Feed, Fodder), कपड़े पहनेंगे (Fibre) और खाना पकाएंगे (Fuel)!"
- कृषि के अंग: केवल फसल उगाना ही कृषि नहीं है। इसमें पशुपालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, रेशम कीट पालन, लाख कीट पालन और केंचुआ पालन (Vermiculture) भी शामिल हैं।
⏳ 2. कृषि का संक्षिप्त इतिहास (Brief History of Agriculture)
कृषि का इतिहास मानव सभ्यता (Homosapiens) के विकास से जुड़ा है। इसे 4 मुख्य कालों में विभाजित किया गया है:
❶ प्राक् वैदिक काल (Pre-Vedic Period)
- 10,000 ईसा पूर्व (B.C.): मनुष्य केवल शिकार और फल-मूल संग्रह पर निर्भर था।
- 8,700 - 7,500 ईसा पूर्व: मनुष्य ने सबसे पहले भेड़ और बकरी पालन शुरू किया (यही कृषि की वास्तविक शुरुआत थी)।
- 7,500 ईसा पूर्व: गेहूँ एवं जौ की खेती के प्रथम साक्ष्य मिले।
- 6,000 ईसा पूर्व: गाय, भैंस और सूकर जैसे दुग्ध व मांस प्रदायी पशुओं को पालतू बनाया गया।
- 4,400 ईसा पूर्व: मक्का की खेती शुरू हुई।
- 3,500 ईसा पूर्व: आलू की खेती का प्रारम्भ।
- 3,000 ईसा पूर्व: पहला हल बनाया गया (कृषि क्षेत्र का पहला क्रांतिकारी आविष्कार)।
- 2,300 ईसा पूर्व: चना, सरसों एवं कपास की खेती की शुरुआत।
- 2,200 ईसा पूर्व: धान (चावल) की खेती भारतवर्ष में शुरू हुई।
❷ वैदिक काल (Vedic Period)
- फसलों का विस्तार: इस काल में मडुवा (Ragi), ज्वार और ईख (गन्ना) की खेती शुरू हुई।
- 🌟 सबसे बड़ी देन (1,400 ईसा पूर्व): लोहे की खोज! इससे पहले कांसे के उपकरण बनते थे। लोहे के फार, खुरपी और कुदाल बनने से खेती आसान हुई।
- 1,500 ईसा पूर्व: सिंचाई (Irrigation) की शुरुआत हुई, जिससे फसलों का उत्पादन कई गुना बढ़ गया।
❸ उत्तर वैदिक काल (Post-Vedic Period)
- इस काल में कृषि समाज की रीढ़ (मेरुदंड) बन गई।
- सिन्धु घाटी सभ्यता (3000 - 1750 ईसा पूर्व): हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से पता चला कि लोग गेहूँ, जौ, तिल, मटर, कपास की खेती करते थे और उन्हें रूई से बिनौला निकालने (Ginning) व धागा बनाने (Spinning) का ज्ञान था।
- कृषि में देसी व विदेशी योगदान:
- भारत की विश्व को देन: धान (चावल), गन्ना, दलहनी फसलें और फलों का राजा आम।
- पुर्तगालियों की भारत को देन (लगभग 500 वर्ष पहले): आलू, टमाटर, मिर्च, पपीता, शकरकंद, मूंगफली, तंबाकू, रबड़, अमरूद, अनानास, शरीफा, काजू और अनार।
- पारंपरिक सिंचाई के साधन: इसी काल में लाठा-कूड़ी, मोठ और रहट का विकास हुआ। पौधों के पोषण के लिए गोबर की खाद का प्रयोग भी शुरू हुआ।
❹ आधुनिक कृषि का इतिहास (Modern Agriculture)
आधुनिक कृषि मुख्य रूप से पादप पोषण (Plant Nutrition), उन्नत बीजों और रसायनों पर आधारित है।
| वैज्ञानिक का नाम | समय / वर्ष | मुख्य योगदान / आविष्कार |
|---|---|---|
| वैन हेलमॉन्ट | 1577 - 1644 ई0 | बताया कि वनस्पति का मुख्य आधार जल है। |
| जेथरो टूल (Jethro Tull) | 1674 - 1741 ई0 | पुस्तक लिखी: "Horse hoeing husbandry"। सीड ड्रिल (Seed Drill) और घोड़ा चालित कल्टीवेटर बनाया। |
| जस्ट्स वॉन लीबिग | 1840 | कृषि रसायन (Agricultural Chemistry) के जनक। बताया कि पौधे मिट्टी से रसायन भोजन के रूप में लेते हैं। |
| सर जॉन बेनेट लावेज | 1842 | रॉक फॉस्फेट से सुपर फॉस्फेट (प्रथम रासायनिक उर्वरक) बनाने का पेटेंट कराया। |
🚀 3. कृषि में युगांतरकारी क्रांतियाँ एवं प्रणालियाँ
🌱 हरित क्रांति (Green Revolution)
- बौनी प्रजातियों की खोज: गेहूँ में नॉरीन-10 (Norin-10) और धान में डी० जी० वु० जेन (Dee Gee Woo Gen) नामक बौने जीन वाले पौधों की खोज हुई।
- संकरण (Hybridization): इसके द्वारा दो अलग-अलग पौधों के अच्छे गुणों (जैसे उच्च उपज + रोग प्रतिरोधकता) को एक ही पौधे में मिलाया गया।
- परिणाम: 1960 और 1970 के दशक में भारत इन बौनी और उच्च उपज वाली किस्मों के कारण खाद्यान्न संकट (भुखमरी) से उबरकर एक निर्यातक देश बन गया।
🚜 कृषि यांत्रिकीकरण (Farm Mechanization)
- 1785 में रॉबर्ट रैनसम् ने ढलुआ लोहे (Cast Iron) का फार बनाया।
- 1830 में पहला कारगर बोआई-यंत्र (Seed Drill) बना।
- 1892 ई०: संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) में पहला सफल ट्रैक्टर बना, जिसने कृषि की दुनिया बदल दी।
💰 4. कृषि अर्थशास्त्र एवं आधुनिक पद्धतियाँ (Agricultural Economics)
- झूम या स्थानांतरित कृषि (Shifting/Jhoom Cultivation): जब लोग एक स्थान की उर्वरता समाप्त होने पर दूसरे स्थान पर जाकर जंगल साफ कर खेती करते हैं। आज भी यह असम की पहाड़ियों में प्रचलित है।
- जीवन यापन कृषि (Subsistence Farming): जब किसान केवल अपने परिवार की जरूरतों (अनाज, दाल, सब्जी) को पूरा करने के लिए खेती करता है।
- व्यावसायिक / नकदी फसलें (Cash Crops): बीसवीं सदी में व्यावसायिक कृषि शुरू हुई। गन्ना, आलू, तम्बाकू, और पाट (जूट) जैसी फसलें जो कटते ही बिककर तुरंत आमदनी देती हैं, नकदी फसलें कहलाती हैं।
- मिश्रित कृषि प्रणाली (Farming System): खेती के साथ-साथ पशुपालन, मुर्गीपालन, मछली पालन और मधुमक्खी पालन एक साथ करना। इससे एक का उप-उत्पाद (Byproduct) दूसरे के काम आता है और किसानों को साल भर रोजगार मिलता है।
- आधुनिक टिकाऊ पद्धतियाँ: मिट्टी की गिरती सेहत को बचाने के लिए आज इन पर जोर दिया जा रहा है:
- जैविक खेती (Organic Farming)
- टिकाऊ खेती (Sustainable Agriculture)
- समेकित पोषक तत्व प्रबंधन (Integrated Nutrient Management - INM)
- समेकित कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management - IPM)
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे प्रश्न)
- ❓ Agriculture किस भाषा का शब्द है? ➡️ लैटिन भाषा (Ager + Cultura)।
- ❓ कृषि के 5 उद्देश्य कौन से हैं? ➡️ Food, Feed, Fodder, Fibre, Fuel।
- ❓ मानव ने सबसे पहले किस पशु को पाला? ➡️ भेड़ और बकरी (8700-7500 ईसा पूर्व)।
- ❓ विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन क्या है? ➡️ धान (चावल), गन्ना और आम।
- ❓ आलू, टमाटर, मिर्च भारत में कौन लेकर आया? ➡️ पुर्तगाली व्यापारी (500 वर्ष पहले)।
- ❓ कृषि में लोहे की खोज किस काल में हुई? ➡️ वैदिक काल में (1400 ईसा पूर्व)।
- ❓ "Horse hoeing husbandry" पुस्तक के लेखक कौन हैं? ➡️ जेथरो टूल (Jethro Tull)।
- ❓ धान की बौनी किस्म के लिए जिम्मेदार जीन कौन सा है? ➡️ डी० जी० वु० जेन (Dee Gee Woo Gen)।
- ❓ विश्व में पहला ट्रैक्टर कब और कहाँ बना? ➡️ 1892 ई० में, संयुक्त राज्य अमेरिका (U.S.A.) में।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
कृषि मानव इतिहास की सबसे पुरानी और निरंतर विकसित होने वाली विधा है। आदिमानव के शिकार युग से शुरू होकर आज यह जैव-प्रौद्योगिकी (Genetics), रासायनिक उर्वरकों और ट्रैक्टर-मशीनरी के आधुनिक युग तक पहुँच चुकी है। बढ़ती जनसंख्या और घटती कृषि योग्य भूमि के कारण आज टिकाऊ खेती (Sustainable Agriculture) और जैविक खेती ही भविष्य की असली जरूरत हैं।
🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)
📝 अध्याय 1.2: कृषि विज्ञान के विविध विषय (Branches of Agricultural Science)
यह संक्षिप्त और सरल नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, JET Agriculture, MHT CET, ICAR, SSC, UPSC, और RRB NTPC जैसी परीक्षाओं को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं।
🔬 कृषि विज्ञान: एक परिचय (Introduction)
आधुनिक कृषि विज्ञान केवल खेती करने तक सीमित नहीं है। यह मौलिक विज्ञान (Basic Sciences) और सामाजिक विज्ञान (Social Sciences) के मूलभूत सिद्धांतों का एक सुंदर समायोजन है। मुख्य रूप से इसके अंतर्गत निम्नलिखित 10 प्रमुख विषयों का अध्ययन किया जाता है:
📂 कृषि विज्ञान की 10 प्रमुख शाखाएँ (10 Main Branches)
1. 🌱 शस्य विज्ञान (Agronomy)
- उत्पत्ति: यह ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है:
- Agros (एग्रोस): खेत या भूमि
- Nomos (नोमोस): प्रबंधन करना
- परिभाषा: कृषि विज्ञान की वह शाखा जिसमें फसल उत्पादन (Crop Production) तथा भूमि प्रबंधन (Field Management) के सिद्धांतों और कृषि क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है।
- मुख्य अंग: खर-पतवार प्रबंधन, जल प्रबंधन (सिंचाई एवं जल निकास), प्रमुख फसलों का उत्पादन, और पोषक तत्व प्रबंधन।
- विशेष नोट: शस्य विज्ञान कृषि के सभी विभागों के अनुसंधानों के बीच एक समन्वयक (Coordinator) का कार्य करता है।
⏳ 2. 🪱 मृदा विज्ञान (Soil Science)
- परिभाषा: इसके अंतर्गत मिट्टी के भौतिक, रासायनिक और जैविक आयामों का विस्तृत अध्ययन किया जाता है।
- अध्ययन क्षेत्र: मिट्टी का निर्माण, मिट्टी के गुण, रासायनिक विश्लेषण और समस्याग्रस्त मिट्टियों (जैसे अम्लीय या क्षारीय मृदा) का सुधार।
- महत्व: मिट्टी अपने जैविक गुणों के कारण ही जीवंत (Alive) है। इसकी उर्वरता (Fertility) पर ही पूरी कृषि का भविष्य टिका है।
🧬 3. पादप प्रजनन एवं अनुवंशिकी (Plant Breeding & Genetics)
- परिभाषा: यह वनस्पति विज्ञान (Botany) का कृषि में व्यावहारिक समायोजन है।
- मुख्य कार्य: विभिन्न फसलों की नई-नई और उन्नत किस्मों (Varieties) का विकास करना।
- उद्देश्य: फसलों की आकृति में सुधार, अधिक उपज, कीट-प्रतिरोधी तथा सूखा/बाढ़ (जीवीय व अजीविय प्रभाव) सहिष्णु किस्में बनाना।
- आधुनिक विधाएँ: अब इसमें बायोटेक्नोलॉजी (Biotechnology) और जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी आधुनिक तकनीकें भी शामिल हो चुकी हैं।
🍎 4. उद्यान विज्ञान / बागवानी (Horticulture)
- परिभाषा: इस शाखा में उद्यानिकी फसलों जैसे—फल, सब्जी, फूल, औषधीय एवं सुगंधित पौधों के उत्पादन का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है।
- आधुनिक क्षेत्र: सिमटती जा रही कृषि भूमि के कारण आजकल नेट/पॉली हाउस, ग्रीन हाउस में अत्याधुनिक खेती और शहरी/छत पर बागवानी (Roof Gardening) इसके नए उभरते क्षेत्र हैं।
🐛 5. कीट विज्ञान (Entomology)
- परिभाषा: यह जंतु विज्ञान की ही एक शाखा है, जो फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले और लाभ पहुँचाने वाले कीटों का अध्ययन करती है।
- दो मुख्य पहलू:
- हानिकारक कीट: फसलों को क्षति पहुँचाने वाले कीटों की पहचान और उनका नियंत्रण (कीट प्रबंधन)।
- लाभदायक कीट: मधुमक्खी पालन (Apiculture), रेशम कीट पालन (Sericulture) और लाह कीटों के उत्पादन की तकनीक।
🧫 6. पौधा रोग विज्ञान (Plant Pathology)
- परिभाषा: फफूंद (Fungi), जीवाणु (Bacteria), विषाणु (Virus) तथा पोषक तत्वों की कमी से पौधों में होने वाली बीमारियों के कारणों एवं उनके समाधान का अध्ययन।
- लाभदायक जीव: इसमें बीमारियों को नियंत्रित करने वाले और मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता सुनिश्चित करने वाले मित्र-जीवों का भी अध्ययन किया जाता है।
📢 7. प्रसार शिक्षा (Agricultural Extension)
- परिभाषा: प्रयोगशाला या कृषि संस्थानों में विकसित की गई नई तकनीकों और शोध को किसानों तक सरल और सटीक संवाद के माध्यम से पहुँचाने का विज्ञान।
- मुख्य उद्देश्य: जन सहभागिता के द्वारा कृषि तकनीकों का प्रचार-प्रसार करना ताकि किसान आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बन सकें।
📊 8. कृषि अर्थशास्त्र (Agricultural Economics)
- परिभाषा: अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का कृषि क्षेत्र में समायोजन कर लाभकारी खेती की योजना बनाना।
- अध्ययन क्षेत्र: लागत मूल्य का निर्धारण, संसाधनों का सही उपयोग, बाजार व्यवस्था, कृषि ऋण (Loan), मजदूर और सहकारिता।
- प्रक्षेत्र प्रबंधन (Farm Management): यह कृषि अर्थशास्त्र की ही एक विशिष्ट शाखा है, जो खेती को एक 'उद्योग' या बिजनेस के रूप में संचालित करना सिखाती है।
⚙️ 9. कृषि अभियंत्रण (Agricultural Engineering)
- परिभाषा: यह व्यावहारिक भौतिक विज्ञान (Applied Physics) की शाखा है, जो कृषि यंत्रों और मशीनों से संबंधित है।
- कार्यक्षेत्र: आधुनिक कृषि यंत्रों की खोज, सिंचाई एवं जल निकास की प्रणालियाँ और भू-संरक्षण (Soil Conservation)।
- महत्व: मानव श्रम की कमी को दूर करने, समय पर खेती करने और शून्य कर्षण (Zero Tillage) जैसी आधुनिक खेती को बढ़ावा देने में इसकी मुख्य भूमिका है।
📈 10. कृषि सांख्यिकी (Agricultural Statistics)
- परिभाषा: इसे "आँकड़ों का विज्ञान" भी कहा जाता है। यह व्यावहारिक गणित की एक शाखा है।
- कार्य: कृषि अनुसंधानों और परीक्षणों से प्राप्त आँकड़ों को एकत्र करना, वर्गीकृत करना, विश्लेषण (Analyze) करना और सही निष्कर्ष निकालना।
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे पूछे जाने वाले प्रश्न)
- ❓ Agronomy शब्द किस भाषा से लिया गया है? ➡️ ग्रीक भाषा (Agros + Nomos)।
- ❓ "भूमि प्रबंधन" किस विषय का शाब्दिक अर्थ है? ➡️ शस्य विज्ञान (Agronomy)।
- ❓ किस्मों के विकास के लिए बायोटेक्नोलॉजी का उपयोग किस शाखा में होता है? ➡️ पादप प्रजनन एवं अनुवंशिकी।
- ❓ फल, फूल और सब्जियों का अध्ययन क्या कहलाता है? ➡️ उद्यान विज्ञान (Horticulture)।
- ❓ मधुमक्खी और रेशम कीट का अध्ययन कृषि की किस शाखा में किया जाता है? ➡️ कीट विज्ञान (Entomology)।
- ❓ "आँकड़ों का विज्ञान" किसे कहा जाता है? ➡️ कृषि सांख्यिकी (Agricultural Statistics)।
- ❓ कृषि शोध (Agricultural Research) का समन्वयक (Coordinator) कौन सा विषय है? ➡️ शस्य विज्ञान (Agronomy)।
💡 Tip-Trick (याद रखने का आसान तरीका)
- Agro = Field (खेत) ➡️ Agronomy (खेत का प्रबंधन)
- Soil = मिट्टी ➡️ Soil Science (मिट्टी की भौतिक-रासायनिक सेहत)
- Hortus = Garden (बाग़) ➡️ Horticulture (फल-सब्जी-फूल)
- Pathos = Disease (रोग) ➡️ Plant Pathology (पौधों के रोग)
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
आधुनिक कृषि विज्ञान कई विषयों का एक गुलदस्ता है। जहाँ शस्य विज्ञान और मृदा विज्ञान पौधों को उगाने और पोषण देने का आधार तैयार करते हैं, वहीं कीट व रोग विज्ञान उनकी सुरक्षा करते हैं। अभियंत्रण और अर्थशास्त्र खेती को सुगम व मुनाफ़े का सौदा बनाते हैं, और अंततः प्रसार शिक्षा इन सभी जानकारियों को सीधे किसान के खेत तक पहुँचाती है। इन सभी विषयों के संतुलित विकास से ही देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)
📝 अध्याय 1.3: भारत में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय कृषि संस्थान (National & International Agricultural Institutes)
यह विशेष नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, JET Agriculture, MHT CET, ICAR, SSC, UPSC, और RRB NTPC जैसी सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण (Most Important) भाग है। इसे याद रखने में आसान और परीक्षा-उपयोगी बनाया गया है।
⏳ 1. भारत में कृषि अनुसंधान का संक्षिप्त इतिहास (Historical Background)
- प्राचीन साक्ष्य: भारतीय संस्कृति में कृषि का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। ऋग्वेद में बैल द्वारा चालित लकड़ी के हल से खेत जोतकर बोए गए बीज और उससे उत्पन्न अन्न को "सस्य" कहा गया है।
- 1880: भुखमरी आयोग (Famine Commission) की अनुशंसा पर कृषि विभाग का गठन हुआ।
- 1890: रॉयल कमीशन ऑन एग्रीकल्चर के सलाहकार डॉ० जे.ए. वोयलकर ने भारत में आधुनिक कृषि अनुसंधान की नींव रखी।
- 1905-1908: देश में भुखमरी से निपटने और कृषि शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 6 प्रथम कृषि महाविद्यालय खोले गए:
- सबौर (बिहार)
- कानपुर (उत्तर प्रदेश)
- नागपुर (महाराष्ट्र)
- कोयम्बटूर (तमिलनाडु)
- पुणे (महाराष्ट्र)
- लायलपुर (अब पश्चिम पाकिस्तान में)
🏛️ 2. भारत के दो सबसे बड़े कृषि संगठन (IARI एवं ICAR)
❶ IARI: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Indian Agricultural Research Institute)
- स्थापना: 1905 में पूसा, समस्तीपुर (बिहार) में देश का पहला कृषि अनुसंधान संस्थान स्थापित हुआ।
- स्थानांतरण: 1934 में बिहार के भयंकर भूकंप में इस संस्थान की इमारत क्षतिग्रस्त हो गई। इसके बाद 1936 में इसे नई दिल्ली (पूसा रोड) में पुनः स्थापित किया गया। आजादी के बाद इसे IARI नाम दिया गया।
❷ ICAR: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research)
- स्थापना: रॉयल कमीशन की अनुशंसा पर 16 जुलाई, 1929 को इम्पीरियल कौन्सिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के नाम से हुई। आजादी के बाद इसका नाम इण्डियन कौन्सिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (ICAR) पड़ा।
- मुख्यालय: नई दिल्ली।
- कार्य: पूरे देश में कृषि शिक्षा, अनुसंधान और प्रसार कार्यों (Extension) के लिए नीति निर्धारण, बुनियादी ढांचे का विकास और आर्थिक सहयोग की जिम्मेदारी इसकी है।
- नेटवर्क: इसके नियंत्रण में 48 राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान, 5 डीम्ड विश्वविद्यालय, 33 केंद्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र, 24 कृषि अनुसंधान संस्थान, 91 अखिल भारतीय समन्वित परियोजनाएं और 630 से अधिक कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) कार्यरत हैं।
🎓 3. बिहार के प्रमुख कृषि विश्वविद्यालय (BSEB / BPSC स्पेशल)
| विश्वविद्यालय का नाम | स्थापना वर्ष | स्थान / राज्य |
|---|---|---|
| राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय (RAU) | 1970 | पूसा, समस्तीपुर (बिहार) |
| बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) | 2010 | सबौर, भागलपुर (बिहार) |
📍 4. भारत के प्रमुख राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान / ब्यूरो (National Institutes)
परीक्षाओं में इनके संक्षिप्त नाम (Abbreviation) और स्थान सीधे पूछे जाते हैं:
- IARI – इण्डियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीट्यूट ➡️ नई दिल्ली
- NDRI – नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट ➡️ करनाल (हरियाणा)
- IVRI – इण्डियन वेटनरी (पशु चिकित्सा) रिसर्च इंस्टीट्यूट ➡️ इज्जतनगर (उत्तर प्रदेश)
- NAARM – नेशनल एकेडमी फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च एण्ड मैनेजमेंट ➡️ हैदराबाद (आंध्र प्रदेश)
- NBPGR – नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सेज ➡️ नई दिल्ली
- NBSSLUP – नेशनल ब्यूरो ऑफ स्वायल सर्वे एण्ड लैण्ड यूज प्लानिंग ➡️ नागपुर (महाराष्ट्र)
- NRCL – नेशनल रिसर्च सेन्टर फॉर लीची ➡️ मुजफ्फरपुर (बिहार) (BSEB स्पेशल)
- NRCC – नेशनल रिसर्च सेन्टर ऑन कैमल (ऊँट) ➡️ बीकानेर (राजस्थान)
- NSI – नेशनल सुगर (चीनी) इंस्टीट्यूट ➡️ कानपुर (उत्तर प्रदेश)
🏢 5. प्रमुख केंद्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Central Institutes)
- CAZRI – सेन्ट्रल एरिड जोन (शुष्क क्षेत्र) रिसर्च इंस्टीट्यूट ➡️ जोधपुर (राजस्थान)
- CPRI – सेन्ट्रल पोटैटो (आलू) रिसर्च इंस्टीट्यूट ➡️ शिमला (हिमाचल प्रदेश)
- CRRI – सेन्ट्रल राइस (धान) रिसर्च इंस्टीट्यूट ➡️ कटक (ओडिशा)
- CTRI – सेन्ट्रल टोबैको (तम्बाकू) रिसर्च इंस्टीट्यूट ➡️ राजमुन्दरी (आंध्र प्रदेश)
- IISR – इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ सुगरकेन (गन्ना) रिसर्च ➡️ लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
- SBI – सुगरकेन ब्रीडिंग (गन्ना प्रजनन) इंस्टीट्यूट ➡️ कोयम्बटूर (तमिलनाडु)
- IIVR – इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ वेजीटेबल (सब्जी) रिसर्च ➡️ वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
- IIPR – इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ पल्स (दलहन) रिसर्च ➡️ कानपुर (उत्तर प्रदेश)
🌍 6. प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान (International Institutes)
| संक्षिप्त नाम | पूरा नाम | स्थान / देश | मुख्य फसल / कार्य |
|---|---|---|---|
| IRRI | इन्टरनेशनल राइस (धान) रिसर्च इंस्टीट्यूट | लॉस बानोस (फिलीपीन्स) | धान अनुसंधान |
| CIMMYT | सैन्ट्रो इन्टरनेशनल दि मेजरोमेंटो दि मेजट्राइगो | एल बटान (मेक्सिको) | गेहूँ एवं मक्का |
| ICRISAT | इन्टरनेशनल क्रॉप रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स | पटनचेरू, हैदराबाद (भारत) | ज्वार, बाजरा, मूँगफली, चना, अरहर |
| CIP | इन्टरनेशनल सेन्टर फॉर पोटैटो | लिमा (पेरू) | आलू |
| IBPGR | इन्टरनेशनल ब्यूरो फॉर प्लान्ट जेनेटिक रिसोर्सेज | रोम (इटली) | पादप आनुवंशिक संसाधन |
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे प्रश्न)
- ❓ ऋग्वेद में अन्न को क्या कहा गया है? ➡️ सस्य।
- ❓ ICAR की स्थापना कब हुई थी? ➡️ 16 जुलाई, 1929 (यह तारीख परीक्षा में बहुत बार पूछी जाती है)।
- ❓ IARI को बिहार से दिल्ली कब और क्यों स्थानांतरित किया गया? ➡️ 1934 के भूकंप में क्षतिग्रस्त होने के कारण 1936 में।
- ❓ अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI) कहाँ स्थित है? ➡️ फिलीपीन्स।
- ❓ केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) कहाँ है? ➡️ शिमला।
- ❓ लीची का राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र (NRCL) कहाँ है? ➡️ मुजफ्फरपुर, बिहार।
- ❓ गन्ना प्रजनन संस्थान (SBI) कहाँ स्थित है? ➡️ कोयम्बटूर, तमिलनाडु।
💡 Tip-Trick (याद रखने की ट्रिक)
- चावल (Rice) खाते समय मुँह से 'कटक' (क्रंच) की आवाज़ आती है ➡️ CRRI = कटक।
- आलू (Potato) हमेशा 'शिमला' मिर्च के साथ अच्छा बनता है ➡️ CPRI = शिमला।
- सब्जी (Vegetable) का राजा 'वाराणसी' के घाट घूमने गया ➡️ IIVR = वाराणसी।
- दलहन (Pulses/दाल) का 'कान' दबाकर चेक करते हैं कि पकी या नहीं ➡️ IIPR = कानपुर।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
भारत में कृषि के व्यवस्थित विकास के पीछे इन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों का सबसे बड़ा योगदान है। बिहार के पूसा से शुरू हुआ IARI का सफर आज देश की कृषि रीढ़ बन चुका है। प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इन संस्थानों की स्थापना का वर्ष, उनके मुख्यालय (स्थान) और उनसे संबंधित मुख्य फसलों की जानकारी होना अनिवार्य है।
🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)
📝 अध्याय 1.4: भारत एवं बिहार के कृषि जलवायु क्षेत्र (Agroclimatic Zones)
यह विशेष नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, ICAR, JET Agriculture, MHT CET, और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इसे सरल, रोचक और पूरी तरह परीक्षा-उपयोगी बनाया गया है।
🌍 1. बुनियादी परिभाषाएँ (Basic Concepts)
- कृषि जलवायु क्षेत्र (Agroclimatic Zone): यह भूमि की एक ऐसी बड़ी इकाई है, जहाँ की जलवायुवीय दशाएँ (जैसे वर्षा, तापमान) लगभग समान होती हैं। यह क्षेत्र एक निश्चित प्रकार की फसलों और उनके प्रभेदों (Cultivars) के लिए सबसे अनुकूल होता है (FAO, 1983)।
- कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्र (Agro-Ecological Zone): यह सूक्ष्म जलवायु दशाओं (Micro-climate) पर आधारित होता है। इसका निर्धारण जलवायु के साथ-साथ मिट्टी की किस्म, जल धारण क्षमता और फसलों के उगने की अवधि (Growth Period) के आधार पर किया जाता है।
📊 कृषि जलवायु क्षेत्रीय योजना (Agroclimatic Regional Planning)
- शुरुआत: भारत में इसका शुभारम्भ योजना आयोग (Planning Commission) द्वारा 1988 ई० में सातवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान हुआ।
- मुख्य उद्देश्य: प्राकृतिक संसाधनों का नुकसान किए बिना 5 F's (Food, Feed, Fodder, Fibre, Fuel) की बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करना और क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना।
🇮🇳 2. भारत के कृषि जलवायु एवं पारिस्थितिकी क्षेत्र (Zones of India)
❶ भारत के कृषि जलवायु क्षेत्र (15 Zones)
योजना आयोग ने जल की उपलब्धता (बाहुल्य/कमी) और फसल प्रणाली के आधार पर देश को 15 कृषि जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया है:
- पश्चिमी हिमालयन क्षेत्र | 2. पूर्वी हिमालयन क्षेत्र | 3. निचली गंगा का मैदानी क्षेत्र
- मध्य गंगा का मैदानी क्षेत्र | 5. ऊपरी गंगा का मैदानी क्षेत्र | 6. पार-गंगा का मैदानी क्षेत्र
- पूर्वी पठारी एवं पर्वतीय क्षेत्र | 8. मध्यवर्ती पठारी एवं पर्वतीय क्षेत्र | 9. पश्चिमी पठारी एवं पर्वतीय क्षेत्र
- दक्षिणी पठारी एवं पर्वतीय क्षेत्र | 11. पूर्वी तटीय मैदानी एवं पर्वतीय क्षेत्र | 12. पश्चिमी तटीय मैदानी एवं घाट क्षेत्र
- गुजरात मैदानी एवं पर्वतीय क्षेत्र | 14. पश्चिमी सूखा क्षेत्र | 15. प्रायःद्वीप (द्वीप) क्षेत्र
📊 सूक्ष्म विभाजन: बेहतर योजना निर्माण के लिए इन 15 वृहद् क्षेत्रों को पुनः 72 उपक्षेत्रों (Sub-zones) तथा 436 जिलों में वर्गीकृत किया गया है।
❷ भारत के कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्र (20 Regions)
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा भारत को कुल 20 कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्रों (Agro-Ecological Regions) में बाँटा गया है, जिन्हें पुनः 60 उपक्षेत्रों (AESR) में विभक्त किया गया है।
🗺️ 3. बिहार के कृषि जलवायु क्षेत्र (Agroclimatic Zones of Bihar)
बिहार का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 94.2 लाख हेक्टेयर है, जिसके 62.4% (56.38 लाख हेक्टेयर) भू-भाग पर शुद्ध खेती की जाती है। बिहार की जलवायु मुख्य रूप से गर्म-शुष्क (Tropical) एवं नम (Sub-humid) है।
मिट्टी, वर्षा, तापमान और फसल पद्धति के आधार पर बिहार को 3 प्रमुख कृषि जलवायु क्षेत्रों में विभाजित किया गया है (जिसमें क्षेत्र III को पुनः दो उप-वर्गों में बाँटा गया है):
बिहार के कृषि जलवायु क्षेत्र (3)
│
├── क्षेत्र I
│ (उत्तर पश्चिमी मैदान)
│ [13 जिले]
│
├── क्षेत्र II
│ (उत्तर पूर्वी मैदान)
│ [08 जिले]
│
└── क्षेत्र III
(दक्षिणी बिहार मैदान)
│
├── क्षेत्र III 'ए'
│ (दक्षिणी पूर्वी मैदान)
│ [06 जिले]
│
└── क्षेत्र III 'बी'
(दक्षिणी पश्चिमी मैदान)
[11 जिले]📋 बिहार के क्षेत्रों का विस्तृत विवरण
| क्षेत्र संख्या व नाम | शामिल जिलों की संख्या व नाम | मुख्य फसलें | मिट्टी एवं विशेषताएँ |
|---|---|---|---|
| क्षेत्र I (उत्तर पश्चिमी जलोढ़ मैदान) | 13 जिले: पश्चिमी व पूर्वी चम्पारण, गोपालगंज, सीवान, सीतामढ़ी, शिवहर, दरभंगा, मधुबनी, मुजफ्फरपुर, सारण, वैशाली, समस्तीपुर, बेगूसराय। | धान, गेहूँ, मक्का, अरहर, ईंख (गन्ना), आलू, तम्बाकू। उद्यानिकी: लीची, आम, केला, मखाना। | _ मिट्टियाँ बलुआही दोमट से दोमट हैं। _ pH मान: 6.5 से 8.4 (कहीं-कहीं 10 तक)। * फसल तीव्रता: 145.0% |
| क्षेत्र II (उत्तर पूर्वी जलोढ़ मैदान) | 08 जिले: किशनगंज, अररिया, पूर्णिया, कटिहार, सहरसा, सुपौल, मधेपुरा, खगड़िया (और भागलपुर का नवगछिया क्षेत्र)। | धान, गेहूँ, मक्का, गरमा मूँग, राई/सरसों, जूट। उद्यानिकी: आम, केला, पपीता, मिर्च। | _ मिट्टियाँ दोमट बलुआही से केवाल दोमट हैं। _ pH मान: 6.5 से 7.8 (पूर्णिया में हल्की अम्लीय 5.2-5.6)। _ राज्य के कुल जूट उत्पादन में 90% से अधिक योगदान। _ सर्वाधिक औसत वर्षा (1382 mm)। |
| क्षेत्र III 'ए' (दक्षिणी पूर्वी जलोढ़ मैदान) | 06 जिले: शेखपुरा, लखीसराय, जमुई, मुंगेर, भागलपुर, बांका। | धान, गेहूँ, मक्का, चना, मसूर, गरमा मूँग, तीसी, सरसों। उद्यानिकी: आम, अमरूद, परवल। | _ टाल एवं दियारा का बड़ा भू-भाग। _ पुरानी जलोढ़ मिट्टियाँ तथा पहाड़ी ढलानों पर लैटेराइट मिट्टी। * औसत वर्षा: 1150 mm |
| क्षेत्र III 'बी' (दक्षिणी पश्चिमी जलोढ़ मैदान) | 11 जिले: नालन्दा, नवादा, पटना, गया, जहानाबाद, अरवल, रोहतास, औरंगाबाद, भभूआ (कैमूर), भोजपुर, बक्सर। | धान, गेहूँ, मक्का, चना, सूर्यमुखी, आलू, प्याज, मिर्च। | _ अधिकांश मिट्टियाँ पुरानी जलोढ़ (भारी केवाल संरचना) हैं। _ कैमूर के पहाड़ी क्षेत्रों में जल धारण क्षमता काफी कम है। * न्यूनतम औसत वर्षा (1097 mm)। |
🌊 4. विशेष भौगोलिक क्षेत्र: टाल एवं दियारा भूमि
दक्षिणी बिहार (क्षेत्र III) में दो विशिष्ट प्रकार की भूमियाँ पाई जाती हैं जो परीक्षाओं के लिए अति महत्वपूर्ण हैं:
- दियारा क्षेत्र (Diara Land): यह वह नदी तटीय भू-भाग है जो बरसात के मौसम में पूरी तरह बाढ़ के जल से डूबा (प्लावित) रहता है। यहाँ की मिट्टी हल्की से मध्यम संरचना की होती है। यहाँ की मुख्य फसलें मक्का, गेहूँ और परवल हैं।
- टाल क्षेत्र (Tal Land): यह दियारा क्षेत्र के प्राकृतिक बाँधों के पीछे स्थित एक कटोरीनुमा (Bowl-shaped) भारी मिट्टी वाला भू-भाग है, जो वर्षा ऋतु में जलमग्न रहता है। पानी सूखने के बाद यहाँ रबी मौसम में वृहत पैमाने पर दलहन (विशेषकर चना और मसूर) की खेती की जाती है।
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे प्रश्न)
- ❓ योजना आयोग के अनुसार भारत में कितने कृषि जलवायु क्षेत्र हैं? ➡️ 15 क्षेत्र।
- ❓ ICAR के अनुसार भारत में कितने कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्र हैं? ➡️ 20 क्षेत्र।
- ❓ कृषि जलवायु क्षेत्रीय योजना की शुरुआत किस पंचवर्षीय योजना में हुई? ➡️ 7वीं पंचवर्षीय योजना (वर्ष 1988)।
- ❓ बिहार को कुल कितने कृषि जलवायु क्षेत्रों में बाँटा गया है? ➡️ 3 प्रमुख क्षेत्रों में (क्षेत्र III के दो उप-भागों सहित कुल 4 श्रेणियाँ)।
- ❓ बिहार का कौन सा क्षेत्र जूट उत्पादन में 90% से अधिक का योगदान देता है? ➡️ क्षेत्र II (उत्तर पूर्वी जलोढ़ मैदान - पूर्णिया, कटिहार आदि)।
- ❓ बिहार के किस कृषि जलवायु क्षेत्र में जिलों की संख्या सर्वाधिक है? ➡️ क्षेत्र I (13 जिले)।
- ❓ टाल क्षेत्रों की मुख्य फसलें कौन सी हैं? ➡️ दलहनी फसलें (चना और मसूर)।
- ❓ बिहार के किस जिले में सर्वाधिक और किसमें न्यूनतम वर्षा रिकॉर्ड की जाती है (क्षेत्र के अनुसार)? ➡️ सर्वाधिक क्षेत्र II (1382 मिमी) और न्यूनतम क्षेत्र III 'बी' (1097 मिमी)।
💡 Tip-Trick (याद रखने की ट्रिक)
- जूट (Jute) का 'जाल' हमेशा पानी वाले 'उत्तर-पूर्वी' (किशनगंज/पूर्णिया) कोने में बिछेगा (क्षेत्र II)।
- टाल (Tal) का मतलब 'दाल' ➡️ पानी से भरे कटोरीनुमा टाल क्षेत्रों में रबी में केवल दलहन (चना-मसूर) होगा।
- लीची (Lichi) का नाम आते ही मुजफ्फरपुर याद आता है, जो बिहार के 'उत्तर-पश्चिम' भाग में है (क्षेत्र I)।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
कृषि के वैज्ञानिक और टिकाऊ विकास के लिए देश और राज्य को जलवायु के आधार पर बाँटना बेहद आवश्यक था। बिहार के संदर्भ में, जहाँ उत्तर बिहार (क्षेत्र I और II) बाढ़ और नमी से प्रभावित है, वहीं दक्षिण बिहार (क्षेत्र III) अपेक्षाकृत शुष्क है और टाल एवं दियारा जैसी विशेष भौगोलिक संरचनाओं से युक्त है। परीक्षा की दृष्टि से इन क्षेत्रों के नाम, उनमें आने वाले जिले और उनकी विशिष्ट फसलों को याद रखना अत्यंत आवश्यक है।
🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)
📝 अध्याय 1.5: मौसम एवं कृषि (Weather and Agriculture)
यह विशेष नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, ICAR, MHT CET, JET Agriculture, और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत सरल और परीक्षा-उपयोगी (Exam-Oriented) तरीके से तैयार किए गए हैं।
🆚 1. मौसम बनाम जलवायु (Weather vs Climate)
कृषि की सफलता पूरी तरह मौसम की अनुकूलता पर निर्भर करती है। अक्सर लोग मौसम और जलवायु को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनमें बड़ा अंतर है:
| विशेषता | ☀️ मौसम (Weather) | 🌦️ जलवायु (Climate) |
|---|---|---|
| परिभाषा | किसी स्थान विशेष एवं समय पर वायुमंडल की क्षणिक स्थिति को मौसम कहते हैं। | किसी स्थान विशेष के मौसम की दीर्घकालिक औसत स्थिति को जलवायु कहते हैं। |
| क्षेत्र | यह छोटे क्षेत्र (कुछ गाँव या कुछ वर्ग किलोमीटर) के लिए होता है। | यह बड़े क्षेत्रों (जिला, राज्य, देश या महादेश) के लिए होता है। |
| अवधि | यह बहुत छोटी अवधि (कुछ घंटे या 1-2 दिन) के लिए होता है। | यह बहुत लंबी अवधि (महीनों, ऋतुओं या वर्षों के औसत) पर आधारित होता है। |
| परिवर्तनशीलता | यह क्षण-क्षण परिवर्तनशील है (अभी धूप है, तुरंत बारिश हो सकती है)। | इसमें बदलाव आसानी से नहीं होता। हल्के परिवर्तन में भी सैकड़ों या हजारों वर्ष लग सकते हैं। |
📋 2. मौसम के प्रमुख तत्व एवं कृषि पर प्रभाव (Elements of Weather)
मौसम का आकलन मुख्य रूप से 7 तत्वों पर किया जाता है: 1. तापमान, 2. सूर्य का प्रकाश, 3. आर्द्रता, 4. वर्षा, 5. वायु-दाब, 6. चक्रवात, 7. प्रति-चक्रवात।
❶ 🌡️ तापमान (Temperature)
पौधों के अंकुरण, वृद्धि, प्रजनन और बीज निर्माण के लिए तापमान की खास भूमिका होती है।
- डे-डिग्री या हीट यूनिट (Day Degree / Heat Unit): वैज्ञानिक किसी फसल के जीवनकाल में आवश्यक कुल तापमान की गणना इस सूत्र से करते हैं:
- आधार तापमान (Base Temperature): वह न्यूनतम तापमान जिसके नीचे पौधों की वृद्धि बिल्कुल रुक जाती है।
- 🌾 वर्षा ऋतु (खरीफ) एवं गरमा फसलों के लिए:
- ❄️ शीतकालीन (रबी) फसलों के लिए:
- 🌾 वर्षा ऋतु (खरीफ) एवं गरमा फसलों के लिए:
- कृषि पर प्रभाव:
- तापमान अधिक होने पर फसलें जल्दी पकती हैं (जैसे बिहार में गेहूँ 120-130 दिन लेता है, जबकि अपेक्षाकृत ठंडे पंजाब में 155-160 दिन)।
से अधिक तापमान होने पर पौधों के परागण (Pollination) और दानों के भराव पर बुरा असर पड़ता है। - तापमान बढ़ने पर प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की दर बढ़ती है। प्रत्येक
तापमान बढ़ने पर प्रकाश संश्लेषण की दर दुगनी हो जाती है।
❷ ☀️ सूर्य का प्रकाश (Sunlight)
सूर्य कृषि और जीवन दोनों का आधार है। यह प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से पौधों में कार्बोहाइड्रेट (भोजन) बनाता है।
- तरंगदैर्ध्य (Wavelength): प्रकाश संश्लेषण में सक्रिय प्रकाश की तरंगदैर्ध्य 750 से 400 मिली माइक्रोन के बीच होती है। हरी पत्तियाँ इस सक्रिय प्रकाश का केवल 2 प्रतिशत भाग ही भोजन बनाने में उपयोग करती हैं।
- प्रकाश अवधि (Photoperiodism): पुष्पन (Flowering) के लिए पौधों को मिलने वाली प्रकाश की अवधि के आधार पर फसलों को 3 श्रेणियों में बाँटा गया है:
| श्रेणी | विशेषता | उदाहरण |
|---|---|---|
| अल्प प्रकाशपेक्षी (Short Day Plants - SDP) | पुष्पन के लिए एक निश्चित क्रांतिक काल से कम अवधि (छोटे दिन) की आवश्यकता होती है। | मक्का, सोयाबीन, ज्वार, बाजरा, तंबाकू, लोबिया, मूँग, और धान की पारंपरिक प्रजातियाँ। |
| दीर्घ प्रकाशपेक्षी (Long Day Plants - LDP) | पुष्पन के लिए क्रांतिक काल से अधिक अवधि (लंबे दिन) की आवश्यकता होती है। | गेहूँ, जौ, जई, बरसीम, मटर, चना, मसूर (मुख्यतः रबी फसलें)। |
| दिवस निष्प्रभावी (Day Neutral Plants - DNP) | इनके पुष्पन पर दिन की लंबाई या प्रकाश की अवधि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। | कपास, सूर्यमुखी, टमाटर एवं धान की बौनी किस्में। |
❸ 💧 आर्द्रता (Humidity)
वायुमंडल में उपस्थित जलवाष्प (Water Vapor) की मात्रा को आर्द्रता कहते हैं।
- ओसांक (Dew Point): वह तापमान जिस पर हवा में मौजूद अदृश्य जलवाष्प, दृश्य जल की बूंदों (ओस) में बदल जाती है। इस तापमान पर आपेक्षिक आर्द्रता 100% होती है।
- कृषि पर प्रभाव: वायुमंडल में अधिक आर्द्रता (नमी) होने पर पौधों में वाष्पोत्सर्जन (Transpiration) कम होता है। लेकिन, अधिक आर्द्रता के कारण फसलों में रोगों (Diseases) और हानिकारक कीड़ों (Pests) का प्रकोप बहुत बढ़ जाता है।
❹ 🌧️ वर्षा (Rainfall)
जल ही कृषि का मुख्य आधार है। जिन क्षेत्रों में कम वर्षा होती है, वहाँ ज्वार, बाजरा, रागी जैसी मोटे अनाज वाली फसलें उगाई जाती हैं। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में धान, मक्का और जूट की खेती होती है।
❺ 💨 वायु दाब (Atmospheric Pressure)
- समुद्र तल से ऊपर जाने पर वायु दाब कम होता जाता है (प्रति 300 मीटर पर 34 मिलीबार कम)।
- बौनी वनस्पति: अधिक ऊँचे पहाड़ों पर कम वायुदाब और कम तापमान के कारण 'दैहिक शुष्कता' हो जाती है, जिससे वहाँ की वनस्पतियाँ अधिकतर बौनी (Dwarf) होती हैं। वायुदाब मापने के लिए बैरोमीटर (Barometer) का उपयोग होता है।
❻ 🌪️ चक्रवात एवं प्रति-चक्रवात (Cyclone & Anti-Cyclone)
- चक्रवात: इसमें केंद्र में वायु का दबाव कम (Low Pressure) होता है और हवा बाहर से केंद्र की ओर तेज़ी से घूमती है। इसके कारण तेज़ आँधी और भारी वर्षा होती है।
- नुकसान: मार्च के महीने में आने वाले चक्रवात, ओलावृष्टि और अंधड़ के कारण रबी की खड़ी फसलों को भारी नुकसान पहुँचता है।
- प्रति-चक्रवात: यह चक्रवात का बिल्कुल उल्टा होता है। इसके केंद्र में उच्च दाब (High Pressure) होता है। इसके आने पर मौसम शुष्क व शीतल रहता है और बादलों की कमी होती है।
🏢 3. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) एवं भविष्यवाणी
- स्थापना: भारत में वर्ष 1875 में पूना (पुणे, महाराष्ट्र) में Indian Meteorological Department (IMD) की स्थापना की गई थी। (वर्तमान में इसका मुख्यालय नई दिल्ली में है)।
- आधुनिकीकरण: 8 जुलाई, 1970 से आँकड़ों के संकलन के लिए कंप्यूटर का प्रयोग शुरू हुआ। वर्तमान में देश में लगभग 125 वेधशालाएँ (Observatories) मौसम की सटीक भविष्यवाणी के लिए कार्य कर रही हैं।
🌡️ 4. जलवायु परिवर्तन और फसल उत्पादन (Climate Change)
- औद्योगिक प्रगति के कारण वायुमंडल में
जैसी ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ रही है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) की समस्या उत्पन्न हो रही है। - कृषि पर प्रभाव: तापमान बढ़ने से गेहूँ, आलू और सरसों जैसी शीतकालीन फसलों के अंतर्गत बोया जाने वाला क्षेत्र (रकबा) घट सकता है।
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे प्रश्न)
- ❓ रबी फसलों के लिए आधार तापमान (Base Temperature) कितना माना गया है? ➡️
(खरीफ/गरमा के लिए )। - ❓ प्रत्येक कितने तापमान की वृद्धि पर प्रकाश संश्लेषण की दर दुगुनी हो जाती है? ➡️ प्रत्येक
की वृद्धि पर। - ❓ कपास और सूर्यमुखी किस प्रकार के पौधे हैं? ➡️ दिवस निष्प्रभावी पौधे (Day Neutral Plants)।
- ❓ ओसांक (Dew Point) पर आपेक्षिक आर्द्रता कितनी होती है? ➡️ 100 प्रतिशत।
- ❓ वायुदाब मापने के लिए किस यंत्र का प्रयोग किया जाता है? ➡️ बैरोमीटर (Barometer)।
- ❓ भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की स्थापना कब और कहाँ हुई थी? ➡️ 1875 में, पूना में।
- ❓ फसलों में बीमारियों और कीड़ों का प्रकोप कब बढ़ता है? ➡️ वायुमंडल में उच्च आर्द्रता (High Humidity) होने पर।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
मौसम और कृषि एक दूसरे के पूरक हैं। क्षण-क्षण बदलने वाला मौसम जहाँ फसलों की तात्कालिक वृद्धि को प्रभावित करता है, वहीं दीर्घकालिक जलवायु यह तय करती है कि किस क्षेत्र में कौन सी फसल प्रणाली अपनाई जाएगी। आज के समय में मौसम का पूर्वानुमान (Weather Forecasting) किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है, जो उन्हें ओलावृष्टि, चक्रवात और भारी बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं से फसलों को बचाने में मदद करता है।
🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)
📝 अध्याय 1.6: कर्षण (Tillage / भूपरिष्करण)
यह विशेष नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, ICAR, JET Agriculture, MHT CET, और अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत सरल, आकर्षक और परीक्षा-उपयोगी (Exam-Oriented) तरीके से तैयार किए गए हैं।
🔍 1. कर्षण की परिभाषा (Definition of Tillage)
- भूपरिष्करण/कर्षण: कृषि यंत्रों और उपकरणों की मदद से भूमि की ऊपरी परत को इस प्रकार खोदना या ढीला करना, जिससे बीजों के अंकुरण और पौधों की वृद्धि के लिए अनुकूल परिस्थिति बन सके, कर्षण (Tillage) कहलाता है।
- इतिहास: कृषि वैज्ञानिक जेथरो टूल (Jethro Tull) ने 1731 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "Horse hoeing husbandry" में यह गलत परिकल्पना की थी कि पौधों की जड़ें मिट्टी के महीन कणों को खाती हैं। भले ही यह विचार गलत था, लेकिन इसी के बाद से मिट्टी को महीन और भुरभुरा बनाने के लिए कर्षण का महत्व बढ़ गया।
🎯 2. कर्षण के मुख्य उद्देश्य (Objectives of Tillage)
- 🌱 बीज-शय्या (Seed Bed) का निर्माण: फसलों की जड़ों की गहराई के अनुरूप मिट्टी को तैयार करना।
- 🌿 खर-पतवार (Weeds) का नियंत्रण: अवांछित पौधों को उखाड़कर नष्ट करना या गहराई में दबाकर सड़ने (अपघटन) के लिए छोड़ना।
- 🧪 खाद व रसायनों को मिलाना: जैविक खाद, रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और भूमि सुधारकों (Amendments) को मिट्टी में सही गहराई तक मिलाना।
- 💨 वायु-संचार (Aeration) में सुधार: मिट्टी को ढीला करना ताकि जड़ों को ऑक्सीजन मिल सके और सूक्ष्मजीव जैव पदार्थों का अपघटन कर सकें।
- 💧 जल अवशोषण एवं जल धारण क्षमता बढ़ाना: मिट्टी की पानी सोखने (Infiltration) और उसे सोखे रखने की क्षमता को बेहतर करना।
- 🐛 कीट व रोगों का नाश: मिट्टी के भीतर छिपे हानिकारक कीड़ों के अंडों, लार्वा और बीमारियों के कारकों के वास स्थलों को नष्ट करना।
- ⛰️ भू-क्षरण (Soil Erosion) को कम करना और मिट्टी की संरचना को बेहतर बनाना।
📂 3. कर्षण का वर्गीकरण (Classification Based on Time)
समय और उद्देश्य के आधार पर कर्षण को 7 मुख्य भागों में बाँटा गया है:
❶ प्रारम्भिक कर्षण (Primary Tillage)
- क्या है? किसी फसल की बोआई से पहले बैठी हुई या कड़ी मिट्टी (Hard Soil) को ढीला करने के लिए की जाने वाली शुरुआती मुख्य जुताई है।
- इसमें पिछली फसल के डंठल, खर-पतवार या हरी खाद को मिट्टी में गहराई में दबाया जाता है (मिट्टी पलटना)।
- यंत्र: इसके लिए भारी यंत्रों जैसे मिट्टी पलटने वाले हल (Plough) का उपयोग किया जाता है।
- विशेष नोट: बलुआही या हल्की दोमट मिट्टी में इसकी आवश्यकता कम होती है, लेकिन भारी चिकनी मिट्टी (Heavy Clay/केवाल मिट्टी) में प्रारम्भिक कर्षण अनिवार्य है।
❷ माध्यमिक कर्षण (Secondary Tillage)
- क्या है? प्रारम्भिक जुताई के बाद से लेकर बीजों की बोआई तक किए जाने वाले सभी हल्के कार्य माध्यमिक कर्षण कहलाते हैं।
- उद्देश्य: मिट्टी के बड़े ढेलों (Clods) को तोड़ना, उसे दानेदार व भुरभुरा बनाना, ज़मीन को समतल करना और दबे हुए खर-पतवारों को खींचकर बाहर निकालना।
- यंत्र: इसके लिए हल्के यंत्रों जैसे हैरो (Harrow) और कल्टीवेटर (Cultivator) का उपयोग होता है।
❸ अन्तरकर्षण (Inter-tillage)
- क्या है? खड़ी फसल (Standing Crops) के बीच में मिट्टी पर किए जाने वाले कर्षण कार्य को अन्तरकर्षण कहते हैं।
- उद्देश्य: उगे हुए खर-पतवारों को खुरपी या वीडर से निकालना, खड़ी फसल में ऊपर से दिए गए उर्वरकों को मिट्टी में मिलाना, और पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ाना।
- फायदा: मिट्टी की ऊपरी सतह भुरभुरी होने से नमी का वाष्पीकरण रुक जाता है और जल अधिक समय तक सुरक्षित रहता है।
- यंत्र: खुरपी, कुदाल, कोनो वीडर, रोटरी-हो और हाथ से चलने वाले कल्टीवेटर।
❹ गरमा कर्षण / गरमा जुताई (Summer Tillage)
- रबी (जाड़े) की फसल कटने के बाद मार्च-अप्रैल में खेत खाली रहने पर मिट्टी पलटने वाले हल से यह जुताई की जाती है।
- फायदे:
- बहुवर्षीय खर-पतवारों की जड़ें और कन्द ऊपर आ जाते हैं और तेज शुष्क धूप में जलकर नष्ट हो जाते हैं।
- पिछली फसल के हानिकारक कीटों के घर टूट जाते हैं और धूप से कीट मर जाते हैं।
- भूमि असमतल होने के कारण मानसून पूर्व की बारिश का पानी बहता नहीं है, बल्कि खेत में ही सोख लिया जाता है, जिससे भू-जल स्तर ऊपर उठता है।
❺ शीतकालीन कर्षण (Winter Tillage)
- समशीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में जहाँ अत्यधिक हिमपात (Snowfall) होता है, वहाँ बर्फ जमने से ठीक पहले यह जुताई की जाती है (उद्देश्य गरमा कर्षण जैसा ही होता है)।
❻ परती कर्षण (Fallow Tillage)
- मिट्टी की उर्वरता और संरचना सुधारने के लिए जब खेत को खाली (परती) छोड़ा जाता है, तब उसमें खर-पतवारों को नियंत्रित करने और वर्षा जल को संचित करने के लिए की जाने वाली जुताई।
❼ रासायनिक कर्षण (Chemical Tillage)
- क्या है? जब धान की कटाई के बाद खेत बहुत गीला होता है और सूखने के इंतजार में रबी की बोआई में देरी होने की संभावना होती है, तब बिना जुताई किए रसायनों का उपयोग किया जाता है।
- प्रक्रिया: धान के कटे डंठलों और खर-पतवारों पर पाराक्वाट (Paraquat) नामक खर-पतवार नाशी के 0.1% घोल का छिड़काव किया जाता है।
- इससे डंठल और खर-पतवार 10-12 दिनों में सड़ जाते हैं और बिना जुताई किए सीधे अगली फसल बोई जा सकती है। इसे ही रासायनिक कर्षण कहते हैं।
⚙️ 4. बारम्बारता (Frequency) के आधार पर कर्षण
- पारम्परिक कर्षण (Traditional Tillage): वर्षों से चली आ रही पद्धति जिसमें फसल उगाने के लिए कई बार गहरी और हल्की जुताइयाँ की जाती हैं।
- निम्नतम कर्षण (Minimum Tillage): जुताई की संख्या को कम करके केवल उतनी ही जुताई करना जो बीज के अंकुरण के लिए न्यूनतम आवश्यक हो (इससे लागत घटती है और मृदा संरचना बचती है)।
- शून्य कर्षण (Zero Tillage): बिना किसी प्राथमिक जुताई के, सीधे पिछली फसल के अवशेषों के बीच ही विशेष मशीनों (Zero-till drill) द्वारा सीधे बीज बो देना।
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे प्रश्न)
- ❓ "Tillage" शब्द और इसकी परिकल्पना किसने दी थी? ➡️ जेथरो टूल (Jethro Tull) ने, 1731 में।
- ❓ प्रारम्भिक कर्षण (Primary Tillage) का मुख्य यंत्र कौन सा है? ➡️ मिट्टी पलटने वाला हल (Plough)।
- ❓ खड़ी फसल में किया जाने वाला कर्षण कार्य क्या कहलाता है? ➡️ अन्तरकर्षण (Inter-tillage)।
- ❓ चिकनी या भारी केवाल मिट्टी में कौन सा कर्षण अनिवार्य है? ➡️ प्रारम्भिक कर्षण।
- ❓ अंतरकर्षण करने से मिट्टी में क्या फायदा होता है? ➡️ खर-पतवार नष्ट होते हैं और नमी का वाष्पीकरण रुकता है।
- ❓ रासायनिक कर्षण में किस रसायन का उपयोग किया जाता है? ➡️ पाराक्वाट (Paraquat) - 0.1% घोल।
- ❓ बिना किसी पूर्व जुताई के सीधे बीज बोने की आधुनिक पद्धति को क्या कहते हैं? ➡️ शून्य कर्षण (Zero Tillage)।
💡 Tip-Trick (याद रखने की शार्ट-ट्रिक)
- Primary (प्राथमिक) = भारी शुरुआत ➡️ Plough (हल) से मिट्टी पलटना।
- Secondary (माध्यमिक) = हल्का सुधार ➡️ Harrow/Cultivator से ढेले तोड़ना और समतल करना।
- Inter (अन्तर) = इनसाइड (Inside) ➡️ खड़ी फसल के अंदर खुरपी चलाना।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
कर्षण या भूपरिष्करण कृषि विज्ञान का वह व्यावहारिक आधार है जो बीज को ज़मीन के भीतर एक सुरक्षित और पोषक माहौल (Seed bed) प्रदान करता है। जहाँ पारंपरिक और गरमा कर्षण मिट्टी को कीड़ों और खर-पतवारों से बचाते हैं, वहीं आधुनिक युग में शून्य कर्षण (Zero Tillage) और रासायनिक कर्षण जैसी तकनीकें समय, लागत और पर्यावरण को बचाने के लिए क्रांतिकारी साबित हो रही हैं।
🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)
📝 अध्याय 1.7: कर्षण यंत्र (Tillage Implements)
यह नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, ICAR, JET Agriculture, MHT CET, और अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेहद सरल, आकर्षक और पूरी तरह परीक्षा-उपयोगी (Exam-Oriented) तरीके से तैयार किए गए हैं।
⚙️ 1. कर्षण यंत्रों का वर्गीकरण (Classification of Implements)
कर्षण (जुताई) के उद्देश्यों और समय के अनुसार यंत्रों को चार मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
❶ प्रारम्भिक कर्षण यंत्र (Primary Tillage Implements)
इनका मुख्य कार्य कड़ी या बैठी मिट्टी की सघनता को तोड़ना, उसे ढीला करना और वानस्पतिक अवशेषों/खाद को गहराई में दबाना है। ये भारी यंत्र होते हैं, जिन्हें अधिक शक्ति (ट्रैक्टर/बैलों) की आवश्यकता होती है।
- (क) देशी हल (Indigenous Plough):
- यह पूरी तरह लकड़ी का बना होता है, जिसमें केवल नीचे का फार (Share) लोहे का होता है।
- यह एकमात्र ऐसा हल है जिससे प्रारम्भिक, माध्यमिक और अन्तरकर्षण तीनों प्रकार के कार्य किए जा सकते हैं।
- कमी: यह अंग्रेजी के 'V' आकार की हराई (furrow) बनाता है। यह मिट्टी को काटता तो है, पर पलटता नहीं है। इसके कारण दो हराइयों के बीच की भूमि अनजुती रह जाती है (जिसके लिए क्रॉस-जुताई करनी पड़ती है)।
- मुख्य अंग: हरीश, बॉडी, फार और हत्था।
- (ख) मिट्टी पलट हल (Mould Board Plough):
- यह सबसे प्रभावी मिट्टी पलटने वाला यंत्र है, जो ऊपर की मिट्टी नीचे और नीचे की मिट्टी ऊपर कर देता है।
- बैल चालित मोल्ड बोर्ड हल 15 सेमी तक और ट्रैक्टर चालित 25 से 30 सेमी गहरी जुताई करता है।
- फायदा: इसमें कोई भी भूमि अनजुती नहीं बचती। हरी खाद, खर-पतवार और गोबर की खाद को गहराई में दबाने तथा गरमा जुताई के लिए यह सबसे सर्वोत्तम है।
- प्रमुख ब्रांड: मेस्तान, प्रजा, शाबास, विक्ट्री और पंजाब हल।
- मुख्य अंग: फार (Share), लैंड साइड (Land side - हल को सीधा रखता है), मोल्ड बोर्ड (Mould Board - मिट्टी पलटता है) और फ्रॉग (Frog - ढांचा)।
- (ग) तवेदार हल (Disc Plough):
- इसमें फार और मोल्ड बोर्ड की जगह स्टील के बड़े-बड़े नतोदर (Concave) तवे लगे होते हैं। तवे का व्यास सामान्यतः 60 सेमी होता है जो 30-35 सेमी गहराई तक कटाई कर सकता है।
- कहाँ उपयुक्त है? सूखी व अत्यधिक कड़ी भूमि, कंकरीली-पथरीली ज़मीन और चिपचिपी/लसलसी (Sticky) मिट्टी में जहाँ मोल्ड बोर्ड हल काम नहीं कर पाता। यह खर-पतवारों के जालों को आसानी से काट देता है।
- कमी: हरी खाद या वानस्पतिक अवशेषों को दबाने में यह मोल्ड बोर्ड हल जितना अच्छा नहीं है।
❷ माध्यमिक कर्षण यंत्र (Secondary Tillage Implements)
इनका उद्देश्य प्रारम्भिक जुताई के बाद बड़े ढेलों को तोड़ना, मिट्टी को भुरभुरा/मुलायम बनाना और खेत को समतल करना है ताकि एक आदर्श बीज शय्या (Seed Bed) तैयार हो सके।
- (क) हैरो (Harrow): यह कम गहरी जुताई करने और खर-पतवारों को सतह पर खींचकर जमा करने का यंत्र है। इसके 3 मुख्य प्रकार हैं:
- तवेदार हैरो (Disc Harrow): इसमें स्टील के छोटे तवे (व्यास 45-55 सेमी) अधिक संख्या में लगे होते हैं। यह मिट्टी को मथकर बारीक कर देता है। (Single action, Double action और Off-set इसके प्रकार हैं)।
- स्पाइक टूथ हैरो (Spike Tooth Harrow): लोहे के फ्रेम पर कील/कांटे लगे होते हैं। यह मिट्टी के नीचे छिपे खर-पतवारों के डंठल-जड़ों को सतह पर लाता है। बोआई के बाद वर्षा से खेत में पड़ी पपड़ी (Crust) को तोड़ने में यह बेहद कारगर है।
- चेन हैरो (Chain Harrow): इसमें कील की जगह भारी सीकड़ (Z-chains) लगे होते हैं, जो ढेलों को तोड़ते हैं और खर-पतवारों को फँसाकर बाहर लाते हैं।
- (ख) कल्टीवेटर (Cultivator):
- यह आधुनिक खेती में सबसे ज्यादा उपयोग होने वाला यंत्र है। यदि मिट्टी हल्की हो, तो अकेले कल्टीवेटर से ही पूरी तैयारी की जा सकती है (गहराई: 10-15 सेमी)।
- यह मिट्टी को भुरभुरा बनाता है, हवा का संचार बढ़ाता है और बिखेर कर बोए गए बीजों व उर्वरकों को मिट्टी में मिलाता है। यह मिट्टी पर एक मल्च (Palwar) बना देता है जिससे पानी का वाष्पीकरण धीमा हो जाता है। (7 से 17 फार वाले उपलब्ध)।
- (ग) पाटा (Plank): लकड़ी या लोहे का भारी पट्टा होता है। यह ज़मीन को समतल करता है और बोए गए बीजों को मिट्टी से ढक देता है ताकि पक्षी उन्हें न चुग सकें।
- (घ) रोलर (Roller): यदि मिट्टी आवश्यकता से अधिक पोली (Loose) हो, तो उसे थोड़ा दबाने और बचे हुए ढेलों को चूर करने के लिए उपयोग किया जाता है।
❸ अन्तर कर्षण यंत्र (Inter-tillage Implements)
खड़ी फसल में निकाई-गुड़ाई (Weeding), हवा का संचार बढ़ाने और पौधों पर मिट्टी चढ़ाने के लिए हल्के यंत्रों का उपयोग होता है।
- खुरपी और कुदाल: सबसे सस्ते और सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले पारंपरिक साधन (लेकिन श्रमिक अधिक लगते हैं)।
- हो (Hoe): शर्मा हो, रैम हो (कुदाल से तेज़ काम करते हैं)।
- धान के विशेष यंत्र: रोटरी हो (Rotary Hoe) और कोनो वीडर (Cono Weeder); इन्हें धान की दो पंक्तियों के बीच आगे-पीछे ठेलते हुए चलाया जाता है।
- पंचफारा या हॉर्स हो: बैल चालित यंत्र जो मक्का या गन्ने की दो पंक्तियों के बीच खर-पतवार नष्ट करता है (8 घंटे में 2 से 3 एकड़ कार्य)।
- रीजर (Ridger): मक्का, गन्ना या आलू में पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ाने (Earthing up) के लिए इसका उपयोग होता है।
❹ विशेष स्थितियों के कर्षण यंत्र (Special Purpose Implements)
- (क) सब स्वायलर (Sub-soiler): यह अत्यंत गहरी जुताई करने वाला यंत्र है (गहराई: 40 सेमी से 1.0 मीटर)। यह मिट्टी की निचली परतों में भारी मशीनों के कारण बनी कड़ी परत (Hard Pan) को तोड़ने और भूमिगत जल निकासी नाली (Underground Drainage Channel) बनाने के लिए उच्च हॉर्स पावर (HP) के ट्रैक्टर द्वारा चलाया जाता है।
- (ख) चिजेल हल (Chisel Plough): यह भी गहरी जुताई का यंत्र है जो मोल्ड बोर्ड हल से अधिक गहराई (60-70 सेमी) तक जाकर कड़ी परत को तोड़ता है।
- (ग) मेड़ बनाने का यंत्र (Bund Former): धान के खेतों या सामान्य खेतों में ऊँची मेड़ें बनाने और पुरानी मेड़ों की मरम्मत करने का आधुनिक यंत्र (इसमें दो विपरीत दिशा वाले मोल्ड बोर्ड लगे होते हैं)।
- (घ) समतलीकरण के यंत्र (Scraper & Leveller): गड्ढों को भरने और ऊँचे खेतों को बराबर करने के लिए। आधुनिक खेती में सटीक समतलीकरण के लिए लेज़र गाइडेड लेवलर (Laser Land Leveller) का उपयोग किया जाता है।
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे प्रश्न)
- ❓ कौन सा हल प्रारम्भिक, माध्यमिक और अंतरकर्षण तीनों कार्य कर सकता है? ➡️ देशी हल।
- ❓ देशी हल किस अंग्रेजी अक्षर के आकार की हराई (Furrow) बनाता है? ➡️ 'V' आकार की।
- ❓ हरी खाद (Green Manure) को मिट्टी में दबाने के लिए सबसे उपयुक्त यंत्र कौन सा है? ➡️ मिट्टी पलट हल (Mould Board Plough)।
- ❓ लसलसी (Sticky), पथरीली और अत्यधिक सूखी कड़क मिट्टी के लिए कौन सा हल सर्वोत्तम है? ➡️ तवेदार हल (Disc Plough)।
- ❓ बोआई के बाद मिट्टी की ऊपरी पपड़ी (Crust) को तोड़ने के लिए किस हैरो का उपयोग करते हैं? ➡️ स्पाइक टूथ हैरो (Spike Tooth Harrow)।
- ❓ धान की खड़ी फसल की कतारों के बीच निकाई के लिए किस यंत्र का उपयोग होता है? ➡️ कोनो वीडर (Cono Weeder) या रोटरी हो।
- ❓ मिट्टी की सबसे गहरी कड़ी परत (Hard Pan) को तोड़ने के लिए किस यंत्र का उपयोग होता है और यह कितनी गहराई तक जाता है? ➡️ सब स्वायलर (Sub-soiler), यह 40 सेमी से 1 मीटर तक गहराई में काम करता है।
- ❓ खेत को सबसे सटीक रूप से समतल करने की आधुनिकतम तकनीक क्या है? ➡️ लेज़र संचालित लेवलर (Laser Leveller)।
💡 Tip-Trick (याद रखने की ट्रिक)
- देशी हल = ऑल-इन-वन (Primary + Secondary + Inter)।
- M.B. Plough = मिट्टी पलटना (M से मिट्टी, M से Mould Board)।
- Disc Plough = पथरीली/कड़ी मिट्टी (स्टील का मजबूत गोल चक्का)।
- Sub-soiler = सब (Sub) के नीचे जाना (1 मीटर गहराई, Hard pan तोड़ना)।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
कर्षण यंत्र आधुनिक कृषि के कुशल सारथी हैं। जहाँ देशी हल पारंपरिक कृषि का प्रतीक है, वहीं मोल्ड बोर्ड और तवेदार हल प्राथमिक तैयारी को सुदृढ़ करते हैं। द्वितीयक तैयारी में कल्टीवेटर और हैरो का योगदान अद्वितीय है, जो एक उत्तम बीज-शय्या का निर्माण करते हैं। आधुनिक युग में सब-स्वायलर और लेज़र लेवलर जैसे विशेष यंत्रों के उपयोग से मिट्टी की उत्पादकता और जल प्रबंधन में क्रांतिकारी सुधार आ रहे हैं।
🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)
📝 अध्याय 1.8: मृदा की जोत (Soil Tilth)
यह विशेष नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, ICAR, JET Agriculture, MHT CET, और अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत सरल, आकर्षक और पूरी तरह परीक्षा-उपयोगी (Exam-Oriented) तरीके से तैयार किए गए हैं।
🔍 1. मृदा की जोत क्या है? (Definition of Soil Tilth)
- जोत (Tilth): कर्षण (Tillage) एक यांत्रिक क्रिया है और जोत (Tilth) उस क्रिया का अंतिम प्रतिफल या परिणाम है। यह मिट्टी की वह भौतिक स्थिति है जो पौधों के अंकुरण और वृद्धि के लिए अनुकूल होती है।
- वैज्ञानिक परिभाषा: "मृदा के सभी भौतिक गुणों (संरचना, रन्ध्रता, जल व वायु संतुलन) के सम्मिलित रूप को ही जोत (Tilth) कहते हैं।"
- मापन: कर्षण को जुताई की संख्या या यंत्रों के आधार पर मापा जा सकता है, लेकिन जोत (Tilth) को किसी निश्चित इकाई (Unit) में मापा नहीं जा सकता। जोत केवल बहुत अच्छी, अच्छी, संतोषप्रद, या खराब हो सकती है।
⭐ 2. अच्छी जोत के विशिष्ट गुण (Characteristics of Good Tilth)
एक आदर्श या अच्छी जोत वाली मिट्टी की निम्नलिखित पहचान होती है:
- 🪨 दानेदार संरचना: मिट्टी की संरचना दानेदार (Granular) या क्रम्बी (Crumbly) होनी चाहिए।
- सिंचित खेती के लिए: बड़े मृदा समुच्चय (Aggregates) का अधिकांश भाग 5 मिमी से बड़ा होना चाहिए।
- असिंचित (बारानी) खेती के लिए: 1-2 मिमी आकार वाले मृदा समुच्चय की अधिकता होनी चाहिए।
- 🧽 भुरभुरी व मुलायम: मिट्टी की ऊपरी परत भुरभुरी (Friable) और मुलायम (Malleable) होनी चाहिए, ताकि पैर रखने पर पैर धँसे।
- 💧 स्थिर मृदा समुच्चय (Water Stable Aggregates): मिट्टी के कण पानी या सिंचाई मिलने पर आसानी से टूटकर बिखरने नहीं चाहिए।
- 💨 वायु-संचार: जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन मिलने के लिए वायु-संचार बाधित न हो।
- 📊 रन्ध्रों का 50-50% संतुलन: मिट्टी में दीर्घ रन्ध्र (Macro-pores - हवा के लिए) और सूक्ष्म रन्ध्र (Micro-pores - जल के लिए) 50:50 के आदर्श अनुपात में होने चाहिए।
- 🪵 ढेलों का सही आकार: खेत में ढेले न तो बहुत बड़े हों और न ही धूल की तरह छोटे। ढेलों का आदर्श आकार 15 मिमी से बड़ा और 1-2 मिमी से छोटा नहीं होना चाहिए।
- 🌊 जल शोषण (Infiltration) व जल स्राव (Percolation): मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता अच्छी हो तथा पानी नीचे जाने की गति (Percolation) न तो बहुत तेज़ हो और न ही बहुत धीमी।
⚠️ चेतावनी (Over-Tillage): आवश्यकता से अधिक कर्षण (जुताई) करने पर मिट्टी के कणों का समूह बिखर जाता है, जिससे बड़े व सूक्ष्म रन्ध्रों का संतुलन बिगड़ जाता है और पौधों को नुकसान पहुँचता है।
🔀 3. कर्षण (Tillage) एवं जोत (Tilth) में अंतर
| विशेषता | 🚜 कर्षण (Tillage) | 🌱 जोत (Soil Tilth) |
|---|---|---|
| प्रकृति | यह मिट्टी के साथ की जाने वाली एक यांत्रिक क्रिया (Mechanical Manipulation) है। | यह कर्षण क्रिया के बाद प्राप्त होने वाली मिट्टी की भौतिक स्थिति (Condition) है। |
| मापन | इसे परिमाण (मात्रा) और यंत्रों (गुणवत्ता) की इकाइयों में मापा जा सकता है (जैसे: 2 जुताई, 1 हैरो)। | इसे किसी इकाई में मापा नहीं जा सकता। इसे केवल अच्छा, संतोषप्रद या खराब कहा जा सकता है। |
| उपस्थिति | यह केवल खेत की तैयारी के समय की जाने वाली प्रक्रिया है। | यह कर्षण के पहले भी और कर्षण के बाद भी मिट्टी में हमेशा वर्तमान रहती है। |
📊 4. जोत (Tilth) का मिट्टी के भौतिक गुणों पर प्रभाव
अच्छी जोत का निर्माण मिट्टी के निम्नलिखित भौतिक गुणों में गुणात्मक सुधार लाता है:
- (क) रन्ध्रता (Pore Spaces): कर्षण से रन्ध्रों की संख्या बढ़ती है। अच्छी जोत में केशकीय (Capillary - जल हेतु) और केशकीयेत्तर (Non-capillary - हवा हेतु) रन्ध्र बराबर मात्रा में आ जाते हैं, जो फसल के लिए सर्वोत्तम है।
- (ख) संरचना (Structure): मिट्टी क्रम्बी (Crumb) संरचना में बदल जाती है, जिससे मृदा अपरदन (Soil Erosion) में भारी कमी आती है। गुरुत्वाकर्षण के कारण बड़े रन्ध्रों का पानी 3-4 दिनों में नीचे चला जाता है, जबकि सूक्ष्म रन्ध्रों का पानी पौधों के लिए उपलब्ध जल (Available Water) के रूप में संचित रहता है।
- (ग) बल्क डेन्सिटी (Bulk Density): जुताई के बाद मिट्टी का आयतन (Volume) बढ़ जाता है लेकिन वजन वही रहता है, जिससे मृदा की बल्क डेन्सिटी घट जाती है। यह पौधों की जड़ों के फैलाव के लिए बहुत अच्छा माना जाता है।
- (घ) मृदा का रंग (Soil Colour): अच्छा वायु-संचार होने से मिट्टी में मौजूद जैव-पदार्थों का अपघटन तेज़ होता है, जिससे ह्यूमस (Humus) का निर्माण होता है। यह ह्यूमस मिट्टी को गहरा भूरा रंग प्रदान करता है, जो उच्च उर्वरता का संकेत है।
- (ङ) मृदा तापमान (Soil Temperature): अच्छी जोत के कारण मिट्टी की परतें ढीली हो जाती हैं, जिससे ताप के परिचालन (Conduction) की गति धीमी हो जाती है। परिणामतः मिट्टी का तापमान फसलों के अनुकूल हो जाता है (अर्थात गर्मी में कम और जाड़े में अधिक)।
📈 तालिका: कर्षण/जोत के बाद मिट्टी के गुणों में बदलाव
| भौतिक गुण | बलुआही मिट्टी (पहले ➡️ बाद में) | चिकनी / केवाल मिट्टी (पहले ➡️ बाद में) |
|---|---|---|
| जल शोषण (सेमी/घंटा) | 17.64 ➡️ 22.23 | 1.91 ➡️ 6.8 |
| सतह का खुरदुरापन (cm) | 1.15 ➡️ 1.75 | 1.72 ➡️ 2.77 |
| मृदा नमी (% संतृप्तता पर) | 32.00 ➡️ 38.00 | 40.00 ➡️ 61.00 |
| बल्क डेन्सिटी (ग्राम/सेमी³) | 1.42 ➡️ 1.11 | 1.24 ➡️ 0.80 |
💡 निष्कर्ष: कर्षण के बाद चिकनी मिट्टी की बल्क डेन्सिटी में भारी कमी (1.24 ➡️ 0.80) आती है और जल सोखने की क्षमता लगभग 3 गुना (1.91 ➡️ 6.8) बढ़ जाती है।
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे प्रश्न)
- ❓ "Tilth is the sum total of physical properties of soil" यह परिभाषा किसकी है? ➡️ जोत (Tilth) की।
- ❓ अच्छी जोत में दीर्घ रन्ध्र (Macro-pores) और सूक्ष्म रन्ध्र (Micro-pores) का अनुपात कितना होना चाहिए? ➡️ 50-50 प्रतिशत (
)। - ❓ सिंचित खेती के लिए आदर्श मृदा समुच्चय (Soil Aggregates) का आकार कितना होना चाहिए? ➡️ 5 मिमी से बड़ा (असिंचित के लिए 1-2 मिमी)।
- ❓ अच्छी जोत बनने पर मिट्टी की बल्क डेन्सिटी पर क्या प्रभाव पड़ता है? ➡️ बल्क डेन्सिटी घट जाती है।
- ❓ किस तत्व के निर्माण के कारण अच्छी जोत वाली मिट्टी का रंग गहरा भूरा हो जाता है? ➡️ ह्यूमस (Humus) के कारण।
- ❓ खेत की जुताई करने पर मिट्टी के तापमान पर क्या असर होता है? ➡️ ताप परिचालन धीमा होने से गर्मी में तापमान कम और जाड़े में अधिक (अनुकूलन) रहता है।
💡 Tip-Trick (याद रखने की शार्ट-ट्रिक)
- 🚜 Tillage = Task (काम/क्रिया)।
- 🌱 Tilth = Top Condition (मिट्टी की बेहतरीन स्थिति या प्रतिफल)।
- 📉 Bulk Density = अच्छी जोत में हमेशा घटेगी (मिट्टी हल्की और फूली हुई होगी)।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
मृदा की जोत (Soil Tilth) वास्तव में खेती की वह मखमली और जीवंत स्थिति है जिसे हर किसान अपने कठिन श्रम (कर्षण) से हासिल करता है। एक आदर्श जोत न केवल बीजों को अंकुरित होने के लिए नमी और हवा का सही संतुलन (50-50%) देती है, बल्कि मिट्टी की रासायनिक और जैविक सक्रियता को बढ़ाकर फसलों को भरपूर पोषण प्रदान करती है। परीक्षा की दृष्टि से कर्षण और जोत के बारीक अंतर तथा इसके भौतिक प्रभावों को समझना अत्यंत आवश्यक है।
🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)
📝 अध्याय 1.9: कर्षण अभ्यास—पारंपरिक, संरक्षित एवं शून्य कर्षण (Tillage Practices)
यह नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, ICAR, JET Agriculture, MHT CET, और अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत सरल, आकर्षक और पूरी तरह परीक्षा-उपयोगी (Exam-Oriented) तरीके से तैयार किए गए हैं।
🚨 1. प्राकृतिक संसाधन क्षरण: एक गंभीर चुनौती (Soil & Environmental Crisis)
आधुनिक युग में अंधाधुंध और गलत जुताई पद्धतियों के कारण हमारे प्राकृतिक संसाधनों को भारी नुकसान पहुँच रहा है:
- मृदा क्षरण (Soil Erosion): प्रतिवर्ष लगभग 534 करोड़ टन मृदा का क्षरण हो रहा है, जो कि 16.5 टन/हेक्टेयर/वर्ष के बराबर है। इसके कारण बाढ़ और सूखा जैसी आपदाओं की तीव्रता बढ़ रही है।
- खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार: प्रतिवर्ष 27 अरब टन मिट्टी (लगभग 1 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि के बराबर) जलभराव और क्षारीकरण के कारण नष्ट हो रही है।
- डॉ० एम.एस. स्वामीनाथन रिपोर्ट: देश में मिट्टी बहने के कारण सालाना करीब 25 लाख टन नाइट्रोजन, 33 लाख टन फॉस्फेट एवं 25 लाख टन पोटाश की भारी क्षति हो रही है।
- ⏳ मिट्टी निर्माण की गति: सामान्य परिस्थितियों में मृदा की केवल 1 इंच मोटी परत के निर्माण में लगभग 300 से 800 वर्ष का समय लगता है, जबकि आँधी और पानी इसे कुछ ही समय में बहा ले जाते हैं।
- 🌡️ जलवायु परिवर्तन (Climate Change): जीवाश्म ईंधन और अत्यधिक जुताई के कारण वातावरण में
(हरितगृह गैस) बढ़ रही है। तापमान में मात्र की वृद्धि होने पर प्रति हेक्टेयर 4 क्विंटल धान की उत्पादकता कम हो सकती है, जबकि गेहूँ, मक्का, ज्वार और सोयाबीन की उपज में 5% तक की गिरावट आ सकती है।
📂 2. कर्षण पद्धतियों का वर्गीकरण (Types of Tillage Practices)
वैज्ञानिक रैनें एवं जिंग (1957) के अनुसार: "कर्षण के अंतर्गत भूमि पर की जाने वाली वे समस्त क्रियाएँ आती हैं, जिससे मिट्टी की संरचना में परिवर्तन होता है, खरपतवारों का नाश होता है तथा कार्बनिक पदार्थों को उलट-पुलट दिया जाता है।"
कर्षण अभ्यासों को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा गया है:
❶ 🏛️ पारंपरिक कर्षण (Traditional Tillage)
- अवधारणा: पुराने समय से यह मान्यता रही है कि खेत को बार-बार जोतकर जितना महीन (धूल जैसा) कर दिया जाए, फसल उतनी ही अच्छी होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में कहावत प्रसिद्ध थी—"मैदे गेहूँ ढेले चना" (अर्थात गेहूँ के लिए खेत मैदे जैसा महीन और चने के लिए ढेलेदार होना चाहिए)। आलू, मक्का, गन्ना और तंबाकू के लिए 8-10 बार जुताई की जाती थी।
- पारंपरिक कर्षण से होने वाली हानियाँ:
- मिट्टी का दब जाना (Compaction): भारी ट्रैक्टरों और मशीनों के बार-बार चलने से मिट्टी दबकर सघन हो जाती है, जिससे जल और वायु संचार रुक जाता है और विषैले तत्व बढ़ने लगते हैं।
- मृदा अपरदन (Soil Erosion): मिट्टी अत्यधिक महीन होने के कारण हवा और पानी के साथ आसानी से बह या उड़ जाती है।
- कार्बनिक पदार्थों का ऑक्सीकरण (Oxidation of Organic Matter): बार-बार जुताई से गहराई में छिपा कार्बनिक पदार्थ सतह पर आकर ऑक्सीकृत हो जाता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता घटती है और वायुमंडल में
(Greenhouse effect) बढ़ती है। - लागत में वृद्धि (High Cost): बार-बार ट्रैक्टर या हल चलाने से खेती का खर्च बहुत बढ़ जाता है।
❷ 🚜 संरक्षित / न्यूनतम कर्षण (Conservation / Minimum Tillage)
- अवधारणा: आधुनिक शोधों के बाद पारंपरिक अधिक जुताई की विचारधारा को खारिज कर दिया गया है। अब वैज्ञानिक मानते हैं कि अधिकांश फसलों के लिए मात्र 2 या 3 कर्षण पर्याप्त हैं।
- परिभाषा: "न्यूनतम कर्षण, कर्षण की वह कम से कम संख्या है जहाँ तक मिट्टी के भौतिक गुणों में कोई ह्रास नहीं होता और फसल की उपज में भी कोई गिरावट नहीं आती।"
- आदर्श तरीका: अधिकांश फसलों के लिए एक बार मिट्टी पलट हल से गहरी जुताई और दो बार हैरो (Harrow) चलाना सबसे उपयुक्त माना गया है।
- प्रमुख लाभ:
- खेती की लागत (Cost of Cultivation) और समय की बचत होती है।
- मिट्टी सघन (Compact) नहीं होती और इसकी मूल संरचना बची रहती है।
- भू-क्षरण (Soil Erosion) कम होता है और भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है।
- कार्बन मिट्टी में संचित रहता है जिससे हरितगृह प्रभाव (Greenhouse effect) में कमी आती है।
❸ 🌾 शून्य कर्षण (Zero Tillage / No-Tillage)
- अवधारणा: यह न्यूनतम कर्षण की चरम सीमा है। इसके अंतर्गत खेत की कोई जुताई (Ploughing) नहीं की जाती और न ही खड़ी फसल में कोई अंतःकर्षण (Inter-culturing) कार्य होता है।
- परिभाषा: "शून्य कर्षण भूमि की सतह की वह यांत्रिक छेड़छाड़ है जो केवल बीज को मिट्टी के नीचे पहुँचाने (सीड ड्रिल द्वारा) और पहियों के आवागमन तक ही सीमित है।"
- प्रक्रिया: खेत के खरपतवारों को शाकनाशियों (Herbicides) के द्वारा नष्ट कर दिया जाता है और पिछली फसल के अवशेषों के बीच ही सीड ड्रिल (Seed Drill) मशीन से सीधे नए बीज बो दिए जाते हैं। ज़मीन पर पड़े डंठल और अवशेष पलवार (Mulch) का काम करते हैं, जो नमी को उड़ाने से रोकते हैं।
- कहाँ उपयुक्त है? यह तकनीक वैसे क्षेत्रों के लिए सर्वोत्तम है जहाँ की मिट्टी कम सघन हो, मिट्टी में पर्याप्त रंध्रावकाश (Pore-space) हो और जैविक सक्रियता (Microbial Activity) अधिक हो।
- ⚠️ दीर्घकालिक शून्य कर्षण से होने वाली हानियाँ:
- इसके लगातार अभ्यास से खेतों में बहुवर्षीय खरपतवार बहुत अधिक पनपने लगते हैं।
- मिट्टी जनित (Soil-borne) कीटों और रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है।
💡 Tip-Trick: परीक्षाओं के लिए हाइब्रिड रणनीति
🌟 परीक्षा उपयोगी युक्ति: वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि पर्यावरण और जेब दोनों को बचाने के लिए पारंपरिक कर्षण अभ्यास, न्यूनतम कर्षण और शून्य कर्षण को चक्रीय क्रम (Rotationally) में अपनाना चाहिए। इससे ऊर्जा की बचत होती है, खरपतवार व कीट भी नियंत्रित रहते हैं और मिट्टी की सेहत भी बनी रहती है।
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे प्रश्न)
- ❓ भारत में प्रति वर्ष प्रति हेक्टेयर औसतन कितनी मिट्टी का क्षरण होता है? ➡️ 16.5 टन/हेक्टेयर/वर्ष।
- ❓ मृदा की 1 इंच मोटी उपजाऊ परत बनने में कितना समय लगता है? ➡️ लगभग 300 से 800 वर्ष।
- ❓ तापमान में
की वृद्धि होने पर धान की उपज में कितनी कमी आ सकती है? ➡️ प्रति हेक्टेयर 4 क्विंटल। - ❓ "मैदे गेहूँ ढेले चना" कहावत किस कर्षण अभ्यास को दर्शाती है? ➡️ पारंपरिक कर्षण (Traditional Tillage)।
- ❓ वैज्ञानिकों के अनुसार अधिकांश फसलों के लिए कितने कर्षण पर्याप्त हैं? ➡️ मात्र 2 से 3 कर्षण (1 गहरी जुताई + 2 हैरो)।
- ❓ शून्य कर्षण (Zero Tillage) में खरपतवारों को कैसे नियंत्रित किया जाता है? ➡️ रासायनिक शाकनाशियों (Herbicides) के द्वारा।
- ❓ लगातार शून्य कर्षण करने का सबसे बड़ा नुकसान क्या है? ➡️ मिट्टी जनित कीट-रोगों और जिद्दी खरपतवारों का प्रकोप बढ़ना।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
अत्यधिक और पारंपरिक जुताई ने पूरी दुनिया में मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है। आज बदलते जलवायु परिवेश और बढ़ती लागत को देखते हुए संरक्षित कर्षण (Minimum Tillage) और शून्य कर्षण (Zero Tillage) समय की मांग बन चुके हैं। ये तकनीकें न केवल किसानों का खर्च और समय बचाती हैं, बल्कि जैविक कार्बन को मिट्टी में संचित रखकर ग्लोबल वार्मिंग जैसी वैश्विक समस्या से लड़ने में भी मदद करती हैं।
🌾 इकाई - 1: कृषि का परिचय एवं कृषि मौसम विज्ञान (Agronomy)
📝 अध्याय 1.10: बुआई, प्रतिरोपण एवं कटाई प्रबंधन (Sowing, Transplanting & Harvesting)
यह विशेष नोट्स BSEB (Bihar Board), BPSC, CUET, ICAR, JET Agriculture, MHT CET, और अन्य सभी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत सरल, आकर्षक और पूरी तरह परीक्षा-उपयोगी (Exam-Oriented) तरीके से तैयार किए गए हैं।
🌱 1. बुआई की मुख्य विधियाँ (Methods of Sowing)
फसल उत्पादन के लिए बीज को मुख्य खेत में सही स्थान, गहराई और दूरी पर रखना ताकि वांछित पौधों की संख्या बनी रहे, बुआई कहलाता है। इसकी मुख्यतः दो श्रेणियाँ हैं:
❶ छिटकवाँ बुआई (Broadcasting)
- क्या है? बीजों को हाथ से पूरे खेत में बिखेर देना। यह सबसे सरल, सस्ती और पुरानी विधि है।
- उपयुक्तता: छोटे बीज वाली फसलों तथा कम दूरी पर लगाई जाने वाली फसलों के लिए (जैसे: धान, गेहूँ, बरसीम, सरसों, मसूर, मूँग आदि)।
- 👍 लाभ: समय और श्रम (Labor) की भारी बचत होती है; किसी विशेष यंत्र की आवश्यकता नहीं होती।
- 👎 हानि: बीज की गहराई और दूरी पर कोई नियंत्रण नहीं रहता। जो बीज ऊपर रह जाते हैं उन्हें पक्षी खा जाते हैं; जो गहरे चले जाते हैं वे सड़ जाते हैं। बीज अधिक लगता है, सिंचाई में अधिक पानी बहता है और निकाई-गुड़ाई में कठिनाई होती है।
❷ पंक्तियों में बुआई (Line / Row Sowing)
पंक्तियों में बोई गई फसल में गहराई और दूरी पर पूरा नियंत्रण होता है, जिससे पौधों के बीच भोजन व प्रकाश के लिए होने वाली प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है। इसीलिए कहा गया है—"पंक्ति में शक्ति"। इसके मुख्य तरीके हैं:
- (क) देशी हल के पीछे बीज बोना: खेत की अंतिम जुताई के समय एक व्यक्ति हल चलाता है और दूसरा व्यक्ति हल के पीछे बनी हराई (चोंगा/Pora या हाथ से) में बीज डालता जाता है।
- कमी: पंक्तियों और बीजों की दूरी हमेशा एक समान नहीं रह पाती।
- (ख) डिबलर (Dibbler) द्वारा बुआई: डिबलर लकड़ी या लोहे का एक फ्रेम होता है जिसमें खूँटियाँ लगी होती हैं। इसे नम खेत की मिट्टी में दबाकर छेद बनाए जाते हैं और प्रत्येक छेद में 1-2 दाने हाथ से डालकर ढक दिए जाते हैं।
- लाभ: बीज की सर्वाधिक बचत होती है। नई किस्मों के बीजों को तेजी से बढ़ाने (Multiplication) के लिए यह सर्वोत्तम विधि है। पौधे स्वस्थ रहते हैं और कल्ले (Tillers) अधिक निकलते हैं।
- (ग) सीड ड्रिल (Seed Drill) / शून्य जुताई मशीन: आधुनिक कृषि की सर्वश्रेष्ठ विधि। इसमें ट्रैक्टर या बैलों द्वारा संचालित मशीन से एक साथ—उचित दूरी व गहराई पर बीज डालना, खाद (उर्वरक) डालना और मिट्टी से ढकने का काम एक साथ होता है।
- (घ) मेढ़ों पर बुआई (Ridge Sowing): समतल खेत के बजाय मेढ़ों (Ridges) या कूटों पर बीज लगाना (जैसे: आलू, मक्का, चुकंदर आदि)। इससे कंद और जड़ों के विकास के लिए पर्याप्त ढीली मिट्टी मिलती है।
🌾 2. प्रतिरोपण या पौध रोपण (Transplanting)
- क्या है? बीजों को सीधे मुख्य खेत में न बोकर पहले नर्सरी (बीजस्थली) में नवजात पौधों (बिचड़ों) को विशेष देख-रेख में उगाया जाता है। जब पौधे तैयार हो जाते हैं, तो उन्हें मुख्य खेत में अनुशंसित दूरी पर रोप दिया जाता है।
- मुख्य फसलें: धान (Rice) और विभिन्न प्रकार की सब्जियां (टमाटर, मिर्च, प्याज, बैंगन आदि)।
- 👍 लाभ: कोमल अवस्था में पौधों की सुरक्षा, पानी, उर्वरक और कीट प्रबंधन कम खर्च में छोटे क्षेत्र (नर्सरी) में आसानी से हो जाता है। मुख्य खेत की तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है।
- 👎 हानि: मानव श्रम अधिक लगता है और खर्च बढ़ता है (नोट: अब धान के प्रतिरोपण के लिए पैडी ट्रांसप्लांटर मशीनें भी आ गई हैं)।
⚙️ 3. बुआई / प्रतिरोपण के मुख्य प्रबंधन बिंदु
सटीक अंकुरण और अधिकतम उपज के लिए ३ बिंदुओं का प्रबंधन आवश्यक है:
- 📅 समय का निर्धारण: बुआई का समय स्थानीय तापमान, मिट्टी की नमी, दीप्तिकाल (Photoperiod) और फसल की किस्म (प्रभेद) पर निर्भर करता है।
- 📐 बीज बोने की गहराई: गहराई का निर्धारण फसल की किस्म, बीज के आकार, भूमि के प्रकार और मिट्टी में नमी की मात्रा के अनुसार होता है।
- ⚖️ बीज की मात्रा व दूरी: भूमि की उर्वरता, बोने का उद्देश्य (चारा या अनाज), बीज का अंकुरण प्रतिशत और वजन के आधार पर दूरी तय की जाती है।
✂️ 4. कटाई प्रबंधन (Harvesting Management)
फसलों की कटाई कृषि का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील चरण है क्योंकि यह पूरे सीजन की मेहनत का परिणाम होता है।
📌 कटाई के मौलिक सिद्धांत:
- दैहिक परिपक्वता (Physiological Maturity): फसलों को पक जाने के तुरंत बाद इसी अवस्था में काटना चाहिए। अधिक पकने पर दाने खेत में ही झड़ने (Shattering) लगते हैं और गुणवत्ता खराब हो जाती है।
- कच्ची अवस्था में कटाई के अपवाद: कुछ परिस्थितियों में फसल को थोड़ा पहले या कम पकी स्थिति में काटा जाता है:
- जब पकने पर दाने झड़ने की प्रवृत्ति अधिक हो।
- सब्जियां और फल जिन्हें दूर के बाजारों में भेजना हो।
- यदि पकने के समय ओला, भारी बारिश या बाढ़ की आशंका हो।
- 📉 दानों में नमी: कटाई और मड़ाई के बाद भंडारण (Storage) के समय दानों में नमी केवल 8-12 प्रतिशत होनी चाहिए, अन्यथा गोदामों में घुन (कीट) और फफूंद पूरी फसल नष्ट कर देंगे।
🚜 कटाई के आधुनिक यंत्र:
- छोटे स्तर पर कटाई हंसिया (Sickle) से की जाती है।
- बड़े स्तर पर फसलों को काटने के लिए रीपर (Reaper), मोअर (Mower) और कंदों को निकालने के लिए डिगर (Digger) का उपयोग होता है।
- कम्बाइन (Combine Harvester): यह आधुनिक युग की महा-मशीन है जो एक साथ कटाई, मड़ाई (Threshing) और ओसाई (Winnowing) का कार्य करती है।
- 🚫 विशेष चेतावनी: कम्बाइन से कटाई के बाद किसान अक्सर पुआल और अवशेषों को खेत में ही जला देते हैं। यह एक अत्यंत गलत और पर्यावरण-विरोधी गतिविधि है, जिससे मिट्टी के मित्र-कीट नष्ट हो जाते हैं और प्रदूषण बढ़ता है।
🍉 विभिन्न विशिष्ट फसलों की कटाई के तरीके
- 1. गन्ने (Sugarcane) की कटाई: गन्ने की कटाई तब करनी चाहिए जब निचली सूखी पत्तियां गिरने लगें और शर्करा मान (Brix Value) लगभग 18 प्रतिशत हो जाए। गन्ने को हमेशा ज़मीन के बिल्कुल पास (जड़ के पास) से काटना चाहिए।
- 2. आलू, चुकंदर व मूँगफली की कटाई: ये फसलें भूमि के अंदर होती हैं। जब पत्तियां पीली पड़कर सूखने लगें, तब डिगर (Digger) या हाथ से खुदाई की जाती है। खुदाई के समय कंदों/फलियों को चोट नहीं लगनी चाहिए, अन्यथा वे गोदाम में सड़ जाएंगे।
- 3. जूट, पटसन तथा सनई की कटाई: ये रेशे (Fibre) वाली फसलें हैं। इनकी कटाई का सबसे सर्वोत्तम समय फूल आने की अवस्था (Flowering Stage) है। देर से काटने पर रेशा मोटा व घटिया हो जाता है और जल्दी काटने पर रेशा कमजोर रह जाता है।
- 4. चारे (Fodder) की फसलों की कटाई: चारे की फसलों (जैसे बरसीम) को काटने का सबसे अच्छा समय फूल आने का होता है क्योंकि इस समय मात्रा और पौष्टिकता (पाचनशीलता) का सबसे अच्छा संतुलन होता है। ट्रिक: बरसीम को काटते समय ज़मीन से थोड़ा ऊपर से काटें ताकि नीचे की कलियों से नई शाखाएं दोबारा निकल सकें।
🎯 Exam-Points (परीक्षा के लिए सीधे प्रश्न)
- ❓ "पंक्ति में शक्ति" का सिद्धांत कृषि की किस क्रिया से संबंधित है? ➡️ पंक्तियों में बुआई (Line Sowing) से।
- ❓ बीज की सर्वाधिक बचत और कल्ले (Tillers) निकालने के लिए सबसे अच्छी मैन्युअल विधि कौन सी है? ➡️ डिबलर (Dibbler) विधि।
- ❓ आलू और मक्के की बुआई मुख्य रूप से कहाँ की जाती है? ➡️ मेढ़ों पर (Ridge Sowing)।
- ❓ नर्सरी में बिचड़े तैयार कर मुख्य खेत में लगाने की प्रक्रिया क्या कहलाती है? ➡️ प्रतिरोपण (Transplanting)।
- ❓ भंडारण (Storage) के समय दानों में नमी का प्रतिशत कितना होना चाहिए? ➡️ 8 से 12 प्रतिशत (
)। - ❓ एक ही साथ कटाई, मड़ाई और ओसाई करने वाली आधुनिक मशीन को क्या कहते हैं? ➡️ कम्बाइन हार्वेस्टर (Combine Harvester)।
- ❓ गन्ने की परिपक्वता मापने के लिए ब्रिक्स (Brix) मान कितना होना चाहिए? ➡️ लगभग 18 प्रतिशत (
)। - ❓ जूट और पटसन की कटाई किस अवस्था में करनी चाहिए? ➡️ फूल आने की अवस्था (Flowering Stage) में।
💡 Tip-Trick (याद रखने की ट्रिक)
- डिबलर (Dibbler) = डीलक्स बचत ➡️ बीज की सबसे ज्यादा बचत करने वाली खूँटीदार मशीन।
- कम्बाइन (Combine) = कम्बाइंड (जुड़ा हुआ) ➡️ काटना + झाड़ना + साफ़ करना तीनों काम एक साथ।
- रेशा (Fibre) = फूल अवस्था ➡️ जूट को हमेशा 'फूल' आते ही काटो, तभी रेशा चमकीला और मजबूत मिलेगा।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
बुआई से लेकर कटाई तक का सफर कृषि का सबसे संवेदनशील चक्र है। जहाँ सीड ड्रिल और डिबलर जैसी तकनीकें बीजों की बर्बादी रोककर पौधों की सही संख्या सुनिश्चित करती हैं, वहीं प्रतिरोपण विधि सब्जियों और धान को शुरुआती सुरक्षा देती है। अंत में, दैहिक परिपक्वता पर सही यंत्रों (जैसे कम्बाइन या डिगर) से कटाई और भंडारण के समय नमी का सही प्रबंधन (
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