📖 अध्याय 2: सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली (Working of Power Sharing)
🎯 कक्षा 10 - राजनीति विज्ञान (Political Science) | BSEB, CBSE, BPSC & Competitive Exams

🌟 परिचय (Introduction)
- राजनैतिक प्रक्रिया का मूल: लोकतांत्रिक राजनीति और राजनैतिक प्रक्रिया के मूल में सत्ता की साझेदारी (Power Sharing) का प्रयास होता है.
- सामाजिक सामंजस्य: लोकतंत्र विभिन्न सामाजिक, भाषायी और धार्मिक समूहों को शासन में उचित अभिव्यक्ति और पहचान देकर समाज में समाहित करता है. इसके लिए सत्ता के विभाजन के व्यापक प्रावधान किए जाते हैं.
- संघीय व्यवस्था (Federal System): सत्ता की साझेदारी की सबसे प्रभावकारी और लोकप्रिय कार्यप्रणाली 'संघीय शासन व्यवस्था' है.
🏛️ सत्ता की साझेदारी की आवश्यकता एवं महत्व
- सामाजिक शांति और राजनैतिक स्थिरता: जब समाज के विभिन्न समूहों (जाति, धर्म, रंग, भाषा आदि पर आधारित) को शासन और सत्ता में उचित साझेदारी नहीं मिलती, तो उनमें असंतोष और टकराव बढ़ता है. इस टकराव से सामाजिक विभाजन, राजनैतिक अस्थिरता, सांस्कृतिक ठहराव और आर्थिक गतिरोध पैदा होता है.
- अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण:
- बेल्जियम (सफल मॉडल): बेल्जियम ने अपने यहाँ के डच और फ्रेंच भाषायी समूहों के बीच पनपते तनाव को सत्ता में बराबर साझीदार बनाकर दूर किया. इसके लिए उन्होंने अपने संविधान में विशेष संशोधन किए.
- श्रीलंका (विफल मॉडल): श्रीलंका के बहुसंख्यक सत्ताधारी सिंहली समुदाय ने अल्पसंख्यक तमिल समुदाय के हितों की निरंतर उपेक्षा की, जिसके कारण वहाँ भीषण गृह युद्ध (Civil War) भड़क गया.
- निष्कर्ष: सत्ता में साझेदारी की व्यवस्था राजनैतिक समाज की एकता, अखंडता और वैधता की पहली अनिवार्य शर्त है.
📊 लोकतंत्र बनाम गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ
- पुरानी मान्यता का खंडन: लंबे समय से यह माना जाता था कि राजनैतिक सत्ता का बँटवारा नहीं हो सकता और निर्णय लेने की शक्ति किसी एक व्यक्ति या समूह के पास ही रहनी चाहिए. लोकतंत्र ने सत्ता विभाजन को अपना मूल आधार बनाकर इस रूढ़िवादी धारणा का पूरी तरह खंडन कर दिया है.
- लोकतांत्रिक व्यवस्था: इसमें जनता ही सारी शक्तियों का मुख्य स्रोत होती है. लोक स्वशासन की संस्थाओं के माध्यम से शासन चलाते हैं और सार्वजनिक फैसलों में सबकी भागीदारी सुनिश्चित होती है. यह सामाजिक विभाजनों और प्रतिद्वंदिताओं को संभालने की बेहतरीन प्रक्रिया विकसित कर लेती है.
- गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ (राजशाही/तानाशाही): गैर-लोकतांत्रिक सरकारें आंतरिक सामाजिक समूहों के मतभेदों और विविधताओं की या तो उपेक्षा करती हैं या उन्हें बलपूर्वक दबा देती हैं. यहाँ आम नागरिकों के लिए सत्ता में साझेदारी की कोई संभावना नहीं होती.
🔄 आधुनिक लोकतंत्र में सत्ता की साझेदारी के विविध रूप
लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में सत्ता का बँटवारा विभिन्न तरीकों से किया जाता है:
1. सत्ता का क्षैतिज वितरण (Horizontal Distribution)
- विवरण: जब सरकार के एक ही स्तर पर उसके विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का बँटवारा होता है, तो उसे सत्ता का क्षैतिज वितरण कहते हैं.
- अंग: विधायिका (Legislature), कार्यपालिका (Executive) और न्यायपालिका (Judiciary).
- विशेषता: ये सभी अंग एक ही स्तर पर रहकर अपनी-अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हैं. इससे किसी एक अंग के पास सत्ता का केंद्रीकरण नहीं हो पाता और दुरुपयोग की संभावना खत्म हो जाती है.
- 🎯 नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances): इस व्यवस्था में प्रत्येक अंग एक-दूसरे पर नियंत्रण रखता है, जिससे शक्तियों का संतुलन बना रहता है. यह व्यवस्था भारत और अमेरिका जैसे देशों में लागू है.
2. सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण (Vertical Distribution)
- विवरण: जब सरकार के विभिन्न स्तरों (ऊपर से नीचे) पर सत्ता का बँटवारा होता है, तो उसे सत्ता का ऊर्ध्वाधर वितरण कहा जाता है.
- स्तर: पूरे देश के लिए एक सामान्य केंद्रीय सरकार, प्रांतीय/क्षेत्रीय स्तर पर राज्य सरकारें, और उनके नीचे के स्तर पर स्थानीय स्वशासन (जैसे पंचायत और नगरपालिका).
- संवैधानिक गारंटी: इन विभिन्न स्तरों की सरकारों के बीच शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा संविधान या लिखित दस्तावेज द्वारा किया जाता है. इसी व्यवस्था को आमतौर पर संघवाद (Federalism) कहा जाता है.
3. राजनैतिक दल और गठबंधन की राजनीति
- विवरण: राजनैतिक दल सत्ता के बँटवारे के सबसे जीवंत वाहक और माध्यम होते हैं. अलग-अलग दल विभिन्न विचारधाराओं और सामाजिक समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं.
- गठबंधन सरकार (Coalition Government): सत्ता की साझेदारी का सबसे प्रत्यक्ष रूप तब दिखाई देता है जब दो या दो से अधिक दल मिलकर चुनाव लड़ते हैं या सरकार का गठन करते हैं. इसमें विभिन्न क्षेत्रीय हितों और सामाजिक समूहों वाले दल एक साथ मिलकर सरकार के स्तर पर सत्ता साझा करते हैं.
4. दबाव समूह और संगठित हित समूह
- विवरण: लोकतंत्र में व्यापारी, उद्योगपति, किसान, शिक्षक और औद्योगिक मजदूर जैसे संगठित हित समूह भी सक्रिय भूमिका निभाते हैं.
- प्रभाव: ये समूह सरकारी समितियों में प्रतिनिधि बनकर या सरकार पर अप्रत्यक्ष रूप से दबाव डालकर उसके फैसलों को प्रभावित करते हैं. जब समाज के विभिन्न हित समूह सक्रिय होते हैं, तो किसी एक अकेले समूह का प्रभुत्व कायम नहीं हो पाता.
- उदाहरण: नेपाल में राजशाही के अंत के लिए जनआंदोलन, बोलिविया का जलयुद्ध, सूचना के अधिकार (RTI) का आंदोलन और महिलाओं के लिए आरक्षण का संघर्ष सत्ता में साझेदारी पाने के ही प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष उदाहरण हैं.
🗺️ संघवाद: अर्थ, विशेषताएँ और गठन (Federalism)
⚙️ संघीय शासन व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ:
- सर्वोच्च सत्ता का विभाजन: सर्वोच्च सत्ता केंद्र सरकार और उसकी विभिन्न प्रांतीय या क्षेत्रीय इकाइयों के बीच बँट जाती है.
- दोहरी सरकार: यहाँ दोहरे स्तर की सरकारें होती हैं—एक केंद्रीय सरकार (राष्ट्रीय महत्व के विषयों के लिए) और दूसरी प्रांतीय सरकार (स्थानीय महत्व के विषयों के लिए).
- स्वायत्तता और जवाबदेही: प्रत्येक स्तर की सरकार अपने क्षेत्र में स्वायत्त (Autonomous) होती है और लोगों के प्रति उत्तरदायी होती है.
- एक ही नागरिक समूह पर शासन: अलग-अलग स्तर की सरकारें एक ही नागरिक समूह पर शासन करती हैं, लेकिन नागरिकों की पहचान दोहरी होती है (जैसे—कोई व्यक्ति बिहारी या बंगाली होने के साथ-साथ भारतीय भी होता है).
- लिखित एवं कठोर संविधान: सरकारों के अधिकार संविधान में स्पष्ट रूप से दर्ज होते हैं जो उनकी शक्तियों का मूल स्रोत है. संविधान के मूल प्रावधानों को कोई एक स्तर की सरकार अकेले नहीं बदल सकती; इसके लिए दोनों स्तरों की सरकारों की सहमति आवश्यक होती है.
- स्वतंत्र न्यायपालिका: केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के बँटवारे या कानूनी विवादों को सुलझाने के लिए एक स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायालय (न्यायपालिका) की व्यवस्था होती है जो संविधान के रक्षक के रूप में कार्य करती है.
🧪 संघीय व्यवस्था के गठन के दो तरीके:
| 1. साथ आकर संघ बनाना (Coming Together) | 2. बड़े देश को विभाजित कर संघ बनाना (Holding Together) |
|---|---|
| कई स्वतंत्र और संप्रभु राज्य आपस में मिलकर सामान्य संप्रभुता को स्वीकार करते हैं और एक बड़े संघ का गठन करते हैं. | किसी बड़े देश को प्रशासनिक सुविधा और विविधताओं को संभालने के लिए अनेक राजनैतिक/प्रांतीय इकाइयों में बाँट दिया जाता है. |
| इसमें संघ में शामिल होने वाले राज्यों के अधिकार समान होते हैं और वे केंद्र की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होते हैं (अवशिष्ट शक्तियां राज्यों के पास होती हैं). | इसमें राज्यों की अपेक्षा केंद्र सरकार ज्यादा शक्तिशाली होती है। अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र सरकार को दी जाती हैं. |
| उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रेलिया. | उदाहरण: भारत, बेल्जियम, स्पेन. |
🇮🇳 भारत में संघीय व्यवस्था (Federal System in India)
भारत भौगोलिक दृष्टिकोण से विशाल और जाति, धर्म, भाषा व संस्कृति की विविधताओं से भरा देश है. स्वतंत्रता के समय देश की 563 देशी रियासतों को एकजुट रखने और राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा के लिए हमारे संविधान निर्माताओं ने संघीय व्यवस्था को चुना.
📑 शक्तियों का विधायी विभाजन (तीन सूचियाँ):
┌────────────────────────────────────────┐
│ भारतीय संविधान की सूचियाँ │
└───────────────────┬────────────────────┘
│
┌───────────────────┼───────────────────┐
▼ ▼ ▼
संघ सूची राज्य सूची समवर्ती सूची
(Union List) (State List) (Concurrent List)
• राष्ट्रीय महत्व • स्थानीय/प्रांतीय • केंद्र और राज्य
के विषय। महत्व के विषय। दोनों के लिए महत्व।
• रक्षा, विदेश नीति, • जेल, स्वास्थ्य, • शिक्षा, वन, विवाह
संचार, मुद्रा। शिक्षा, पुलिस। आदि।
• कानून केवल केंद्र • कानून केवल राज्य • दोनों कानून बना
सरकार बनाएगी। सरकार बनाएगी। सकते हैं।
(टकराव होने पर
केंद्र का कानून मान्य)- 🔍 अवशिष्ट विषय (Residuary Powers): जो विषय इन तीनों सूचियों में शामिल नहीं हैं, उन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार को दिया गया है.
🗽 भारतीय संघ की अनूठी विशेषता: संघात्मकता में एकात्मकता की आत्मा
भारतीय संविधान निर्माताओं ने विविधताओं को समेटने के साथ-साथ विघटनकारी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार को अत्यंत शक्तिशाली बनाया है:
- राज्यों की सीमाओं पर संसद का नियंत्रण: संसद किसी भी राज्य के अस्तित्व, नाम या उसकी भौगोलिक सीमा में परिवर्तन कर सकती है.
- आपातकालीन प्रावधान: आपातकाल लागू होने पर हमारी संघीय व्यवस्था पूर्णतः केंद्रीकृत व्यवस्था (एकात्मक) में बदल जाती है और सारी शक्तियां केंद्र के पास आ जाती हैं.
- वित्तीय नियंत्रण: आय के प्रमुख और बड़े संसाधनों पर केंद्र का नियंत्रण होता है। केंद्र सरकार अपने विशेषाधिकार से राज्यों को ऋण एवं अनुदान देती है.
- राज्यपाल की भूमिका: राज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा होती है। वह राज्य विधानमंडल के विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित रख सकता है और विधानसभा भंग करने की सिफारिश भी भेज सकता है, जो अक्सर विवाद का विषय रहता है.
- इकहरी प्रशासनिक व्यवस्था: IAS/IPS जैसे चयनित केंद्रीय अधिकारी राज्यों के प्रशासन का कार्य करते हैं, लेकिन राज्य सरकार न तो उनके विरुद्ध कोई सीधी अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है और न ही उन्हें सेवा से हटा सकती है.
- सैनिक शासन (अनुच्छेद 33 व 34): किसी क्षेत्र में सैनिक शासन लागू होने पर संघ सरकार की शक्तियां अत्यधिक बढ़ जाती हैं.
🌐 अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य और भारत की भाषानीति
- विफलता के उदाहरण: अत्यधिक केंद्रीकरण और क्षेत्रीय आकांक्षाओं की उपेक्षा के कारण सोवियत संघ (USSR) का 1989 में विखंडन हो गया. इसी तरह चेकोस्लोवाकिया, युगोस्लाविया और पाकिस्तान को भी विभाजन का दुःख झेलना पड़ा.
- भारत की भाषानीति (Language Policy): श्रीलंका में भाषागत भेदभाव राजनैतिक अस्थिरता का कारण बना, लेकिन भारत ने लचीली नीति अपनाई.
- हमारे संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा/राजभाषा का दर्जा दिया गया, जो लगभग 40% आबादी की भाषा है.
- गैर-हिंदी भाषी राज्यों (विशेषकर तमिलनाडु के उग्र आंदोलन) की मांग पर सरकारी कामकाज में हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी के प्रयोग की अनुमति जारी रखी गई.
- 1991 की जनगणना के अनुसार भारत में 114 प्रमुख भाषाएं पाई गईं. संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाओं को स्थान दिया गया है, जिन्हें 'अनुसूचित भाषाएँ' कहा जाता है.
🏘️ भारत में सत्ता का विकेंद्रीकरण (Decentralization)
विकेंद्रीकरण: जब केंद्र और राज्य सरकार से शक्तियां लेकर स्थानीय स्वशासी निकायों/सरकारों को दी जाती हैं, तो इसे सत्ता का विकेंद्रीकरण कहते हैं.
- मूल भावना: स्थानीय समस्याओं की समझ स्थानीय लोगों को सबसे बेहतर होती है. स्थानीय स्तर पर फैसलों में आम जनता की सीधी भागीदारी से लोगों में लोकतांत्रिक भागीदारी की आदत पड़ती है और लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं.
- संवैधानिक प्रावधान: संविधान के अनुच्छेद 40 (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) में ग्राम पंचायतों के गठन और उन्हें सक्षम बनाने का निर्देश दिया गया है.
- ऐतिहासिक शुरुआत: राष्ट्रीय स्तर पर पंचायती राज प्रणाली की विधिवत शुरुआत बलवंत राय मेहता समिति की अनुशंसा पर 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान के नागौर जिले से हुई थी.
- 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन (1992): पूरे देश में स्थानीय स्वशासन में एकरूपता लाने के लिए दिसंबर 1992 में संसद द्वारा ऐतिहासिक संशोधन पारित किए गए:
- 73वाँ संशोधन: इसके द्वारा ग्रामीण स्थानीय शासन (पंचायती राज) को संवैधानिक दर्जा देकर संविधान में भाग-9 (अनुच्छेद 243) और 11वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें 29 विषयों का उल्लेख है.
- 74वाँ संशोधन: इसके द्वारा नगरीय स्वशासन व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई और संविधान में 12वीं अनुसूची जोड़ी गई.
🌾 बिहार में पंचायती राज व्यवस्था (त्रिस्तरीय ढांचा)
बिहार में स्वशासन की जड़ें लिच्छवी गणतंत्र (वैशाली) के समय से ही बहुत पुरानी हैं. बलवंत राय मेहता समिति के सुझाव पर बिहार में त्रिस्तरीय पंचायती राज ढांचा लागू है, जिसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है:
📊 बिहार का त्रिस्तरीय पंचायती राज ढांचा
[ स्तर ] [ संस्था ] [ मुख्य कार्यकारी ]
1. जिला स्तर ➡️ जिला परिषद् ➡️ अध्यक्ष / उपाध्यक्ष
2. प्रखंड स्तर ➡️ पंचायत समिति ➡️ प्रमुख / प्रखंड विकास
पदाधिकारी (BDO)
3. ग्राम स्तर ➡️ ग्राम पंचायत ➡️ मुखिया / पंचायत सेवक(क) ग्राम पंचायत (Gram Panchayat)
- गठन: राज्य सरकार औसतन 7000 की आबादी को आधार मानकर ग्राम पंचायत स्थापित करती है. प्रत्येक पंचायत लगभग 500 की आबादी वाले वार्डों (सामान्यतः 15-16 वार्ड) में विभाजित होती है.
- प्रधान: ग्राम पंचायत का प्रधान मुखिया होता है और उसकी सहायता के लिए एक उपमुखिया होता है. सरकार की ओर से पंचायत सेवक सचिव की भूमिका निभाता है.
- आरक्षण का ऐतिहासिक कदम: बिहार पंचायती राज अधिनियम, 2006 के तहत महिलाओं के लिए संपूर्ण सीटों में 50% आरक्षण का प्रावधान किया गया है. इसके अतिरिक्त SC, ST और पिछड़े वर्गों को भी जनसंख्या के आधार पर आरक्षण प्राप्त है.
- हटाने की प्रक्रिया: वार्ड सदस्य दो-तिहाई बहुमत से अविश्वास प्रस्ताव पारित कर मुखिया/उपमुखिया को पद से हटा सकते हैं.
📦 ग्राम पंचायत के चार प्रमुख अंग:
- ग्रामसभा: यह पंचायत की व्यवस्थापिका सभा (Legislature) है. पंचायत क्षेत्र के सभी वयस्क नागरिक (18 वर्ष या अधिक) इसके सदस्य होते हैं. वर्ष में कम-से-कम चार बार इसकी बैठक अनिवार्य है, जिसकी अध्यक्षता मुखिया करता है.
- मुखिया: पंचायत की कार्यपालिका का प्रधान.
- ग्राम रक्षा दल (दलपति): यह गाँव की एक प्रकार की पुलिस व्यवस्था है, जिसमें 18 से 30 वर्ष के युवक शामिल होते हैं. इसके नेता को दलपति कहते हैं, जिस पर गाँव की सुरक्षा का उत्तरदायित्व होता है.
- ग्राम कचहरी: यह ग्राम पंचायत की अदालत (Judiciary) है. इसका प्रधान निर्वाचित सरपंच होता है और प्रति 500 की आबादी पर एक पंच चुना जाता है. सरपंच को दीवानी और फौजदारी दोनों क्षेत्रों में अधिकतम 10,000 रुपये तक के मामलों की सुनवाई का अधिकार है. इसकी तकनीकी सहायता के लिए बिहार सरकार द्वारा न्याय मित्र (कानूनी सहयोगी) और न्याय सचिव (दस्तावेज रक्षक) नियुक्त किए जाते हैं.
(ख) पंचायत समिति (Panchayat Samiti)
- गठन: प्रति 5000 की आबादी पर पंचायत समिति का एक सदस्य प्रत्यक्ष चुना जाता है.
- प्रमुख अधिकारी: निर्वाचित सदस्य अपने बीच से एक प्रमुख और एक उपप्रमुख चुनते हैं. प्रमुख पंचायत समिति का प्रधान होता है और वह प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) पर नियंत्रण रखता है. BDO पंचायत समिति का पदेन सचिव होता है और उसके निर्णयों को क्रियान्वित करता है. यह ग्राम पंचायत और जिला परिषद् के बीच की मजबूत कड़ी है.
(ग) जिला परिषद् (Zila Parishad)
- गठन: प्रति 50,000 की आबादी पर जिला परिषद् का एक सदस्य प्रत्यक्ष चुना जाता है. जिले की सभी पंचायत समितियों के प्रमुख इसके पदेन सदस्य होते हैं.
- अध्यक्ष: सदस्य अपने बीच से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष चुनते हैं. पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए प्रत्येक 5 वर्ष पर 'राज्य वित्त आयोग' का गठन राज्यपाल द्वारा किया जाता है.
🏢 बिहार में नगरीय शासन-व्यवस्था (Urban Local Bodies)
बिहार में प्राचीन काल से ही (मेगास्थनीज की पुस्तक इंडिका और चाणक्य के अर्थशास्त्र में पाटलिपुत्र के नगर प्रशासन का वर्णन है) नगरीय स्वशासन का गौरवशाली इतिहास रहा है. वर्तमान में बिहार में कोई महानगर नहीं है, अतः यहाँ नगरीय शासन की तीन प्रकार की संस्थाएं कार्यरत हैं:
🏢 बिहार की नगरीय शासन व्यवस्था
[ संस्था ] [ जनसंख्या का आधार ] [ मुख्य पदाधिकारी ]
1. नगर पंचायत ➡️ 12,000 से 40,000 तक ➡️ अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष
2. नगर परिषद् ➡️ 2,00,000 से 3,00,000 तक ➡️ मुख्य पार्षद /
कार्यपालक पदाधिकारी
3. नगर निगम ➡️ 3,00,000 (3 लाख) से अधिक ➡️ महापौर (Mayor) /
नगर आयुक्त- आरक्षण: बिहार के नगर निकायों में भी महिलाओं के लिए 50% स्थान आरक्षित हैं.
1. नगर पंचायत (Nagar Panchayat)
- ग्रामीण से शहरी रूप लेने वाले छोटे कस्बों में गठित होती है. शर्त यह है कि यहाँ के 3/4 वयस्क लोग कृषि से भिन्न कार्यों में लगे हों. सदस्यों की संख्या 10 से 37 होती है.
2. नगर परिषद् (Nagar Parishad)
- इसके चार प्रमुख अंग होते हैं: नगर पर्षद, समितियाँ, अध्यक्ष/उपाध्यक्ष और कार्यपालक पदाधिकारी (राज्य सरकार द्वारा नियुक्त मुख्य प्रशासनिक अधिकारी).
- कार्य: इसके कार्य दो श्रेणियों में विभक्त हैं—अनिवार्य कार्य (सफाई, रोशनी, जलापूर्ति, प्राथमिक शिक्षा, जन्म-मृत्यु पंजीकरण) और ऐच्छिक कार्य (पार्क, पुस्तकालय, गरीबों के लिए आवास आदि बनाना).
3. नगर निगम (Nagar Nigam)
- ऐतिहासिक तथ्य: भारत में सर्वप्रथम 1688 ई. में मद्रास (चेन्नई) में और बिहार में सर्वप्रथम 1952 में पटना में नगर निगम की स्थापना की गई थी.
- वार्ड संरचना: नगर निगम क्षेत्र कई वार्डों में बँटा होता है। बिहार में वार्डों की न्यूनतम संख्या 37 और अधिकतम 75 हो सकती है (जैसे—पटना नगर निगम में 72 वार्ड हैं).
- प्रमुख अंग:
- निगम परिषद्: यह निगम की मुख्य नीति-निर्माता सभा है जिसके चुने हुए सदस्यों को वार्ड पार्षद (काउंसलर) कहते हैं. इसकी बैठक हर महीने होती है.
- महापौर (Mayor): निगम परिषद् अपने सदस्यों के बीच से 5 वर्ष के लिए एक महापौर और उपमहापौर चुनती है. महापौर नगर का प्रथम नागरिक और परिषद् का सभापति होता है.
- सशक्त स्थानीय समिति: यह कार्यपालिका की तरह काम करती है और इसके निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं. इसकी अध्यक्षता भी महापौर ही करता है.
- नगर आयुक्त (Municipal Commissioner): यह बिहार सरकार द्वारा नियुक्त IAS स्तर का मुख्य कार्यकारी और प्रशासक होता है, जो परिषद् के निर्णयों को धरातल पर लागू करता है.
🎯 प्रश्नावली हल (BSEB Objective Questions Solved)
प्रश्न 1. संघ राज्य की विशेषता नहीं है: (क) लिखित संविधान (ख) शक्तियों का विभाजन (ग) इकहरी शासन-व्यवस्था (घ) सर्वोच्च न्यायपालिका
- सही उत्तर: (ग) इकहरी शासन-व्यवस्था (क्योंकि संघीय राज्य में दोहरी शासन व्यवस्था होती है)।
प्रश्न 2. संघ सरकार का उदाहरण है: (क) अमेरिका (ख) चीन (ग) ब्रिटेन (घ) इनमें से कोई नहीं
- सही उत्तर: (क) अमेरिका (चीन और ब्रिटेन एकात्मक शासन व्यवस्था वाले देश हैं)।
प्रश्न 3. भारत में संघ एवं राज्यों के बीच अधिकारों का विभाजन कितनी सूचियों में हुआ है? (क) संघीय सूची, राज्य सूची (ख) संघीय सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची
- सही उत्तर: (ख) संघीय सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची।
💡 Exam Tips & Memory Tricks 🧠
- Checks and Balances ⚖️: शक्तियों के क्षैतिज वितरण (Horizontal) को ही 'नियंत्रण और संतुलन' की व्यवस्था कहते हैं, क्योंकि इसमें तीनों अंग (विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका) एक ही धरातल पर रहकर एक-दूसरे को चेक करते हैं.
- 73 और 74 का अंतर 📜: 1992 का 73वाँ संशोधन ग्रामीण (पंचायती राज) के लिए था और 74वाँ संशोधन नगरीय (नगरपालिका/निगम) शासन के लिए था.
- सरपंच की अदालत 🔨: ग्राम कचहरी का सरपंच केवल 10,000 रुपये तक के दीवानी और फौजदारी मामलों का निपटारा कर सकता है. एग्जाम में यह संख्या बार-बार पूछी जाती है।
- पहला नगर निगम 🏙️: देश का पहला नगर निगम मद्रास (1688) और बिहार का पहला पटना (1952) था.
🏁 निष्कर्ष (Conclusion)
सत्ता में साझेदारी की कार्यप्रणाली यह स्पष्ट करती है कि लोकतंत्र को सशक्त, अक्षुण्ण और शांतिपूर्ण बनाए रखने के लिए शक्तियों का विकेंद्रीकरण और संघवाद अपरिहार्य है. भारत ने एक शक्तिशाली केंद्र के साथ-साथ राज्यों की भाषायी और क्षेत्रीय अस्मिता का सम्मान किया है, जिसके कारण तमाम विविधताओं के बावजूद भारतीय लोकतंत्र आज भी विश्व का सबसे मजबूत स्तंभ बना हुआ है. स्थानीय स्तर पर पंचायती राज और नगरीय निकायों ने सत्ता को समाज के सबसे अंतिम और निचले पायदान तक पहुँचाकर महात्मा गांधी के "ग्राम स्वराज्य" के सपने को सच्चे अर्थों में साकार किया है.
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