📖 अध्याय 1: लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी (Power Sharing in Democracy)
🎯 कक्षा 10 - राजनीति विज्ञान (Political Science) | BSEB, BPSC & Competitive Exams

🌟 परिचय (Introduction)
- लोकतंत्र का केंद्र बिंदु: लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जनता (लोग) ही शासन के केंद्र बिंदु होते हैं। यह जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा चलाया जाने वाला शासन है।
- सामाजिक विषमता और द्वंद्व: समाज में मौजूद जातीय, सांप्रदायिक और लैंगिक विविधताएं लोकतांत्रिक व्यवहार को प्रभावित करती हैं। लोकतंत्र इन सभी विभिन्नताओं और असमानताओं के बीच सामंजस्य (Accommodation) बैठाकर सर्वमान्य समाधान निकालने का प्रयास करता है।
🥊 लोकतंत्र में द्वंद्ववाद (Conflict in Democracy)
लोकतांत्रिक राजनीति समाज में उभरने वाले विभिन्न सामाजिक संघर्षों और द्वंद्वों से प्रभावित होती है। इसे हम निम्नलिखित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय उदाहरणों से समझ सकते हैं:
1. क्षेत्रीय भावना और आंतरिक प्रवासन (भारत का उदाहरण)
- मुंबई (महाराष्ट्र): 1961 में मुंबई में मराठियों की संख्या 34% थी, जो 2001 में बढ़कर 57% से अधिक हो गई। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे पिछड़े राज्यों के हिंदी भाषी लोग (जिन्हें वहां "भैया" कहा जाता है) काम की तलाश में मुंबई आते हैं। वे छोटे रोजगार करके अपनी सस्ती सेवाएं देते हैं।
- वित्तीय राजधानी: पिछड़े राज्यों के लोग बैंकों में जो पैसा जमा करते हैं, उसका केवल एक-चौथाई हिस्सा ही वहां ऋण के रूप में मिलता है; बाकी पैसा मुंबई जैसे विकसित केंद्रों में लगता है, जिससे मुंबई भारत की "वित्तीय राजधानी" बनी है।
- क्षेत्रीय हिंसा: कुछ राजनेताओं ने अपने राजनीतिक लाभ (तुष्टीकरण) के लिए 'मराठी मानुष' की भावना भड़काकर उत्तर भारतीयों पर हिंसक हमले किए। इसी तरह मैसूर (कर्नाटक) में रेलवे भर्ती परीक्षा में बिहारी छात्रों के साथ मारपीट और असम में बिहारियों की हत्या की घटनाएं क्षेत्रीय विभाजन का उदाहरण हैं।
- संविधान का उल्लंघन: यह हिंसा हमारे संविधान के अनुच्छेद 19 (देश के किसी भी भाग में रहने, बसने और आजीविका कमाने की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 15 (धर्म, वंश, जाति या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध) के सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ है।
2. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विभाजन के रूप
- मैक्सिको ओलंपिक (1968): यहाँ विरोध का आधार नस्ल और रंग (श्वेत बनाम अश्वेत) था। एफ्रो-अमेरिकी धावक टोमी स्मिथ और जॉन कार्लोस ने पदक समारोह में अश्वेतों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध में आवाज उठाई। उनका साथ ऑस्ट्रेलियाई श्वेत धावक पीटर नॉर्मन ने दिया।
- बेल्जियम (भाषाई विभाजन): यहाँ विभाजन का आधार भाषा है (नस्ल या जाति नहीं):
- 59% लोग फ्लेमिश इलाके में रहते हैं और डच बोलते हैं।
- 40% लोग बेलोनिया क्षेत्र में रहते हैं और फ्रेंच बोलते हैं।
- राजधानी ब्रुसेल्स में 80% फ्रेंच और 20% डच भाषी हैं। फ्रेंच भाषी अधिक समृद्ध हैं, जिससे दोनों समूहों में तनाव बढ़ा।
- श्रीलंका: यहाँ सामाजिक विभाजन क्षेत्रीय और सामाजिक (भाषाई/धार्मिक) दोनों स्तरों पर जटिल है।
🧬 सामाजिक भेदभाव एवं विविधता की उत्पत्ति
सामाजिक विभिन्नताएं दो प्रकार से उत्पन्न होती हैं:
- जन्म आधारित विभाजन: व्यक्ति को अपनी जाति या समुदाय चुनने का अधिकार नहीं होता। जन्म से ही वह किसी खास समुदाय (जैसे दलित परिवार में जन्मा बच्चा), लिंग (स्त्री/पुरुष), या शारीरिक बनावट (काला/गोरा, लंबा/नाटा) का हिस्सा बन जाता है।
- पसंद या इच्छा आधारित विभाजन: कुछ विभाजन हमारी पसंद से होते हैं। जैसे- अपनी इच्छा से धर्म बदलना, नास्तिक बनना, या अपनी पसंद का पेशा (किसान, वकील, व्यापारी, सरकारी सेवक) चुनना।
🆚 सामाजिक विभिन्नता और सामाजिक विभाजन में अंतर
- हर विभिन्नता विभाजन नहीं बनती: कोई आवश्यक नहीं है कि सभी सामाजिक विभिन्नताएं देश को बांट दें। कभी-कभी अलग-अलग समुदाय के लोगों के विचार भिन्न हो सकते हैं, लेकिन उनके हित या उद्देश्य समान हो सकते हैं।
- उदाहरण: मुंबई में हिंसा का शिकार हुए उत्तर भारतीयों की जातियां और धर्म अलग-अलग थे, लेकिन उनका क्षेत्र (उत्तर भारतीय) और हित समान था। इसी प्रकार, बेल्जियम में डच और जर्मन बोलने वाले लोग खुद को सर्वप्रथम 'बेल्जियाई' मानते हैं। भारत में भी तमाम विविधताओं के बावजूद लोग खुद को पहले 'भारतीय' मानते हैं।
- विभाजन कब होता है? सामाजिक विभाजन तब होता है जब एक सामाजिक अंतर दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और बड़ा हो जाता है (Social difference overlaps with other differences)।
- उदाहरण: भारत में सवर्णों और दलितों का अंतर, क्योंकि दलित आमतौर पर गरीब, वंचित और बेघर हैं, जबकि सवर्ण समृद्ध हैं। इससे दलितों को महसूस होने लगता है कि वे एक अलग समुदाय के हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण: उत्तरी आयरलैंड और नीदरलैंड दोनों ईसाई बहुल देश हैं जहाँ प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक रहते हैं। उत्तरी आयरलैंड में कैथोलिक गरीब और शोषित हैं (यहाँ धर्म और वर्ग में गहरी समानता है), इसलिए वहाँ हिंसक टकराव होता है। नीदरलैंड में दोनों अमीर-गरीब हैं, इसलिए वहाँ टकराव नहीं होता।
🧭 सामाजिक विभाजन के तीन निर्धारक तत्व (Three Determinants)
सामाजिक विभाजन की राजनीति मुख्य रूप से तीन तत्वों पर निर्भर करती है:
| तत्व | विवरण |
|---|---|
| 1. अपनी पहचान के प्रति नजरिया | यदि लोग अपनी पहचान को सिर्फ अपने उपराष्ट्रीय या स्थानीय समूह तक सीमित रखेंगे (जैसे खुद को सिर्फ कैथोलिक या मराठी मानना), तो संघर्ष बढ़ेगा। यदि वे अपनी बहु-स्तरीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा मानेंगे (जैसे- बेल्जियाई या भारतीय), तो देश अखंड रहेगा। |
| 2. राजनीतिक दलों की भूमिका | राजनीतिक दल किसी समुदाय की मांगों को कैसे उठाते हैं। संविधान के दायरे में आने वाली और दूसरे समुदायों को नुकसान न पहुँचाने वाली मांगों को मानना आसान होता है। युगोस्लाविया में नेताओं ने ऐसी मांगें रखीं जो देश की सीमा में पूरी नहीं हो सकती थीं, जिससे देश टूट गया। |
| 3. सरकार का रुख | सरकार इन मांगों पर क्या प्रतिक्रिया देती है। यदि सरकार पिछड़ों और वंचितों की न्यायपूर्ण मांगों को दबाएगी, तो देश विखंडन की ओर जाएगा (जैसे श्रीलंका में तमिलों के साथ हुआ)। भारत में सरकार ने सामाजिक न्याय को उचित मानकर सत्ता में साझेदारी दी, जिससे देश में समरसता बनी रही। |
🏛️ सामाजिक विभाजन के तीन प्रमुख रूप: जाति, धर्म और लिंग
(क) जाति और राजनीति (Caste and Politics)
- जाति व्यवस्था की परिभाषा: पेशे पर आधारित वंशानुगत सामुदायिक व्यवस्था जब स्थायी और रूढ़िवादी हो जाती है, तो उसे जाति कहते हैं। इसमें अंतर-जातीय विवाह और खान-पान पर कड़े प्रतिबंध होते हैं।
- वर्ण-व्यवस्था: यह जाति समूहों की एक पदानुक्रम (Hierarchy) व्यवस्था है। हिंदुओं में इसका क्रम: ब्राह्मण ➡️ क्षत्रिय ➡️ वैश्य ➡️ शूद्र है। निचले पायदान पर मौजूद जातियों को 'अंत्यज' (Untouchables/अछूत) कहा गया और उनके साथ छुआछूत का अमानवीय व्यवहार हुआ।
- सुधारक: ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर और पेरियार रामास्वामी नायकर जैसे समाज सुधारकों ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
- आधुनिक बदलाव: शहरीकरण, साक्षरता में वृद्धि, आर्थिक विकास और पेशा चुनने की आजादी के कारण जाति व्यवस्था के पुराने बंधन कमजोर हुए हैं।
📊 जाति और आर्थिक असमानता (वर्ष 1999-2000 के आंकड़े)
आर्थिक असमानता का एक बड़ा आधार जाति है। गरीबी रेखा से नीचे (BPL) जीवन जीने वालों का प्रतिशत अनुपात इस प्रकार था:
- अनुसूचित जनजातियाँ (ST): ग्रामीण - 45.8% | शहरी - 35.6%
- अनुसूचित जातियाँ (SC): ग्रामीण - 35.9% | शहरी - 38.3%
- हिंदू अगड़ी जातियाँ (General): ग्रामीण - 11.7% | शहरी - 9.9%
🗳️ राजनीति में जाति के रूप:
- उम्मीदवार का चयन: पार्टियां चुनाव क्षेत्र के जातीय समीकरण को देखकर ही टिकट देती हैं ताकि जरूरी वोट बैंक मिल सके।
- जातिगत भावनाएं भड़काना: कुछ राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए जातिगत भावनाओं को उभारते हैं।
- सकारात्मक पहलू: चुनाव के समय दलित और नीची जातियों का महत्व बढ़ जाता है; उच्च वर्ग के उम्मीदवार भी उनके सामने वोट के लिए झुकते हैं, जिससे इन जातियों में आत्मगौरव और राजनैतिक चेतना जागृत होती है।
- जातिगत राजनीति की सीमाएं: कोई भी चुनाव क्षेत्र सिर्फ एक जाति का नहीं होता। यदि जातीय भावना अटूट होती, तो सत्तारूढ़ पार्टियां कभी चुनाव नहीं हारतीं। राजनेताओं की लोकप्रियता उनके जातीय मुखौटे से नहीं बल्कि उनके कामकाज से तय होती है।
(ख) धर्म, सांप्रदायिकता एवं राजनीति (Religion and Communalism)
- गांधीजी का विचार: गांधीजी ने कहा था कि "धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता"। उनका तात्पर्य किसी विशेष धर्म (हिंदू या इस्लाम) से नहीं, बल्कि धर्म द्वारा स्थापित नैतिक मूल्यों से था, जो राजनीति को सही दिशा दें।
👹 सांप्रदायिकता (Communalism) क्या है?
जब कोई समाज यह मानना शुरू कर देता है कि धर्म ही सामाजिक समुदाय का निर्माण करता है और एक धर्म के विचार दूसरे धर्म से श्रेष्ठ हैं, तो सांप्रदायिकता का जन्म होता है। इसमें एक धार्मिक समूह अपनी मांगों को दूसरे के विरोध में खड़ा करता है और राज्य की सत्ता का उपयोग किसी एक धर्म के पक्ष में होने लगता है, जिससे हिंसक दंगे (Riots) होते हैं।
- बहुसंख्यकवाद का उदाहरण: श्रीलंका में 1956 में सिंहली भाषा को एकमात्र राजभाषा घोषित करना और बौद्ध धर्म को संरक्षण देना।
- भयावह रूप: सांप्रदायिकता के कारण देश का विभाजन, दंगे और नरसंहार होते हैं (जैसे भारत-पाकिस्तान विभाजन और उत्तरी आयरलैंड/युगोस्लाविया का संकट)।
🕊️ भारत का धर्मनिरपेक्ष मॉडल (Secular State)
सांप्रदायिकता से बचने के लिए भारतीय संविधान निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्ष शासन को चुना:
- भारत में किसी भी धर्म को राजकीय धर्म (जैसे श्रीलंका में बौद्ध या पाकिस्तान में इस्लाम) का दर्जा नहीं दिया गया है।
- हर नागरिक को किसी भी धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता है।
- धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव पूरी तरह असंवैधानिक है।
- धार्मिक समानता स्थापित करने के लिए सरकार धार्मिक मामलों में सकारात्मक दखल दे सकती है (जैसे छुआछूत पर रोक)।
(ग) लैंगिक मसले और राजनीति (Gender Issues)
- श्रम का लैंगिक विभाजन (Sexual Division of Labour): समाज की यह रूढ़िवादी सोच कि औरतों की मुख्य जिम्मेदारी सिर्फ घर चलाना, खाना बनाना और बच्चों का पालन-पोषण करना है, जबकि पुरुषों का काम बाहर धन कमाना है। इसका आधार जैविक नहीं बल्कि सामाजिक रूढ़िवादिता है।
- कृषि में महिलाओं का योगदान: भारत में कुल महिला कामगारों में से 75% महिलाएँ कृषि क्षेत्र में हैं, जबकि ग्रामीण महिला कामगारों में 85% कृषि से जुड़ी हैं। लेकिन विडंबना यह है कि उन्हें पुरुषों के बराबर मेहनताना और श्रेय नहीं मिलता।
- भारत में लैंगिक असमानता के सूचक:
- साक्षरता दर: महिलाओं में साक्षरता दर केवल 54% है, जबकि पुरुषों में 76% है।
- उच्च पद: ऊँची तनख्वाह और ऊँचे पदों पर महिलाओं की संख्या बेहद कम है।
- कन्या भ्रूण हत्या: लैंगिक पूर्वाग्रह के कारण देश के कई हिस्सों में लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व: महिलाओं के उत्थान के लिए सत्ता पर उनका नियंत्रण जरूरी है। हालांकि, भारत की लोकसभा में महिला प्रतिनिधियों का प्रतिशत अभी भी 11% से नीचे है। विकसित देशों (जैसे ग्रेट ब्रिटेन - 19.3%, अमेरिका - 16.3%) में भी यह स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। स्कैंडिनेवियाई देशों (स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड) में महिलाओं की भागीदारी का स्तर काफी ऊँचा है।
📜 विक्टर ह्यूगो का प्रसिद्ध कथन: "पुरुषों के पास दृष्टि होती है; इसीलिए वे चीजों को देख सकते हैं, और स्त्रियों के पास अंतर्दृष्टि होती है, इसीलिए वे अपेक्षाकृत अधिक दूर तक देख सकती हैं।"
📝 मुख्य प्रश्नावली एवं उत्तर-संकेत (BSEB Exam Questions)
प्रश्न 1. 'हर सामाजिक विभिन्नता सामाजिक विभाजन का रूप नहीं लेती'। कैसे?
- उत्तर-संकेत: लोग विभिन्न समुदायों से होने के बावजूद समान उद्देश्यों या हितों के कारण एकजुट हो सकते हैं। जैसे बेल्जियम के लोग अलग भाषा बोलते हुए भी खुद को बेल्जियाई मानते हैं। मैक्सिको ओलंपिक में नॉर्मन श्वेत होकर भी अश्वेतों के नस्लवाद विरोधी आंदोलन के साथ थे। अतः जब तक अंतर बहुत गहरा नहीं होता, तब तक विभिन्नता विभाजन का रूप नहीं लेती।
प्रश्न 2. सामाजिक अंतर कब और कैसे सामाजिक विभाजनों का रूप ले लेते हैं?
- उत्तर-संकेत: जब एक सामाजिक अंतर दूसरी अनेक विभिन्नताओं से ऊपर और बड़ा हो जाता है (Overlaps), तब वह सामाजिक विभाजन का रूप ले लेता है। जैसे- जब किसी वर्ग को यह लगने लगे कि वे गरीब, शोषित और समाज में अलग-थलग (जैसे भारत में दलित या उत्तरी आयरलैंड में कैथोलिक) हैं, तब सामाजिक विभाजन पैदा होता है।
प्रश्न 3. "लोकतंत्र सामाजिक विभाजनों को संभालने का सबसे अच्छा तरीका है।" क्या आप सहमत हैं?
- उत्तर-संकेत: हाँ, लोकतंत्र में विभिन्न समुदाय शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से अपनी शिकायतें जाहिर कर सकते हैं और चुनावों के माध्यम से दबाव बनाकर उनका समाधान पा सकते हैं। लोकतंत्र विविधताओं के बीच संतुलन स्थापित करता है। (अतः प्रश्नावली का प्रश्न 6 का सही विकल्प (घ) होगा क्योंकि लोकतंत्र समाज को विखंडन की ओर नहीं ले जाता बल्कि जोड़ता है)।
💡 Exam Tips & Memory Tricks 🧠
- Article 15: '15' से याद रखें 'No Discrimination' (जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध)।
- Article 19: '19' से याद रखें 'Freedom' (देश में कहीं भी रहने, बसने और व्यापार करने की आजादी)।
- Determinants Trick (3P): सामाजिक विभाजन के 3 तत्व = Perception of Identity (पहचान), Political Demands (राजनीतिक मांग), Policy of Government (सरकार का रुख)।
- Belgium vs Sri Lanka: बेल्जियम ने सत्ता की साझेदारी अपनाकर देश को टूटने से बचाया, जबकि श्रीलंका ने बहुसंख्यकवाद थोपकर गृहयुद्ध को बढ़ावा दिया।
🏁 निष्कर्ष (Conclusion)
लोकतंत्र में सामाजिक विविधताओं और विभाजनों की राजनीतिक अभिव्यक्ति एक सामान्य और स्वस्थ राजनीति का लक्षण है। यह विभिन्न समूहों के बीच संतुलन बनाती है और किसी भी आंदोलन को उग्र होने से रोकती है। बशर्ते, सरकार सभी वर्गों को सत्ता में उचित हिस्सेदारी (Power Sharing) दे और देश की एकता व अखंडता को सर्वोपरि रखे।
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