📖 इकाई-4 : भारत में राष्ट्रवाद (Nationalism in India)
यह व्यापक, सारगर्भित और परीक्षा-केंद्रित डिजिटल नोट्स BSEB (कक्षा-10) इतिहास, CBSE, BPSC (Pre/Mains), SSC, CUET और SCERT/SBTE परीक्षाओं के नवीनतम पाठ्यक्रम तथा आपके द्वारा भेजे गए दस्तावेज़ के अनुसार तैयार किए गए हैं।
🏛️ 1. भारत में राष्ट्रवाद का उदय: कारण
🔍 राष्ट्रवाद का अर्थ
- शाब्दिक अर्थ: "राष्ट्रीय चेतना का उदय"। एक ऐसी सामूहिक भावना जिसमें राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक एकीकरण का आभास हो।
- पृष्ठभूमि: 19वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था और समान न्याय व्यवस्था का अभाव था। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की नीतियों के विरुद्ध भारतीय जनता एकजुट होने लगी, जिसकी अभिव्यक्ति स्वतंत्रता संग्राम के रूप में हुई।
⚙️ उदय के प्रमुख कारण (Causes)
- राजनीतिक कारण (दमनकारी ब्रिटिश नीतियां):
- लॉर्ड लिटन (1878-1879): 1878 में 'वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट' पारित कर स्थानीय भाषाओं के समाचार पत्रों पर कठोर प्रतिबंध लगाया तथा 1879 में 'आर्म्स एक्ट' द्वारा भारतीयों के लिए अस्त्र-शस्त्र रखना गैर-कानूनी घोषित किया।
- इल्बर्ट बिल विवाद (1883): इसका उद्देश्य भारतीय जजों को यूरोपीय अपराधियों के मुकदमे सुनने का अधिकार देना था। यूरोपीय जनता के संगठित विरोध के कारण सरकार को यह बिल वापस लेना पड़ा, जिसने भारतीयों को यह सिखाया कि संगठित होकर ही अधिकार पाए जा सकते हैं।
- लॉर्ड कर्जन (1899-1905): 1899 में कलकत्ता कॉर्पोरेशन एक्ट द्वारा निर्वाचित सदस्यों की संख्या घटाई। 1904 में विश्वविद्यालय अधिनियम द्वारा स्वायत्तता खत्म की। अंततः 1905 में सांप्रदायिकता के आधार पर बंगाल का विभाजन किया। इसके विरुद्ध तीव्र जन-आक्रोश (स्वदेशी आंदोलन) भड़का, जिसके कारण 1911 में ब्रिटिश सरकार को विभाजन रद्द करना पड़ा।
- आर्थिक कारण: अंग्रेजों की भू-राजस्व नीतियों (जैसे स्थायी बंदोबस्त) के कारण जमींदारों और महाजनों ने किसानों का भयानक शोषण किया। कपास और नील (तीनकठिया व्यवस्था) जैसी नकदी फसलों के लिए किसानों को बाध्य किया गया। 1882 में सूती वस्त्रों पर से आयात कर हटाकर ब्रिटिश मशीन-निर्मित कपड़ों को बढ़ावा दिया गया, जिससे भारत के पारंपरिक कुटीर वस्त्र उद्योग नष्ट हो गए और बड़े पैमाने पर कामगार बेरोजगार हो गए।
- सामाजिक कारण (प्रजाति भेद): अंग्रेज खुद को श्रेष्ठ समझते थे और भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते थे। होटलों, क्लबों, रेलगाड़ियों और सड़कों पर भारतीयों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था। सिविल सेवा (ICS) परीक्षा का आयोजन केवल इंग्लैंड में होना तथा सफल भारतीयों (जैसे सुरेन्द्रनाथ बनर्जी) को साज़िश के तहत पदच्युत करना, इसने शिक्षित मध्यम वर्ग को पूरी तरह ब्रिटिश शासन के खिलाफ कर दिया।
- धार्मिक कारण (पुनरुत्थानवाद): 19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों (राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, स्वामी दयानन्द सरस्वती—'वेदों की ओर लौटो', स्वामी विवेकानन्द) ने भारतीयों में गौरवबोध जगाया। यूरोपीय विद्वानों (विलियम जोन्स, मैक्समूलर) द्वारा भारतीय ग्रंथों के अनुवाद से सांस्कृतिक चेतना जागृत हुई।
- संरचनात्मक कारक: लॉर्ड डलहौजी द्वारा शुरू की गई रेलवे, डाक-तार व्यवस्था और समरूप प्रशासनिक व्यवस्था ने संपूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों को आपस में जोड़ा, दूरियां घटाईं और स्थानीयता को समाप्त कर राष्ट्रवाद के विकास में मदद की।
🌍 2. प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) और भारत का अंतःसंबंध
प्रथम विश्व युद्ध मित्र राष्ट्रों (ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, अमेरिका) और केंद्रीय शक्तियों (जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी) के बीच लड़ा गया। ब्रिटेन का सबसे महत्वपूर्ण उपनिवेश होने के कारण भारत पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा:
- आर्थिक प्रभाव: युद्ध के कारण रक्षा व्यय में भारी बढ़ोतरी हुई, जिसकी भरपाई के लिए भारतीयों पर करों (टैक्स) का बोझ बढ़ाया गया। इसके कारण देश में बेतहाशा महंगाई और बेरोजगारी बढ़ी, जिसने मजदूरों और किसानों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कर दिया।
- भारतीय उद्योगपतियों का उदय: युद्ध के कारण इंग्लैंड से आयात बंद हो गया, जिससे भारतीय सूती वस्त्र उद्योगों को फलने-फूलने का बेहतरीन अवसर मिला और एक मजबूत स्वदेशी पूँजीपति वर्ग का उदय हुआ।
- राजनैतिक जागृति और भ्रम का टूटना: युद्ध के प्रारंभ में महात्मा गांधी और तिलक जैसे नेताओं ने इस आश्वासन पर ब्रिटिश सरकार का सहयोग किया कि युद्ध के बाद 'स्वराज' मिलेगा। परंतु, युद्ध के बाद अंग्रेजों ने वादे पूरे करने के बजाय दमन चक्र तेज कर दिया, जिससे भारतीयों का भ्रम टूट गया।
- राष्ट्रवादी गतिविधियों में तेजी:
- होमरूल लीग आंदोलन (1915-17): एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक ने आयरलैंड से प्रेरित होकर भारत में इसकी शुरुआत की।
- गदर पार्टी (1913): लाला हरदयाल के प्रयासों से अमेरिका और कनाडा में बसे भारतीयों ने सशस्त्र क्रांति के लिए इसकी स्थापना की।
- लखनऊ समझौता (1916): कांग्रेस के दोनों दल (नरम दल और गरम दल) एकजुट हो गए तथा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच साझा राजनीतिक आंदोलन चलाने का ऐतिहासिक समझौता हुआ।
✊ 3. गांधीवादी चरण के प्रारंभिक जन-आंदोलन (1919-22)
जनवरी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महात्मा गांधी ने भारतीय राजनीति में प्रवेश किया। उन्होंने तीन सफल स्थानीय आंदोलनों—चम्पारण (1917), खेड़ा (1918) और अहमदाबाद मिल मजदूर आंदोलन (1918) के माध्यम से अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाई।
📜 A. रॉलट एक्ट (Rowlatt Act) और सत्याग्रह (1919)
- अधिनियम: क्रांतिकारी गतिविधियों को कुचलने के लिए सिडनी रॉलट की अध्यक्षता वाली समिति के सुझाव पर 21 मार्च 1919 को 'क्रांतिकारी एवं अराजकता अधिनियम' पारित हुआ, जिसे रॉलट एक्ट कहा गया।
- प्रावधान: इसके तहत एक विशेष न्यायालय का गठन किया गया, जिसके निर्णय के विरुद्ध कोई अपील नहीं हो सकती थी। किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट और बिना मुकदमा चलाए सीधे जेल में बंद किया जा सकता था। इसे "बिना वकील, बिना अपील, बिना दलील" का काला कानून कहा गया।
- सत्याग्रह: गांधीजी ने इसके विरोध में 6 अप्रैल 1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।
🩸 B. जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)
- कारण: रॉलट एक्ट के विरोध के दौरान पंजाब के दो लोकप्रिय स्थानीय नेताओं—डॉ० सत्यपाल और डॉ० सैफुद्दीन किचलू को 9 अप्रैल को गिरफ्तार कर लिया गया।
- नरसंहार: इस गिरफ्तारी के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को (बैसाखी के दिन) अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सार्वजनिक सभा बुलाई गई थी। अमृतसर के जिला मजिस्ट्रेट जनरल ओ० डायर ने बिना किसी चेतावनी के बाग के एकमात्र संकरे निकास द्वार को सैनिकों से घेर लिया और निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दीं, जिसमें लगभग 1000 लोग मारे गए। इसके बाद पंजाब में मार्शल लॉ लगाकर पाशविक अत्याचार किए गए।
- प्रतिरोध: इस नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी 'नाइट' (Knight) की उपाधि त्याग दी, शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी से इस्तीफा दे दिया और गांधीजी ने 'कैसर-ए-हिन्द' की उपाधि लौटा दी।
🕌 C. खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement - 1920)
- कारण: प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) की पराजय के बाद मित्र राष्ट्रों ने खलीफा (तुर्की के सुल्तान, जो संपूर्ण इस्लामिक संसार के आध्यात्मिक नेता थे) के साम्राज्य का विघटन करने और उनके लौकिक अधिकार छीनने की तैयारी की। भारतीय मुसलमान अंग्रेजों के इस विश्वासघात से क्रुद्ध थे।
- आंदोलन: 1920 के प्रारंभ में अली बंधुओं (मोहम्मद अली और शौकत अली) के नेतृत्व में ब्रिटिश नीति बदलने के लिए आंदोलन शुरू हुआ। गांधीजी ने इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता के स्वर्णिम अवसर के रूप में देखा और नवंबर 1919 में वे 'अखिल भारतीय खिलाफत आंदोलन' के अध्यक्ष चुने गए। 17 अक्टूबर 1919 को पूरे भारत में 'खिलाफत दिवस' मनाया गया।
- मांगें: खलीफा को पर्याप्त लौकिक अधिकार दिए जाएं, अरब प्रदेश मुस्लिम शासन के अधीन रहे और खलीफा पवित्र स्थलों के संरक्षक बने रहें।
🚫 D. असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement - 1920-22)
- निर्णय: सितंबर 1920 के कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन (गांधीजी की प्रेरणा से) और दिसंबर 1920 के नागपुर अधिवेशन में इसकी पुष्टि हुई तथा लक्ष्य 'स्वशासन की जगह स्वराज' तय किया गया। यह गांधीजी के नेतृत्व में शुरू किया गया पहला राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन था।
- मुख्य कार्यक्रम:
- विध्वंसात्मक कार्य: सरकारी उपाधियों व पदों का त्याग, सरकारी स्कूलों-कॉलेजों का बहिष्कार, विधान परिषद् के चुनावों व विदेशी कपड़ों का पूर्ण बहिष्कार।
- रचनात्मक कार्य: पंचायती अदालतों की स्थापना, स्वदेशी को अपनाना, चरखा-खादी को लोकप्रिय बनाना, तिलक स्वराज कोष के लिए ₹1 करोड़ इकट्ठा करना और 20 लाख चरखों का वितरण।
- आंदोलन की गति: 1 जनवरी 1921 को औपचारिक शुरुआत हुई। मोतीलाल नेहरू और चितरंजन दास जैसे बैरिस्टरों ने वकालत छोड़ दी। काशी विद्यापीठ और जामिया मिलिया इस्लामिया जैसी राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाएं बनीं। 17 नवंबर 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आगमन पर मुंबई में देशव्यापी हड़ताल हुई।
- 🚨 चौरी-चौरा कांड और स्थगन: आंदोलन पूरे शबाब पर था, तभी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नामक स्थान पर एक राजनीतिक जुलूस पर पुलिस फायरिंग के विरोध में क्रुद्ध भीड़ ने थाने पर हमला कर 5 फरवरी 1922 ई० को 22 पुलिसकर्मियों को जिंदा जला दिया। अहिंसा के पुजारी गांधीजी ने यह भांपते हुए कि जनता अभी पूरी तरह तैयार नहीं है, 12 फरवरी 1922 को आंदोलन स्थगित करने की घोषणा कर दी। मार्च 1922 में गांधीजी को गिरफ्तार कर 6 वर्ष की सजा दी गई।
🌊 4. सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement - 1930-34)
असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद आई राजनीतिक शून्यता को निम्नलिखित घटनाक्रमों ने तोड़कर सविनय अवज्ञा आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की:
- साइमन कमीशन (1927): 1919 के एक्ट की समीक्षा के लिए समय से पूर्व नवंबर 1927 में ब्रिटिश सरकार ने 'इंडियन स्टेट्यूटरी कमीशन' का गठन किया, जिसे साइमन कमीशन कहा जाता है। सर जॉन साइमन इसके अध्यक्ष थे। इस 7 सदस्यीय आयोग में एक भी भारतीय नहीं था (श्वेत कमीशन)। 3 फरवरी 1928 को इसके मुंबई पहुँचने पर काले झंडों और "साइमन वापस जाओ" (Simon Go Back) के नारों से देशव्यापी विरोध हुआ, जिसने पुनः राजनीतिक संघर्ष को जन्म दिया।
- नेहरू रिपोर्ट (1928): भारत सचिव लॉर्ड बिरकनहैड की चुनौती स्वीकार करते हुए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक सर्वदलीय समिति ने भारत के लिए 'डोमिनियन स्टेटस' की मांग वाली रिपोर्ट तैयार की, पर पूर्ण सहमति न बनने से यह स्वीकृत नहीं हो सकी।
- 1929-30 की विश्वव्यापी आर्थिक मंदी: मंदी के कारण भारत के कृषि उत्पादों की कीमतें गिर गईं, कारखाने बंद हो गए, पर अंग्रेजों ने धन का निष्कासन और लगान की वसूली जारी रखी, जिससे जनता में तीव्र असंतोष था।
- समाजवाद और क्रांतिकारी आंदोलन का उभार: कांग्रेस के भीतर जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में वामपंथ का प्रभाव बढ़ रहा था। भगत सिंह और सुखदेव की गतिविधियों (लाहौर षड्यंत्र केस) तथा अप्रैल 1930 में सूर्यसेन ('मास्टर दा') के नेतृत्व में चटगाँव शस्त्रागार पर छापे ने माहौल विस्फोटक बना दिया था।
- 🚩 पूर्ण स्वराज की मांग (लाहौर अधिवेशन - 1929): दिसंबर 1929 में कांग्रेस का ऐतिहासिक वार्षिक अधिवेशन जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ। 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को रावी नदी के तट पर नेहरू ने तिरंगा झंडा फहराया तथा 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में प्रथम 'पूर्ण स्वतंत्रता दिवस' मनाने की घोषणा की।
🥾 दांडी यात्रा / नमक सत्याग्रह (12 मार्च - 6 अप्रैल 1930)
गांधीजी ने वायसराय लॉर्ड इरविन के समक्ष अपनी 11 सूत्री मांगें रखीं, जिसे इरविन ने खारिज कर दिया। बाध्य होकर गांधीजी ने नमक को मुख्य मुद्दा बनाते हुए आंदोलन की घोषणा की, क्योंकि नमक पर टैक्स अमीर-गरीब सबके पेट पर लात मारने जैसा था।
- ऐतिहासिक यात्रा: 12 मार्च 1930 ई० को गांधीजी ने साबरमती आश्रम से अपने 78 अनुयायियों के साथ दांडी समुद्र तट तक ऐतिहासिक पदयात्रा शुरू की। 24 दिनों में 250 किलोमीटर की यात्रा पूर्ण कर वे 5 अप्रैल को दांडी पहुँचे तथा 6 अप्रैल 1930 को समुद्र के पानी से नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन किया और सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की।
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║ नमक सत्याग्रह का विस्तार ║
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तमिलनाडु (तंजौर तट) मालाबार तट पेशावर (उत्तर-पश्चिम) धरासणा (गुजरात)
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• सी. राजगोपालाचारी • के. केलप्पन • खान अब्दुल गफ्फार • सरोजिनी नायडू
• त्रिचनापल्ली से • कालीकट से खान (सीमांत गांधी) • सबसे तीव्र व
वेदारण्यम यात्रा पोथान्नूर यात्रा • खुदाई खिदमतगार/ बर्बर दमन का
'लाल कुर्ती' दल सामना किया- 📝 बिहार में आंदोलन का प्रसार: बिहार में समुद्र तट न होने के कारण यहाँ साल्ट सत्याग्रह के पूरक के रूप में चौकीदारी कर (Tax) विरोधी आंदोलन चलाया गया। सीवान में इसका नेतृत्व गंगा प्रसाद राय ने किया, जो बाद में गया, भागलपुर, मुंगेर, मोकामा और बेगूसराय में फैला। छपरा जेल के कैदियों ने विदेशी वस्त्र पहनने से इनकार कर 'नंगी हड़ताल' की। पटना में महिलाओं का नेतृत्व श्रीमती हसन इमाम और विंध्यवासिनी देवी ने किया।
📜 गांधी-इरविन पैक्ट और स्थगन
- दिल्ली समझौता: आंदोलन की अभूतपूर्व व्यापकता से घबराकर लॉर्ड इरविन ने गांधीजी से समानता के आधार पर बातचीत की। 5 मार्च 1931 को 'गांधी-इरविन पैक्ट' (दिल्ली समझौता) संपन्न हुआ, जिसके तहत गांधीजी ने आंदोलन स्थगित कर दिया और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (लंदन) में भाग लेने के लिए सहमत हुए। गोलमेज सम्मेलन विफल रहा, जिसके बाद गांधीजी ने 1932 में दुबारा आंदोलन शुरू किया, पर उत्साह कम होने के कारण 1934 ई० में आंदोलन पूर्णतः वापस ले लिया गया।
- परिणाम: इसका सामाजिक आधार बहुत विस्तृत था (महिलाओं, मजदूरों, गरीबों की भारी भागीदारी)। संगठनात्मक नवाचार के रूप में 'वानर सेना' (बच्चों की), 'मंजरी सेना' (लड़कियों की) और 'प्रभात फेरियों' का जन्म हुआ। इसका मुख्य संवैधानिक परिणाम 1935 का भारत शासन अधिनियम पारित होना था।
🌾 5. प्रमुख किसान, मजदूर एवं जनजातीय आंदोलन
A. किसान आंदोलन (Peasant Movements)
- चम्पारण आंदोलन (1917 - बिहार): बिहार के नील उत्पादक किसानों पर गोरे बागान मालिकों द्वारा 'तीनकठिया व्यवस्था' थोपी गई थी, जिसके तहत भूमि के सबसे उपजाऊ 3/20 हिस्से पर नील की खेती अनिवार्य थी। रासायनिक रंगों के आने से नील का व्यापार घाटे में गया, तो मालिकों ने घाटे की भरपाई के लिए लगान अत्यधिक बढ़ा दिया और भारी मुआवजे की मांग की। 1916 के लखनऊ अधिवेशन में चम्पारण के किसान राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी को बिहार आने का निमंत्रण दिया। गांधीजी के अहिंसक सत्याग्रह के दबाव में सरकार ने 'चम्पारण एग्रेरियन कमेटी' बनाई, जिसने तीनकठिया व्यवस्था समाप्त की और 25% अवैध वसूली वापस की। इसमें राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी और अनुग्रह नारायण सिन्हा ने मुख्य भूमिका निभाई।
- खेड़ा आंदोलन (1918 - गुजरात): 1917 में भारी बारिश से फसल नष्ट होने के बाद भी सरकार लगान माफ नहीं कर रही थी। गांधीजी ने 22 जून 1918 को सत्याग्रह कर लगान माफी सुनिश्चित कराई।
- मोपला विद्रोह (1921 - केरल): मालाबार तट के मोपला किसान (मुस्लिम) स्थानीय जमींदारों (नम्बूदरी व नायर—उच्च जातीय हिन्दू) और उन्हें संरक्षण देने वाली ब्रिटिश पुलिस के शोषण के खिलाफ उठ खड़े हुए। खिलाफत आंदोलन के समर्थन से उत्साहित होकर उन्होंने अली मुसालियार को अपना राजा घोषित कर दिया। बाद में ब्रिटिश सैन्य दमन में 10,000 से अधिक विद्रोही मारे गए।
- बारदोली सत्याग्रह (1928 - गुजरात): सूरत के बारदोली में लगान की अवैध दर वृद्धि के खिलाफ किसानों ने वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में आंदोलन छेड़ा। आंदोलन की पूर्ण सफलता पर वहाँ की महिलाओं ने उन्हें 'सरदार' की उपाधि दी।
- 🏛️ किसान सभाओं का गठन: 1922-23 में मुंगेर में शाह मुहम्मद जुबैर ने किसान सभा बनाई। इसे सबसे शक्तिशाली आधार 1929 में स्वामी सहजानन्द सरस्वती द्वारा 'बिहार प्रांतीय किसान सभा' (सोनपुर) की स्थापना से मिला। अंततः 11 अप्रैल 1936 को लखनऊ में 'अखिल भारतीय किसान सभा' का गठन हुआ, जिसके अध्यक्ष स्वामी सहजानन्द थे।
B. मजदूर आंदोलन (Labour Movements)
- अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918): प्लेग बोनस की कटौती के खिलाफ गांधीजी ने मिल मजदूरों की मांग का समर्थन करते हुए भूख हड़ताल की और मिल मालिकों को 35% बोनस देने पर राजी किया।
- 🏗️ AITUC (1920): रूसी क्रांति (1917) से प्रेरित होकर 31 अक्टूबर 1920 को 'ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस' (AITUC) की स्थापना की गई, जिसके पहले अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे। सी०आर० दास ने मजदूरों को राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा में जोड़ने पर बल दिया। मार्च 1929 में सरकार ने वामपंथी मजदूर नेताओं पर 'मेरठ षड़यंत्र केस' के तहत देशद्रोह का मुकदमा चलाया।
C. जनजातीय आंदोलन (Tribal Movements)
- रम्पा विद्रोह (1922-24 - आंध्र प्रदेश): गोदावरी पहाड़ियों के रम्पा क्षेत्र में आदिवासियों के पारंपरिक चराई अधिकारों और झूम खेती पर वन विभाग द्वारा रोक लगाने तथा साहूकारों के शोषण के खिलाफ अल्लूरी सीताराम राजू के नेतृत्व में छापामार युद्ध लड़ा गया। मई 1924 में राजू को गोली मार दी गई।
- खोंड विद्रोह (1914 - उड़ीसा): सामंतवादी रियासत दसपल्ला में उत्तराधिकार विवाद से शुरू होकर यह अंग्रेजों के खिलाफ हिंसक विद्रोह में बदल गया, जिसे अंग्रेजों ने गाँवों को जलाकर कुचला।
- ताना भगत आंदोलन (1914-20 - छोटानागपुर): उरांव आदिवासियों के बीच जतरा भगत के नेतृत्व में यह एक पूर्णतः अहिंसक, सामाजिक और शैक्षणिक सुधार आंदोलन था (मांस-मदिरा का त्याग, एकेश्वरवाद)। बाद में यह गांधीवादी असहयोग आंदोलन का अभिन्न अंग बन गया।
🏛️ 6. भारतीय राजनीतिक दल एवं वैचारिक धाराएँ
A. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (स्थापना: 1885)
- इसके पूर्व कई क्षेत्रीय संस्थाएं बनीं—लैंड होल्डर्स सोसाइटी (1838), इंडियन एसोसिएशन (1876 - सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वारा)। आनंद मोहन बोस ने 1883 में 'नेशनल कॉन्फ्रेंस' बुलाई।
- गठन: एक सेवानिवृत्त ब्रिटिश अधिकारी ऐलेन ऑक्टोवियन ह्यूम (A.O. Hume) के प्रयासों से 1884 में 'भारतीय राष्ट्रीय संघ' बना, जिसकी बैठक प्लेग फैलने के कारण पूना से बदलकर 28 दिसंबर 1885 को गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज, बॉम्बे में आयोजित हुई। यहीं इसका नाम "अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस" किया गया।
- प्रथम अध्यक्ष: व्योमेशचंद्र बनर्जी (W.C. Bonnerjee)। इसमें कुल 72 सदस्य शामिल हुए थे। 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में विभाजित हो गई थी।
B. वामपंथ / कम्युनिस्ट पार्टी (Communist Party)
- गठन: 1920 में एम० एन० राय (मानवेन्द्र नाथ राय) ने ताश्कंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। भारत में दिसंबर 1925 में सत्यभक्त नामक व्यक्ति ने कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नींव रखी।
- कांग्रेस समाजवादी दल (1934): कांग्रेस के भीतर समाजवादी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव के कारण अक्टूबर 1934 में मुंबई में जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, राममनोहर लोहिया और अच्युत पटवर्धन ने इसकी स्थापना की। (नोट: जयप्रकाश बाबू ने 1931 में ही 'बिहार समाजवादी दल' का गठन कर दिया था)।
C. मुस्लिम लीग (Muslim League - 1906)
- पृष्ठभूमि: अंग्रेजों की 'फूट डालो और शासन करो' की नीति की परिणति थी। सर सैयद अहमद खाँ द्वारा 1877 में स्थापित अलीगढ़ कॉलेज और कर्जन द्वारा 1905 के बंगाल विभाजन ने सांप्रदायिक दूरी बढ़ाई।
- स्थापना: अक्टूबर 1906 में नवाब मोहसिन-उल-मुल्क के प्रयासों से 35 मुस्लिम नेताओं का प्रतिनिधिमंडल आगा खाँ के नेतृत्व में वायसराय लॉर्ड मिन्टो से मिला। अंततः 30 दिसंबर 1906 को ढाका के नवाब सलीमुल्लाह खाँ के निमंत्रण पर ढाका सम्मेलन में 'ऑल इंडिया मुस्लिम लीग' की स्थापना हुई। इसके मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के लिए राजनीतिक व विधायी परिषदों में अलग प्रतिनिधित्व (पृथक निर्वाचन मंडल) सुनिश्चित करना था, जो उन्हें 1909 के मॉर्ले-मिन्टो सुधारों में प्राप्त हुआ। आगे चलकर मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में इसने भारत विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया।
D. स्वराज पार्टी (Swaraj Party - 1923)
- स्थापना: असहयोग आंदोलन के अचानक स्थगन से उत्पन्न क्षोभ के कारण 1922 के गया अधिवेशन (अध्यक्ष: चितरंजन दास) में परिषद प्रवेश का प्रस्ताव गिर जाने पर, चितरंजन दास (C.R. Das) और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस से अलग होकर मार्च 1923 में इलाहाबाद में स्वराज पार्टी का प्रथम सम्मेलन आयोजित कर इसकी स्थापना की।
- नीति: ये परिषदों (विधानसभाओं) के भीतर प्रवेश कर सरकार के बजट प्रस्तावों को रोककर और दमनकारी कानूनों का विरोध कर शासन के कामकाज में कानूनी अवरोध पैदा करना चाहते थे। 1925 में सी०आर० दास की मृत्यु के बाद यह दल पंगु हो गया।
E. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (R.S.S. - 1925)
- पृष्ठभूमि: 19वीं सदी के हिन्दू पुनरुत्थानवाद (स्वामी दयानन्द सरस्वती के आर्य समाज—1875 और 1915 में मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित 'हिन्दू महासभा') की वैचारिक निरंतरता में इसका उदय हुआ।
- स्थापना: बाल गंगाधर तिलक के अनुयायी डॉ० के० बी० हेडगेवार ने 1925 में नागपुर में इसकी स्थापना की। इसका मुख्य उद्देश्य हिन्दू नवयुवकों को अनुशासित, चारित्रिक रूप से मजबूत और संगठित कर राष्ट्र निर्माण करना था। यह एक सांस्कृतिक और सामाजिक संस्था के रूप में उभरी।
💡 Quick Exam Shortcuts & Tricks (याद रखने के सूत्र)
- लिटन की लाठी और लिटरेचर: लॉर्ड लिटन = वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट (1878) + आर्म्स एक्ट (1879)।
- सत्याग्रह की पहली सीढ़ी (बिहार): गांधीजी का भारत में पहला सत्याग्रह = चम्पारण सत्याग्रह (1917, तीनकठिया व्यवस्था)।
- गदर का हरदयाल: गदर पार्टी = लाला हरदयाल (1913, अमेरिका-कनाडा)।
- बिना दलील का साइमन: साइमन कमीशन = 1927 गठन, 1928 भारत आगमन (सभी 7 सदस्य श्वेत/अंग्रेज)।
- सरदार की उपाधि: बारदोली सत्याग्रह (1928) की सफलता पर वहाँ की महिलाओं ने वल्लभभाई पटेल को 'सरदार' कहा।
- किसान सभा के स्वामी: प्रांतीय व अखिल भारतीय किसान सभा = स्वामी सहजानन्द सरस्वती (1929 व 1936)।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
भारत में राष्ट्रवाद का उदय ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के चौतरफा दमन, आर्थिक शोषण और प्रशासनिक एकीकरण की नीतियों का एक अनिवार्य परिणाम था। 1885 में कांग्रेस की स्थापना से शुरू हुई राष्ट्रीय चेतना, प्रथम विश्व युद्ध की परिस्थितियों और महात्मा गांधी के पदार्पण के बाद एक अदम्य जन-आंदोलन में बदल गई। असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे राष्ट्रव्यापी संघर्षों ने न केवल समाज के अंतिम पायदान पर खड़े किसानों, मजदूरों और महिलाओं का राजनीतिकरण किया, बल्कि ब्रिटिश सत्ता की अजेयता के भ्रम को भी तोड़ दिया। इसी दौर में कम्युनिस्ट पार्टी, मुस्लिम लीग, स्वराज पार्टी और आरएसएस जैसी विविध वैचारिक और राजनीतिक धाराओं का उदय हुआ, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के कैनवास को और अधिक विस्तृत व जटिल बनाते हुए अंततः भारत की पूर्ण स्वाधीनता का मार्ग प्रशस्त किया।
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