📖 अध्याय 3: लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष (Competition and Struggles in Democracy)
🎯 कक्षा 10 - राजनीति विज्ञान (Political Science) | BSEB, CBSE, BPSC & Competitive Exams

🌟 परिचय (Introduction)
- प्रतिस्पर्धा और जनसंघर्ष: पूरे विश्व में लोकतंत्र का विकास प्रतिस्पर्धा और जनसंघर्षों के चलते हुआ है. जब सत्ताधारियों और सत्ता में हिस्सेदारी चाहने वालों के बीच टकराव होता है, तो वह लोकतंत्र की निर्णायक घड़ी कहलाती है.
- संतुलन और सामंजस्य: लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज के विभिन्न वर्गों के परस्पर विरोधी हितों, मांगों और दबावों के बीच संतुलन एवं सामंजस्य बनाना पड़ता है. परस्पर विरोधी मांगों और दबावों के बीच ही लोकतंत्र फलता-फूलता है.
🥊 जनसंघर्ष का अर्थ एवं लोकतंत्र में इसकी भूमिका
- लामबंदी का सहारा: लोकतांत्रिक संघर्ष का समाधान जनता की व्यापक लामबंदी (Mobilization) के सहारे ही संभव है. हालांकि संघर्षों का समाधान संसद या न्यायपालिका जैसी संस्थाओं से भी होता है, लेकिन जनसंघर्ष का मुख्य आधार राजनैतिक संगठन (राजनैतिक दल, दबाव-समूह और आंदोलनकारी समूह) होते हैं.
- तानाशाही पर रोक: जनसंघर्ष सरकार को तानाशाह होने और मनमाने निर्णय लेने से रोकते हैं, क्योंकि सरकारों को हमेशा जनता के आक्रोश का भय बना रहता है.
- आम सहमति के फैसले: यदि सरकार फैसले लेने में जनसाधारण के विचारों की अनदेखी करती है, तो जनसंघर्ष के दबाव में सरकार को आम सहमति से फैसले लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
🗺️ वैश्विक एवं पड़ोसी देशों में जनसंघर्ष के प्रमुख उदाहरण
1. नेपाल में लोकतांत्रिक आंदोलन (अप्रैल 2006)
- पृष्ठभूमि: नेपाल में 1990 के दशक में संवैधानिक राजतंत्र (राजा औपचारिक प्रधान और वास्तविक सत्ता निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास) स्थापित हुआ. राजा वीरेंद्र के बाद नए राजा ज्ञानेन्द्र लोकतांत्रिक शासन के पक्ष में नहीं थे. फरवरी 2005 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को अपदस्थ कर चुनी हुई सरकार को भंग कर दिया.
- सप्तदलीय गठबंधन (SPA): राजा के इस तानाशाही कदम के खिलाफ नेपाल की संसद के सभी बड़े राजनैतिक दलों ने मिलकर 'सप्तदलीय गठबंधन' (Seven Party Alliance) बनाया और काठमांडू में अनिश्चितकालीन बंद का आह्वान किया.
- परिणाम: आंदोलनकारी नागरिकों की संख्या 5 लाख तक पहुँच गई. अंततः 24 अप्रैल 2006 को राजा ज्ञानेंद्र को झुकना पड़ा. उन्होंने सर्वदलीय सरकार और नई संविधान सभा के गठन की मांग स्वीकार की. गिरिजा प्रसाद कोइराला को अंतरिम सरकार का प्रधानमंत्री चुना गया.
2. बोलिविया का जनसंघर्ष (जल-युद्ध)
- पृष्ठभूमि: बोलिविया लातिनी अमेरिका का एक गरीब देश है. विश्व बैंक के दबाव में आकर वहाँ की सरकार ने कोचाबंबा (Cochabamba) शहर में जलापूर्ति (Water Supply) का अधिकार एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) को सौंप दिया.
- कारण: बहुराष्ट्रीय कंपनी ने पानी की कीमतों में चार गुना वृद्धि कर दी, जिससे आम लोगों का मासिक पानी का बिल 1000 रुपये तक जा पहुँचा.
- परिणाम: इसके विरोध में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, श्रमिकों और सामुदायिक नेताओं के नेतृत्व में स्वतःस्फूर्त जनसंघर्ष शुरू हुआ. सरकार द्वारा मार्शल लॉ लगाने के बावजूद जनता पीछे नहीं हटी और अंततः सरकार को झुकना पड़ा. बहुराष्ट्रीय कंपनी के साथ अनुबंध रद्द हुआ और जलापूर्ति पुनः नगरपालिका को सौंपी गई.
3. बांग्लादेश में लोकतंत्र के लिए संघर्ष
- 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के बाद वह धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक व समाजवादी देश बना. लेकिन 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान ने संविधान संशोधन कर संसदीय शासन के स्थान पर अध्यक्षीय प्रणाली लागू की और अपनी 'अवामी लीग' को छोड़कर बाकी सभी दलों को समाप्त कर दिया.
- इसके बाद अगस्त 1975 में सैन्य तख्तापलट में वे मारे गए. लंबे सैन्य शासन और संघर्षों के बाद 29 दिसंबर 2008 को हुए निष्पक्ष आम चुनावों में शेख हसीना के नेतृत्व वाले अवामी लीग गठबंधन को ऐतिहासिक सफलता मिली और लोकतंत्र की पुनर्बहाली हुई.
🇮🇳 भारत के प्रमुख जनआंदोलन एवं संघर्ष
1. बिहार का छात्र आंदोलन और 1975 का आपातकाल
- मुख्य कारण: 1971 के आम चुनाव में कांग्रेस ने 'गरीबी हटाओ' का नारा दिया था, लेकिन इसके बाद देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति बिगड़ गई. बांग्लादेश संकट के कारण शरणार्थियों का बोझ बढ़ा, अमेरिका ने सहायता बंद कर दी और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें अत्यधिक बढ़ गईं. 1972-73 में मानसून की विफलता से कृषि पैदावार में भारी कमी आई.
- आंदोलन की शुरुआत: मार्च 1974 में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, खाद्यान्न की कमी और कीमतों में बेतहाशा वृद्धि के खिलाफ बिहार के छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया.
- जयप्रकाश नारायण (JP) और 'संपूर्ण क्रांति': छात्रों के आमंत्रण पर जयप्रकाश नारायण ने इस शर्त पर नेतृत्व संभाला कि आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहेगा और बिहार से बाहर पूरे देश में फैलेगा. जेपी ने कांग्रेस सरकार को बर्खास्त करने की मांग करते हुए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्र में 'संपूर्ण क्रांति' का आह्वान किया, जिसका उद्देश्य सच्चे लोकतंत्र की स्थापना था.
- 25 जून 1975 का आपातकाल (Emergency): इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी के निर्वाचन को अवैधानिक घोषित करने के बाद राजनीतिक संघर्ष उग्र हो गया. जेपी ने राष्ट्रव्यापी सत्याग्रह और सेना-पुलिस से सरकार के अनुचित आदेश न मानने का आह्वान किया. इसके जवाब में इंदिरा गांधी सरकार ने 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी और जेपी सहित सभी विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया.
- 1977 का ऐतिहासिक चुनाव: 18 महीने के आपातकाल के बाद जनवरी 1977 में चुनावों की घोषणा हुई. सभी विपक्षी दलों ने मिलकर 'जनता पार्टी' का गठन किया और लोकसभा की 542 सीटों में से 330 सीटें जीतकर केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई. इंदिरा गांधी खुद रायबरेली से चुनाव हार गईं.
2. चिपको आंदोलन (Chipko Movement)
- शुरुआत: 1970 के दशक के शुरुआती वर्षों में उत्तराखंड के दो-तीन गाँवों से हुई.
- कारण: वन विभाग ने गाँववालों को खेती के औजार बनाने के लिए 'अंगू' के पेड़ काटने की अनुमति नहीं दी, लेकिन वही जमीन एक खेल-सामग्री निर्माता व्यावसायिक कंपनी को आवंटित कर दी.
- स्वरूप: ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं ने ठेकेदारों से वनों को बचाने के लिए पेड़ों से चिपककर (गले लगाकर) विरोध प्रदर्शन किया. महिलाओं ने पुरुषों की शराबखोरी की लत के खिलाफ भी आवाज उठाई.
- परिणाम: इस आंदोलन की सफलता के रूप में सरकार ने हिमालयी क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए पूर्ण रोक लगा दी.
3. दलित पैंथर्स (Dalit Panthers)
- गठन: महाराष्ट्र में दलित हितों की दावेदारी के लिए 1972 में दलित युवाओं का यह संगठन बना.
- कारण: संविधान में छुआछूत की समाप्ति के बावजूद 1960 व 70 के दशक में दलितों के साथ क्रूर जातिगत अन्याय, सामाजिक भेदभाव और हिंसा जारी थी. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया जैसे दल चुनावी राजनीति में सफल नहीं हो पा रहे थे.
- परिणाम: दलित पैंथर्स के लगातार उग्र विरोध आंदोलनों के कारण सरकार को 1989 में एक व्यापक कड़ा कानून (एट्रोसिटी एक्ट) बनाना पड़ा, जिसमें दलितों पर अत्याचार करने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान किया गया.
4. भारतीय किसान यूनियन (BKU)
- क्षेत्र: हरित क्रांति के मुख्य क्षेत्रों—पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नकदी फसलों (गन्ना और गेहूं) के किसानों का संगठन.
- मुख्य नेता: महेन्द्र सिंह टिकैत.
- मांगें: गन्ने और गेहूं के सरकारी खरीद मूल्य में वृद्धि, अंतरराज्यीय आवाजाही पर पाबंदियों की समाप्ति, समुचित दर पर गारंटीयुक्त बिजली आपूर्ति और किसानों के कर्ज माफ करना.
- तरीका: रैली, धरना, प्रदर्शन और 'जेल भरो अभियान' के जरिए इस यूनियन ने भारतीय राजनीति में एक बेहद प्रभावशाली दबाव समूह की भूमिका निभाई.
5. ताड़ी-विरोधी आंदोलन (Anti-Liquor Movement)
- शुरुआत: 1992 में आंध्र प्रदेश के नेल्लौर जिले के दुबरगंटा (Dubarganta) गाँव से महिलाओं द्वारा स्वतःस्फूर्त ढंग से शुरू हुआ.
- कारण: ग्रामीण पुरुषों में शराब (ताड़ी) की गंभीर लत के कारण वे शारीरिक-मानसिक रूप से कमजोर हो रहे थे और घरेलू अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी.
- नारा: "ताड़ी की बिक्री बंद करो". लगभग 5000 गाँवों की महिलाओं ने इसमें भाग लिया.
- परिणाम: यह आगे चलकर व्यापक महिला आंदोलन बना। इसी राजनैतिक चेतना के परिणामस्वरूप संविधान के 73वें और 74वें संशोधन द्वारा महिलाओं को स्थानीय निकायों में आरक्षण/प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ.
6. नर्मदा बचाओ आंदोलन
- मुद्दा: मध्य भारत की नर्मदा घाटी विकास परियोजना के तहत नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर 30 बड़े, 135 मंझोले और 300 छोटे बांध बनाने का प्रस्ताव था. बांधों के कारण 245 गाँवों के डूबने और करीब ढाई लाख लोगों के बेघर होने की आशंका थी.
- मांग: विस्थापित नागरिकों का समुचित पुनर्वास (Rehabilitation) किया जाए और निर्णय प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की भागीदारी हो.
- उपलब्धि: बांधों के निर्माण का खुला विरोध करते हुए इस आंदोलन ने सरकार को 2003 में राष्ट्रीय पुनर्वास नीति स्वीकार करने के लिए मजबूर किया.
7. सूचना के अधिकार का आंदोलन (RTI Movement)
- शुरुआत: सर्वप्रथम 1990 में राजस्थान के अति पिछड़े क्षेत्र भीम तहसील से हुई.
- नेतृत्व: 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' (MKSS).
- कारण: ग्रामीणों ने प्रशासन से अपने वेतन और भुगतान के सरकारी बिल (मस्टर रोल) उपलब्ध कराने की मांग की, क्योंकि उन्हें मजदूरी में भारी घपले/भ्रष्टाचार का संदेह था.
- परिणाम: आंदोलन के दबाव में राजस्थान सरकार ने पंचायती राज अधिनियम में संशोधन किया. अंततः भारतीय संसद ने 2004 में विधेयक लाकर जून 2005 में 'सूचना का अधिकार अधिनियम' (RTI Act) लागू किया.
👥 राजनैतिक दल: अर्थ, कार्य और चुनौतियाँ
🔍 राजनैतिक दल का अर्थ (Meaning)
सामान्यतया राजनैतिक दल का आशय ऐसे व्यक्तियों के समूह से है जो एक समान उद्देश्य की प्राप्ति (जैसे मतदान करना, चुनाव लड़ना, नीतियाँ तय करना) के लिए एकजुट होते हैं. राजनैतिक दल का अंतिम उद्देश्य 'सत्ता प्राप्त करना' या 'सत्ता को प्रभावित करना' होता है.
- इतिहास: विश्व में सर्वप्रथम राजनैतिक दलों की उत्पत्ति ब्रिटेन में 1688 की गौरवपूर्ण क्रांति के बाद ह्विग (Whig - अब उदारदल) और टोरी (Tory - अब अनुदारदल) के रूप में हुई. भारत में दलीय व्यवस्था की शुरुआत 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना से मानी जाती है.
📝 महत्वपूर्ण तथ्य: राजनैतिक दलों को लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में 'लोकतंत्र का प्राण' (Life blood of democracy) और इसका आधार स्तंभ कहा जाता है.
⚙️ राजनैतिक दलों के प्रमुख कार्य (Functions)
- नीतियाँ एवं कार्यक्रम तय करना: चुनाव लड़ने और जनता का समर्थन पाने के लिए घोषणा-पत्र (Manifesto) के जरिए अपनी नीतियाँ जनता के सामने रखना.
- शसनाचा संचालन: चुनाव में बहुमत प्राप्त करके सरकार बनाना। बहुमत न मिलने पर विपक्ष (Opposition) की भूमिका निभाकर सरकार पर नियंत्रण रखना.
- चुनावों का संचालन: अपने उम्मीदवारों को खड़ा करना और उन्हें जिताने का प्रयास करना.
- लोकमत का निर्माण: जनसभाओं, रैलियों और मीडिया के माध्यम से किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर जनता की राय (Public Opinion) तैयार करना.
- मध्यस्थ का कार्य: जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाना और सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुँचाकर 'पूल-निर्माण' का कार्य करना.
- राजनैतिक प्रशिक्षण: मतदाताओं को मतदान करने, चुनाव लड़ने और रचनात्मक आलोचना करने का राजनैतिक प्रशिक्षण देना.
- गैर-राजनैतिक/रचनात्मक कार्य: बाढ़, सुखाड़, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय राहत कार्य संचालित करना.
🔀 दलीय प्रणाली के रूप एवं प्रतिस्पर्धा का प्रभाव
विश्व में दलीय व्यवस्था के तीन रूप हैं: एकदलीय (उदा. चीन), द्विदलीय (उदा. अमेरिका, ब्रिटेन) और बहुदलीय (उदा. भारत).
- प्रतिस्पर्धा का लाभ: द्विदलीय और बहुदलीय व्यवस्थाओं में दलों के बीच सत्ता प्राप्ति के लिए स्वस्थ प्रतियोगिता होती है. इससे मतदाताओं के पास बेहतर विकल्प उपलब्ध रहते हैं और पार्टियां जनता का समर्थन खोने के डर से अधिक लोक-कल्याणकारी नीतियां बनाती हैं, जिससे लोकतंत्र मजबूत होता है.
⚠️ राजनैतिक दलों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- आंतरिक लोकतंत्र की कमी: दलों के सभी अधिकार कुछ शीर्ष नेताओं या एक ही व्यक्ति के पास सिमट जाते हैं. आंतरिक संगठनात्मक चुनाव समय पर नहीं होते और फैसलों में आम कार्यकर्ताओं की सहमति नहीं ली जाती.
- नेतृत्व का संकट: अधिकांश दलों में सर्वमान्य और योग्य नेताओं की कमी है। युवा पीढ़ी राजनीति को सुरक्षित भविष्य नहीं मानती, जिससे युवाओं और महिलाओं के नेतृत्व का अभाव है.
- वंशवाद (Nepotism): शीर्ष पद पर बैठे नेता अनुचित लाभ लेते हुए अपने सगे-संबंधियों और रिश्तेदारों को ही प्रमुख पदों और टिकटों का वितरण करते हैं, जिससे सामान्य कार्यकर्ता ऊपर नहीं उठ पाता.
- कालेधन एवं अपराधियों का प्रभाव: चुनाव अत्यधिक खर्चीले होने के कारण दल पूंजीपतियों से काला धन लेते हैं और चुनाव के बाद उन्हें अनुचित लाभ पहुँचाते हैं. चुनाव जीतने के लिए बाहुबलियों/अपराधियों की मदद ली जाती है, जिससे राजनीति का अपराधीकरण हो रहा है.
- सिद्धांतहीनता की स्थिति: पार्टियां अपने मूल सिद्धांतों को छोड़कर सिर्फ सत्ता प्राप्ति के लिए किसी भी सीमा तक चली जाती हैं.
- अवसरवादी गठबंधन: स्पष्ट बहुमत न मिलने पर विपरीत विचारधारा वाले दल भी केवल सरकार बनाने के लिए चुनाव के बाद आपस में हाथ मिला लेते हैं, जो अवसरवादिता का परिचायक है.
🛠️ राजनैतिक दलों को प्रभावी बनाने के उपाय
- दलबदल कानून (Anti-Defection Law): विधायकों और सांसदों द्वारा लालच या सत्ता के लिए पार्टी बदलने की प्रवृत्ति को रोकने के लिए बनाए गए कानून का बिना किसी पक्षपात के कड़ाई से पालन होना चाहिए.
- न्यायालय के आदेशों का अनुपालन: उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार उम्मीदवारों के लिए अपनी संपत्ति और आपराधिक मुकदमों का ब्यौरा (शपथ पत्र/Affidavit) देना अनिवार्य किया गया है। गंभीर अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए.
- आंतरिक लोकतंत्र की बहाली: पार्टियों के भीतर समय पर संगठनात्मक चुनाव हों और सभी को समान अवसर मिले.
- युवाओं और महिलाओं को प्रतिनिधित्व: राजनीति में नई ऊर्जा लाने के लिए युवा पीढ़ी और महिलाओं को उचित भागीदारी दी जाए.
- चुनावों का राज्य वित्तपोषण (State Funding): काले धन के प्रभाव को रोकने के लिए चुनाव का खर्च (पेट्रोल, कागज, टेलीफोन आदि) सरकार द्वारा उठाया जाना चाहिए.
🏛️ भारत के प्रमुख राजनैतिक दलों का परिचय
🌐 राष्ट्रीय राजनैतिक दल (National Parties)
मान्यता की शर्त: लोकसभा या विधानसभा चुनाव में 4 या अधिक राज्यों में कुल वैध मतों का 6 प्रतिशत प्राप्त करना + लोकसभा की कम-से-कम 4 सीटें जीतना; या लोकसभा की कुल सीटों का कम-से-कम 2 प्रतिशत (11 सीटें) न्यूनतम तीन राज्यों से जीतना आवश्यक है.
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: स्थापना 1885 ई. में हुई. मुख्य उद्देश्य शांतिमय और संवैधानिक उपायों से संसदीय जनतंत्र पर आधारित समाजवादी राज्य कायम करना है. यह एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी है जिसने लंबे समय तक देश पर शासन किया और 2004 से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) का नेतृत्व कर रही है.
- भारतीय जनता पार्टी (BJP): 1980 में पूर्ववर्ती 'भारतीय जनसंघ' के स्थान पर गठन हुआ। इसके प्रथम अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी थे. मुख्य लक्ष्य प्राचीन संस्कृति से प्रेरणा लेकर आधुनिक भारत का निर्माण, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (हिंदुत्व) और समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करना है. यह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का नेतृत्व करती है.
- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI): स्थापना 1925 ई. में एस. ए. डांगे के प्रयासों से हुई. यह धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और किसानों-मजदूरों के हितों की रक्षा में विश्वास रखती है. मुख्य जनाधार केरल, पं. बंगाल और बिहार में है.
- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-मार्क्सवादी (CPI-M): कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद 1964 में गठन हुआ. ज्योति बसु, सोमनाथ चटर्जी इसके प्रमुख नेता रहे. यह मार्क्स और लेनिन के विचारों पर चलती है और चुनावी माध्यम से सामाजिक-आर्थिक न्याय प्राप्त करना चाहती है.
- बहुजन समाज पार्टी (बसपा): स्थापना 1984 में श्री कांशीराम द्वारा की गई. मुख्य विचारधारा दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों (बहुजन समाज) को एकजुट कर सत्ता प्राप्त करना है. इसका मुख्य आधार उत्तर प्रदेश है.
🌾 बिहार के प्रमुख क्षेत्रीय/राज्य स्तरीय राजनैतिक दल
मान्यता की शर्त: विधानसभा चुनाव में वैध मतों का कम-से-कम 6% प्राप्त करना + विधानसभा की न्यूनतम 3% सीटें या 3 सीटें जीतना.
- राष्ट्रीय जनता दल (राजद - RJD): जनता दल में विभाजन के बाद 1997 में श्री लालू प्रसाद के नेतृत्व में गठन हुआ. इसकी मुख्य नीति पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट कर सामाजिक न्याय की स्थापना करना तथा संप्रदायवाद का विरोध करना है.
- जनता दल यूनाइटेड (जदयू - JD-U): 1999 में जनता दल से अलग होकर शरद यादव के नेतृत्व में गठन हुआ, बाद में जॉर्ज फर्नांडिस की समता पार्टी का इसमें विलय हुआ. वर्तमान में इसका मुख्य चेहरा नीतीश कुमार हैं. मुख्य उद्देश्य समाजवाद की स्थापना और सामाजिक समरसता/सुशासन लाना है.
- लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा - LJP): वर्ष 2000 में रामविलास पासवान के नेतृत्व में गठन हुआ. यह दलितों-पिछड़ों के विकास, सामाजिक न्याय, राज्यों की स्वायत्तता और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने पर बल देती है.
- समाजवादी पार्टी (SP): 1992 में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में गठन हुआ। मुख्य आधार उत्तर प्रदेश है, लेकिन बिहार व अन्य राज्यों में भी जनाधार है. यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध और कृषि विकास पर जोर देती है.
- झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM): गठन 1973 ई. में (तत्कालीन) बिहार में हुआ था. झारखंड अलग राज्य बनने के बाद अब इसका मुख्य जनाधार झारखंड राज्य में है.
💡 Exam Tips & Memory Tricks 🧠
- RTI 2005 📅: 'RTI' (सूचना का अधिकार) कानून जून 2005 में पास हुआ था. इसकी शुरुआत 1990 में राजस्थान के 'भीम' तहसील से हुई थी.
- Emergency & Janta Party ⏳: 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगा. इसके ठीक बाद 1977 के चुनाव में देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार (जनता पार्टी) बनी.
- चिपको आंदोलन 🌲: पेड़ों को बचाने का यह आंदोलन उत्तराखंड में हुआ, जिसके मुख्य प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा थे. इसमें महिलाओं की बड़ी भूमिका थी.
- दलीय प्रणाली की आयु 🏛️: कांग्रेस सबसे पुरानी पार्टी है (1885). भाजपा का गठन 1980 में हुआ और राजद का गठन 1997 में हुआ.
🏁 निष्कर्ष (Conclusion)
इस अध्याय का मुख्य निचोड़ यह है कि लोकतंत्र कोई शांत या स्थिर तालाब नहीं है, बल्कि यह प्रतिस्पर्धा और जनसंघर्षों से भरा एक गतिशील महासागर है. जब भी चुनी हुई सरकारें तानाशाह होने लगती हैं या जनता की बुनियादी जरूरतों (जैसे बोलिविया में पानी या भारत में भ्रष्टाचार व महंगाई) की अनदेखी करती हैं, तब जनसंघर्ष ही लोकतंत्र के रक्षक बनकर सामने आते हैं. इस पूरी प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी 'लोकतंत्र के प्राण' यानी राजनैतिक दलों की होती है. राजनीति की आंतरिक चुनौतियों (वंशवाद, धन-बल, आंतरिक लोकतंत्र की कमी) को दूर करके ही हम लोकतंत्र के मार्ग को और अधिक सुदृढ़ और उज्ज्वल बना सकते हैं.
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