🌍 इकाई-1 (ख): जल संसाधन (Water Resources)
① 💧 जल संसाधन की संकल्पना और स्रोत (Concept & Sources of Water)
- महत्व: जल जीवन की उत्पत्ति और विकास का मुख्य आधार है. जल की प्रचुरता के कारण ही पृथ्वी को 'नीला ग्रह' (Blue Planet) कहा जाता है.
- सभ्यता का विकास: विश्व की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं का विकास नदी घाटियों में हुआ है.
- नवीकरणीय संसाधन: जल एक नवीकरणीय संसाधन है, जिसका जलीय चक्र (Hydrological Cycle) द्वारा निरंतर पुनर्भरण और नवीकरण होता रहता है.
- 🧩 जल का वैश्विक वितरण (Global Distribution):
- 🌊 महासागरीय जल: विश्व के कुल जल-आयतन का 96.5% भाग महासागरों (खारे पानी) में संचित है. इसलिए महासागरों को 'जलधि' भी कहते हैं.
- 🧊 अलवणीय (मृदु/मीठा) जल: पृथ्वी पर मात्र 2.5% जल ही मीठा या पीने योग्य है.
- इस मृदु जल का लगभग 75% भाग अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फ की चादर या हिमनद (Glaciers) के रूप में है.
- मात्र लगभग 25% मृदु जल ही भूमिगत जल और सतही स्वच्छ जल के रूप में उपलब्ध है.
🗺️ मुख्य रूप से उपयोग में आने वाले स्रोत:
- भू-पृष्ठीय जल (Surface Water): इसका मुख्य स्रोत वर्षण (वर्षा) है. वर्षा का 20% भाग वाष्पित हो जाता है, कुछ भाग भूमि में रिस जाता है और अधिकांश भाग नदी, नालों, झीलों और तालाबों में मिल जाता है.
- भूमिगत जल (Groundwater): वर्षा जल जब धरातलीय छिद्रों से रिस-रिस कर कठोर चट्टानी आवरणों पर जमा होता है, तो उसे भूमिगत जल या भौम जल कहते हैं.
② 🌐 जल संसाधन का असमान वितरण (Inequality of Water Distribution)
- गोलार्द्धों के अनुसार: पृथ्वी का अधिकांश जल दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थित है, इसलिए दक्षिणी गोलार्द्ध को 'जल गोलार्द्ध' और उत्तरी गोलार्द्ध को 'स्थल गोलार्द्ध' कहा जाता है.
- 🇮🇳 भारत में स्थिति:
- भारत में विश्व की लगभग 16% आबादी निवास करती है, लेकिन इसके उपयोग के लिए विश्व का मात्र 4% स्वच्छ जल ही उपलब्ध है.
- भारत को प्रतिवर्ष वर्षण से लगभग 4000 घन किमी जल और भू-पृष्ठीय जल से 1869 घन किमी जल प्राप्त होता है.
- देश की तीन मुख्य बड़ी नदियाँ—सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र देश के कुल भू-पृष्ठीय जल का लगभग 2/3 भाग वहन करती हैं.
- भारत की कुल उपयोग योग्य जल भंडारण क्षमता स्वतंत्रता के समय मात्र 18 अरब घन मीटर थी, जो आज बढ़कर लगभग 174 अरब घन मीटर हो गई है.
- गंगा द्रोणी (Basin) में उपयोग के योग्य जल भंडारण की क्षमता सर्वाधिक है, जबकि अनुपातिक दृष्टि से ताप्ती नदी का स्थान प्रथम (97% क्षमता) है.
③ ⚠️ जल संकट : मात्रात्मक एवं गुणात्मक ह्रास (Water Crisis)
जल की अनुपलब्धता या कमी ही जल संकट कहलाती है.
Ⓐ मात्रात्मक ह्रास (Quantitative Scarcity)
- घटती प्रति व्यक्ति उपलब्धता: 1951 में भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 5177 घन मीटर थी, जो 2001 में घटकर 1829 घन मीटर रह गई और 2025 तक इसके घटकर 1342 घन मीटर होने की संभावना है.
- कारण: तीव्र जनसंख्या वृद्धि, बढ़ता औद्योगिकीकरण, नगरीकरण और कृषि में नलकूपों द्वारा भूमिगत जल का अंधाधुंध दोहन.
🌟 परीक्षा का अचूक मंत्र (Exam Pointer) स्वीडन के विशेषज्ञ फॉल्कन मार्क के अनुसार: प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन 1000 घन मीटर जल की आवश्यकता होती है। इससे कम जल की उपलब्धता 'जल संकट' कहलाती है.
Ⓑ गुणात्मक ह्रास (Qualitative Degradation)
जल की प्रचुर मात्रा होने के बावजूद प्रदूषित होने के कारण वह उपयोग योग्य नहीं रह जाता.
- कारण: घरेलू और औद्योगिक अवशिष्टों, रसायनों और कीटनाशकों का जल में मिलना.
- 🏭 उदाहरण: अकेले कानपुर में 180 चमड़े के कारखाने हैं, जो प्रतिदिन 58 लाख लीटर मल-जल गंगा नदी में विसर्जित करते हैं.
- घातक प्रभाव:
- बिहार और पश्चिम बंगाल के कुछ भागों में जल के अतिदोहन से संख्या (Arsenic) का संकेंद्रण बढ़ा है.
- राजस्थान और महाराष्ट्र में जल में फ्लोराइड की मात्रा में अत्यधिक वृद्धि हुई है.
④ 🏗️ बहुउद्देशीय परियोजनाएँ (Multi-Purpose River Valley Projects)
ऐसी नदी घाटी परियोजनाएँ जिनसे एक साथ कई उद्देश्यों (जैसे- बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, पर्यटन) की पूर्ति होती है, बहुउद्देशीय परियोजनाएँ कहलाती हैं.
- आधुनिक भारत का मंदिर: देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इन परियोजनाओं को गर्व से "आधुनिक भारत का मंदिर" कहा था.
- मुख्य परियोजनाएँ: भाखड़ा-नांगल, हीराकुंड (महानदी पर), दामोदर, सोन परियोजना आदि.
🚫 परियोजनाओं के दोष और जन-विरोध:
- बाँध बनाने से नदियों का प्राकृतिक प्रवाह रुक जाता है, जिससे तल पर अवसादीकरण (Sedimentation) तेज होता है और जलीय जीवों के भोजन व प्रजनन में बाधा आती है.
- स्थानीय लोगों का अपनी जमीन और आजीविका से विस्थापन होता है, जिसके बदले उन्हें पर्याप्त मुआवजा या लाभ नहीं मिल पाता.
- प्रमुख आंदोलन: 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' (सरदार सरोवर बाँध के विरोध में गुजरात में चलाया गया एक NGO आंदोलन) और 'टिहरी बाँध आंदोलन'.
⑤ 🛡️ जल संरक्षण एवं प्रबंधन (Water Conservation & Management)
बढ़ते संकट को देखते हुए सरकार ने 'सितंबर 1987' में 'राष्ट्रीय जल नीति' स्वीकृत की, जिसे बाद में संशोधित कर 'राष्ट्रीय जल नीति 2002' के रूप में प्रस्तुत किया गया.
🛠️ संरक्षण की प्रमुख विधियाँ:
- भूमिगत जल की पुनर्पूर्ति: पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने 'जल मिशन' के तहत भूमिगत जल रिचार्ज पर बल दिया था. इसके लिए वृक्षारोपण, तालाबों/वेटलैंड्स का संरक्षण और रेन वाटर हार्वेस्टिंग जरूरी है.
- जल संभर प्रबंधन (Watershed Management): जल प्रवाह या जल जमाव का उपयोग कर कृषि, उद्यानिकी और जल कृषि को बढ़ावा देना.
- तकनीकी विकास: सिंचाई की ऐसी पद्धतियाँ अपनाना जिससे कम जल में अधिक लाभ हो, जैसे—ड्रिप सिंचाई (Drip Irrigation), लिफ्ट सिंचाई और सूक्ष्म फुहार (Micro Sprinkler).
🌧️ वर्षा जल संग्रहण की पारंपरिक विधियाँ (Rainwater Harvesting)
- पहाड़ी क्षेत्रों में: 'गुल' या 'कुल' (पश्चिमी हिमालय) जैसी वाहिकाएँ बनाकर खेतों में सिंचाई की जाती है.
- पश्चिम बंगाल में: बाढ़ के मैदानों में सिंचाई के लिए 'बाढ़ जल वाहिकाएँ' बनाई जाती हैं.
- राजस्थान (शुष्क क्षेत्रों) में:
- खादीन और जोहड़: शुष्क क्षेत्रों में वर्षा जल को एकत्रित करने के लिए बनाए जाने वाले गड्ढे और कृत्रिम जलाशय.
- टाँका (Tanka): घरों के आँगन में बनाया जाने वाला भूमिगत टैंक, जिसमें छत पर संग्रहित वर्षा जल को पाइप के माध्यम से सुरक्षित रखा जाता है. राजस्थान का 'तरुण भारत संघ' (NGO) इस दिशा में सराहनीय कार्य कर रहा है.
- गंडाथूर (कर्नाटक): मैसूर जिले के इस गाँव के 200 घरों में छत जल संग्रहण की बेहतरीन व्यवस्था है, जो जल संरक्षण की एक मिसाल है.
🗺️ बिहार की विशेष परियोजना : सोन परियोजना (Son Project - Case Study)
- ऐतिहासिक महत्व: यह बिहार की सबसे प्राचीन और पहली नदी घाटी परियोजना है.
- स्थापना: ब्रिटिश सरकार द्वारा 1874 ई० में मुख्य रूप से सिंचित भूमि और फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए विकसित की गई थी.
- नहर प्रणाली: डेहरी (रोहतास) के समीप से पूर्व और पश्चिम दो दिशाओं में नहरें निकाली गई हैं, जिनकी कुल लंबाई 130 किमी है.
- पूर्वी सोन नहर: पटना, गया और औरंगाबाद जिलों की लगभग 3 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचित करती है.
- पश्चिमी सोन नहर: इसकी तीन उपशाखाएँ हैं जो भोजपुर, बक्सर और रोहतास जिलों को लाभान्वित करती हैं.
🌟 परीक्षा का अचूक बिंदु (Exam Hotspot) 1968 ई० में डेहरी से 10 किमी दूर इंद्रपुरी नामक स्थान पर बैराज (बाँध) का निर्माण किया गया. इस बहुउद्देशीय परियोजना के कारण सोन का यह सूखाग्रस्त क्षेत्र आज बिहार का 'चावल का कटोरा' (Rice Bowl of Bihar) कहलाता है.
- विद्युत उत्पादन: पश्चिमी नहर शाखा पर डेहरी के समीप 6.6 मेगावाट और पूर्वी नहर शाखा पर बारूण के समीप 3.3 मेगावाट के जल-विद्युत शक्ति गृह स्थापित हैं.
- बिहार की अन्य प्रमुख परियोजनाएँ: गंडक परियोजना, कोसी परियोजना, दुर्गावती जलाशय परियोजना, ऊपरी किऊल जलाशय परियोजना और बागमती परियोजना [0.1.41, 42].
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
जल केवल एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि संपूर्ण जैव जगत और मानव सभ्यता का जीवन रक्षक है. औद्योगिकीकरण और लिप्सा के कारण उत्पन्न हुए मात्रात्मक और गुणात्मक जल संकट से निपटने के लिए हमें जल संभर प्रबंधन, ड्रिप सिंचाई और पारंपरिक वर्षा जल संग्रहण (जैसे टाँका और खादीन) को अपनाना होगा. सोन जैसी प्राचीन परियोजनाओं का आधुनिक प्रबंधन और 'सतत जल विकास' ही हमारी भावी पीढ़ी की जल सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है.
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