- अर्द्धनारीश्वर
महत्त्वपूर्ण बिंदु
'अर्द्धनारीश्वर' निबंध की रचना रामधारी सिंह 'दिनकर' ने किया है।
इनका जन्म 23 सितम्बर, 1908 ई० को बिहार के सिमरिया, बेगूसराय में हुआ था।
इनके माता-पिता का नाम मनरूप देवी एवं रवि सिंह था।
इनका निधन 24 अप्रैल 1974 ई० को हुआ था।
इनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार से हैं :
प्राणभंग (1929), रेणुका (1935), हुंकार (1938), रसवंती (1940), कुरुक्षेत्र (1946), रश्मिरथी (1952), नीलकुसुम (1954), उर्वशी (1961), परशुराम की प्रतीक्षा (1963), कोमलता और कविता (1964), हरे को हरिनाम (1970)।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- नारी में पुरुष का गुण और पुरुष में नारी का गुण होना चाहिए या नहीं ?
[2009ए]
- पुरुष जब नारी के गुण लेता है तब वह क्या बन जाता है ?
[2012ए, 2013ए]
- नारी की पराधीनता कब से आरम्भ हुई ?
[2021ए, 2022ए, 2025ए]
बुद्ध ने आनंद से क्या कहा ? 'अर्धनारीश्वर' शीर्षक निबंध के अनुसार लिखें।
[2024ए]
- दिनकर जी का निधन कहाँ और किन परिस्थितियों में हुआ था ?
[2025ए]
उत्तर
नारी में पुरुष का गुण और पुरुष में नारी का गुण होना चाहिए। लेखक रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि नारी में दया, माया, सहिष्णुता और भीरूता जैसे स्त्रियोचित गुण होते हैं। इन गुणों के कारण नारी विनाश से बची रहती है। यदि इन गुणों को पुरुष अंगीकार कर ले तो पुरुष के पौरुष में कोई दोष नहीं आता और पुरुष नारीत्व से पूर्ण हो जाता है। इसलिए निबंधकार अर्द्धनारीश्वर की कल्पना करता है। जिसमें पुरुष स्त्री का गुण और स्त्री पुरुष का गुण लेकर महान बन सके।
पुरुष जब नारी के गुण लेता है तब वह अर्द्धनारीश्वर बन जाता है। अर्द्धनारीश्वर शंकर और पार्वती का कल्पित रूप है जिसमें आधा अंग पुरुष का तथा आधा अंग नारी का होता है। अर्द्धनारीश्वर के माध्यम से यह बताया है कि समाज में स्त्री और पुरुष दोनों का अपना-अपना स्थान और महत्त्व है।
जब मानव जाति ने कृषि का आविष्कार किया तो नारी घर में और पुरुष बाहर रहने लगा। यहाँ से जिंदगी दो टुकड़ों में बँट गई। घर का जीवन सीमित और बाहर का जीवन निस्सीम होता गया एवं छोटी जिंदगी बड़ी जिंदगी के अधिकाधिक अधीन होती चली गई। कृषि विकास के साथ ही नारी की पराधीनता आरम्भहो गई।
बुद्ध ने आनंद से कहा कि "आनंद" ! मैंने जो धर्म चलाया था, वह पाँच सहस्त्र वर्ष तक चलनेवाला, किन्तु अब वह पाँच सौ वर्ष चलेगा, क्योंकि नारियों को मैंने भिक्षुणी होने का अधिकार दे दिया है।"
दिनकर जी रामनाथ गोयनका के घर मेहमान बनकर आए हुए थे। लेखक भी वहाँ मौजूद था। दिनकर जी ने वहाँ कुछ बड़े ही हृदयग्राही शब्द सुनाए। फिर रात को विदा लेकर जाने लगे कि उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। गोयनका जी ने उन्हें विलिंगडन नर्सिंग होम नामक अस्पताल में तीन मिनट में पहुँचा दिया। वहाँ पर हर प्रकार का इंतजाम था। लेकिन दिनकर जी फिर भी बच न सकें और उसी रात उनका निधन हो गया।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- 'अर्धनारीश्वर' पाठ का सारांश लिखिए।
[2010ए, 2023ए]
- 'अर्द्धनारीश्वर' में व्यक्त विचारों का सारांश लिखें।
[2018ए, 2021ए]
- 'अर्धनारीश्वर' शीर्षक पाठ में रवींद्रनाथ, प्रसाद और प्रेमचंद के चिंतन से दिनकर क्यों असंतुष्ट हैं ?
[2022ए]
- अर्धनारीश्वर की कल्पना क्यों की गई होगी, और आज इसकी क्या सार्थकता है?
[2025ए]
उत्तर
- दिनकर अर्द्धनारीश्वर निबंध के माध्यम से यह बताते हैं कि नर-नारी पूर्ण रूप से समान हैं एवं उनमें एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। अर्थात् नरों में नारियों के गुण आएँ तो इससे उनकी मर्यादा हीन नहीं होती बल्कि उसकी पूर्णता में वृद्धि होती है। दिनकर को यह रूप कहीं देखने को नहीं मिलता है। इसलिए वे क्षुब्ध हैं। उनका मानना है कि संसार में सर्वत्र पुरुष हैं और स्त्री। वे कहते हैं कि नारी समझती है कि पुरुष के गुण सीखने से उसके नारीत्व में बट्टा लगेगा। इसी प्रकार पुरुष समझता है कि स्त्रियोचित गुण अपनाकर वह स्त्रैण हो जायेगा। इस विभाजन से दिनकर दुखी है। यही नहीं भारतीय समाज को जाननेवाले तीन बड़े चिंतकों रवीन्द्रनाथ, प्रेमचंद, प्रसाद के चिंतन से भी दुखी हैं। दिनकर मानते हैं कि यदि ईश्वर ने आपस में धूप और चाँदनी का बँटवारा नहीं किया तो हम कौन होते हैं आपसी गुणों को बाँटने वाले। वे नारी के पराधीनता का संक्षिप्त इतिहास बताने के संदर्भ में कहते हैं कि पुरुष वर्चस्ववादी तरीके अपनाकर नारी को गुलाम बना लिया है। जब कृषि व्यवस्था का आविष्कार किया जिसके चलते नारी घर में और पुरुष बाहर रहने लगा। यहाँ से जिंदगी दो टुकड़ों में बँट गई। नारी पराधीन होकर अपने समस्त मूल्य भुल गयी। अपने अस्तित्व की अधिकारिणी भी नहीं रही। उसे यह लगने लगा कि मेरा अस्तित्व पुरुष को होने को लेकर है। समाज ने भी नारी को भोग्या समझकर उसका उपभोग खूब किया। वसुंधरा भोगीयों ने नारी को आनंद की खान मानकर उसका जी भर उपभोग किया। दिनकर मानते हैं कि नर और नारी एक ही द्रव्य की दली दो प्रतिभाएँ हैं। जिसे भी पुरुष अपना कर्मक्षेत्र मानता है, वह नारी का भी कर्मक्षेत्र है। अतः अर्द्धनारीश्वर केवल इसी बात का प्रतीक नहीं हैं कि नारी और नर जब तक अलग हैं तब तक दोनों अधूरे हैं बल्कि इस बात का भी कि जिस पुरुष में नारीत्व की ज्योति जगे, बल्कि यह कि प्रत्येक नारी में भी पौरुष
का स्पष्ट आभास हो।
दिनकर अर्द्धनारीश्वर निबंध के माध्यम से यह बताते हैं कि नर-नारी पूर्ण रूप से समान हैं एवं उनमें एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। अर्थात् नरों में नारियों के गुण आएँ तो इससे उनकी मर्यादा हीन नहीं होती बल्कि उसकी पूर्णता में वृद्धि होती है। दिनकर को यह रूप कहीं देखने को नहीं मिलता है। इसलिए वे क्षुब्ध हैं। उनका मानना है कि संसार में सर्वत्र पुरुष हैं और स्त्री। वे कहते हैं कि नारी समझती है कि पुरुष के गुण सीखने से उसके नारीत्व में बट्ट्टा लगेगा। इसी प्रकार पुरुष समझता है कि स्त्रियोचित गुण अपनाकर वह स्त्रैण हो जायेगा। इस विभाजन से दिनकर दुखी है। यही नहीं भारतीय समाज को जाननेवाले तीन बड़े चिंतकों रवीन्द्रनाथ, प्रेमचंद, प्रसाद के चिंतन से भी दुखी हैं। दिनकर मानते हैं कि यदि ईश्वर ने आपस में धूप और चाँदनी का बँटवारा नहीं किया तो हम कौन होते हैं आपसी गुणों को बाँटने वाले। वे नारी के पराधीनता का संक्षिप्त इतिहास बताने के संदर्भ में कहते हैं कि पुरुष वर्चस्ववादी तरीके अपनाकर नारी को गुलाम बना लिया है। जब कृषि व्यवस्था का आविष्कार किया जिसके चलते नारी घर में और पुरुष बाहर रहने लगा। यहाँ से जिंदगी दो टुकड़ों में बँट गई। नारी पराधीन होकर अपने समस्त मूल्य भुल गयी। अपने अस्तित्व की अधिकारिणी भी नहीं रही। उसे यह लगने लगा कि मेरा अस्तित्व पुरुष को होने को लेकर है। समाज ने भी नारी को भोग्या समझकर उसका उपभोग खूब किया। वसुंधरा भोगीयों ने नारी को आनंद की खान मानकर उसका जी भर उपभोग किया। दिनकर मानते हैं कि नर और नारी एक ही द्रव्य की दली दो प्रतिभाएँ हैं। जिसे भी पुरुष अपना कर्मक्षेत्र मानता है, वह नारी का भी कर्मक्षेत्र है। अतः अर्द्धनारीश्वर केवल इसी बात का प्रतीक नहीं हैं कि नारी और नर जब तक अलग हैं तब तक दोनों अधूरे हैं बल्कि इस बात का भी कि जिस पुरुष में नारीत्व की ज्योति जगे, बल्कि यह कि प्रत्येक नारी में भी पौरुष का स्पष्ट आभास हो।
रवीन्द्रनाथ, जयशंकर प्रसाद एवं प्रेमचंद के चिंतन नारियों के प्रति भिन्न रहे हैं। इन कवियों और रोमांटिक चिंतकों में नारी का जो रूप प्रकट हुआ वह भी | उसका अर्द्धनारीश्वरी रूप नहीं है।
प्रेमचन्द ने कहा है कि "पुरुष जब नारी के गुण लेता है तब वह देवता बन | जाता है; किन्तु नारी जब नर के गुण सीखती है तब वह राक्षसी हो जाती है।"
इसी प्रकार जयशंकर प्रसादजी की इड़ा के विषय में यह कहा जाय कि इड़ा वह नारी है जिसने पुरुषों के गुण सीखे हैं तो निष्कर्ष यही निकलेगा कि प्रसादजी भी नारी को पुरुषों के क्षेत्र से अलग रखना चाहते थे।
कवि रवीन्द्रनाथ ने भी नारियों के बारे में कुछ ऐसे ही विचार दिये हैं। उनके अनुसार नारी की सार्थकता उसकी भंगिमा के मोहक और आकर्षक होने में है, केवल पृथ्वी की शोभा, केवल आलोक, केवल प्रेम की प्रतिमा बनने में है। कर्मकीर्ति, वीर्यबल और शिक्षा-दीक्षा लेकर वह क्या करेगी ?
परन्तु राष्ट्रकवि दिनकर उक्त कवियों एवं लेखकों के विचार से असंतुष्ट हैं। उनका मानना है कि नारियाँ अब अभिशप्त नहीं हैं। यतियों का अभिशप्त काल समाप्त हो गया है। अब नारी विकारों की खान और पुरुषों की बाधा नहीं मानी जाती है। अब नारी प्रेरणा का उद्गम है, शक्ति का स्रोत है। अब वह पुरुषों की थकान की महौषधि बन गई है। अतः नारी और नर एक ही द्रव की ढली दो प्रतिमाएँ हैं। वे एक दूसरे की पूरक हैं। प्रारम्भिक काल में दोनों बहुत कुछ समान थे। आज भी वैसा ही होना चाहिए।
- अर्द्धनारीश्वर, शंकर और पार्वती का कल्पित रूप है; जिसका आधा अंग पुरुष और आधा अंग नारी का होता है। स्पष्ट ही यह कल्पना शिव और शक्ति के बोच पूर्ण समन्वय दिखाने के लिए की गई होगी। इतना ही नहीं, अर्द्धनारीश्वर की कल्पना में कुछ इस बात का भी संकेत मिलता है कि नर-नारी पूर्ण रूप से समान हैं। उनमें से एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। अर्थात् नरों में नारियों के गुण आये तो इससे उनकी मर्यादा हीन नहीं होगी, बल्कि उनकी पूर्णता में वृद्धि ही होगी। पुरुष अगर नारी की कोमलता, दया, सरलता जैसे गुण अपने में ले आये तो उसके जीवन में पूर्णता का बोध होता है। उसी प्रकार अगर नारी अपने में पौरुष भाव का समावेश करे, माता एवं पिता दोनों की भूमिका निभाए तो समाज में पूर्णता का भाव पैदा होगा।
वर्तमान युग में भी अर्द्धनारीश्वर की सार्थकता है। लेखक के अनुसार आज पुरुष और स्त्री में अर्द्धनारीश्वर का यह रूप कहीं भी देखने में नहीं आता। संसार में स्त्री एवं पुरुष में दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। संसार में सर्वत्र पुरुष-पुरुष है और स्त्री-स्त्री। नारी समझती है कि पुरुष भी स्त्रियोचित गुणों को अपनाकर समाज में स्त्रैण कहलाने से घबराता है। स्त्री और पुरुष के गुणों के बीच एक प्रकार का विभाजन हो गया है और विभाजन की रेखा को लाँघने में नर और नारी दोनों को भय लगता है।
लेकिन आज नर एवं नारी में सामंजस्य की आवश्यकता कहीं अधिक बढ़ गई है। आज के युग में दोनों की समान अनिवार्यता है। नर-नारी एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का कार्य अधूरा है। नर काया है तो नारी उसकी छाया। आज नर-नारी समान रूप से मिलजुलकर परिवार, समाज एवं देश को आगे बढ़ा सकते हैं। अतः अर्द्धनारीश्वर की कल्पना आज कहीं ज्यादा सार्थक है।
परिभाषाओं पर प्रश्न और उत्तर
- जिस पुरुष में नारीत्व नहीं, अपूर्ण है।
[2010ए, 2012ए, 2013ए, 2017ए, 2018ए, 2023ए]
- नारी तो हम हूँ करी, तब ना किया विचार।
जब जानी जब परिहरि, नारी महा विकार।।
उपर्युक्त पंक्तियों का भावार्थ लिखें।
[2012ए, 2013ए]
- प्रत्येक पत्नी अपने पति को बहुत कुछ उसी दृष्टि से देखती है जिस दृष्टि से
लता अपने वृक्ष को देखती है।
[2014ए]
- "नर और मादा पशुओं में भी थे और पक्षियों में भी। किन्तु पशुओं और पक्षियों ने अपनी मादाओं पर आर्थिक परवशता नहीं लादी। लेकिन, मनुष्य की मादा पर यह पराधीनता आप से आप लद गई।"
[2024ए]
उत्तर
- प्रस्तुत पंक्तियाँ रामधारी सिंह 'दिनकर' के निबंध 'अर्द्धनारीश्वर' से ली गयी है। निबंधकार दिनकर जी कहते हैं कि पुरुष पुरुषार्थ के लिए जाना जाता है तो स्त्री अपने स्त्रियोचित कोमलता के लिए। पुरुष में यदि स्त्रियजन्य कोमलता आ जाएगी तो वह निंदा का पात्र बनेगा। स्त्रियाँ यदि पुरुषों की तरह आक्रामक होंगी तो यह भी निन्दा का विषय हो जाता है।
आवश्यकता है कि पुरुष में भी कुछ नारीत्व के गुण रहें। जिस पुरुष में | केवल कठोरता ही कठोरता रहेगी तो नारियों के लिए जीना भी मुश्किल हो जाएगा। | पुरुषार्थ की मात्रा एक सीमा तक ही उचित कही जाएगी।
| 2. प्रस्तुत पंक्तियाँ 'अर्द्धनारीश्वर' शीर्षक पाठ से ली गयी है। इसके लेखक | राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी हैं। अर्द्धनारीश्वर शंकर और पार्वती का कल्पित | रूप है जिसका आधा अंग पुरुष तथा आधा अंग नारी का होता है। इस पाठ में लेखक ने कबीर दास के इस दोहा को प्रस्तुत किया है।
प्रस्तुत पंक्तियों में नारी के बारे में यह बताया गया है कि नारी की समाज में उपयोगिता होते हुए भी नारियों की निन्दा की गई है और यह बताया गया है कि नारी की स्थिति महाविकार की है। धर्म साधकों, महात्माओं और साधुओं ने नारी से विवाह भी किया और नारियों की निन्दा भी की है। आज के समाज में नारियों को महाविकार मानते हुए भी आजकल नारी का स्थान ऊँचा बनता जा रहा है। नारी प्राचीन होकर अपना समस्त मूल्य भूल गयी है। उसका अस्तित्व समाप्त होता जा रहा है। फिर भी कवि और चिंतकों में नारी की प्राचीनता के बारे में चिंतन करते हुए यह कहा है कि पुरुष के सामान नारी का भी अपना अस्तित्व है। नारी का भी समुचित स्थान होना चाहिए क्योंकि पुरुष और नारी के सम्मिलित सहयोग से स्वस्थ | परिवार और स्वरूप समाज का निर्माण होता है।
| 3. प्रस्तुत व्याख्येय पंक्तियाँ रामधारी सिंह 'दिनकर' रचित निबंध अर्द्धनारीश्वर | से ली गयी हैं। प्रस्तुत पंक्तियों में कवि यह कहना चाहता हैं कि लता वृक्ष से पोषण | एवं सुरक्षा पाती है। अतः वह वृक्ष पर निर्भर रहती है। प्रत्येक पत्नी पति को प्रेम | की दृष्टि से देखती है। यदि वह प्रेम न मिले तो पत्नी अपने जीवन को अधूरा | मानती है। यह पारस्परिक निर्भरता जैविकीय आवश्यकता भी है। पुरुष स्त्री को प्रेम | एवं सुरक्षा प्रदान करता है। पत्नी पति के लिए फूलों-सा आनन्दमय भार है।
| 4. प्रस्तुत सारगर्भित वाक्य हमारी पाठ्यपुस्तक 'दिगंत, भाग-2' में संगृहीत | विचारोत्तेजक निबंध 'अर्धनारीश्वर' से लिया गया है। इसके निबंधकार रामधारी सिंह 'दिनकर' है। "नर और मादा पशुओं में भी थे और पक्षियों में भी। किंतु पशुओं | और पक्षियों ने अपनी मादाओं पर आर्थिक परवशता नहीं लादी। लेकिन, मनुष्य की | मादा पर यह पराधीनता आप से आप लद गई।"
नर और मादा पशुओं में भी थे और पक्षियों में भी। किन्तु पशुओं और पक्षियों ने अपनी मादाओं पर आर्थिक परवशता नहीं लादी। लेकिन, मनुष्य की मादा पर यह पराधीनता आप से आप लद गई। और इस पराधीनता ने नर-नारी से वह सहज दृष्टि भी छीन ली जिससे नर पक्षी अपनी मादा को या मादा अपने नर को देखती है। कृषि का विकास सभ्यता का पहला सोपान था, किन्तु इस पहली ही सीढ़ी पर सभ्यता ने मनुष्य से भारी कीमत वसूल कर ली। आज प्रत्येक पुरुष अपनी पत्नी को फूलों सा आनंदमय भार समझता है और प्रत्येक पत्नी अपने पति को बहुत कुछ उसी दृष्टि से देखती है जिस दृष्टि से लता अपने वृक्ष को देखती होगी।
इस पराधीनता के कारण नारी अपने अस्तित्व की अधिकारिणी नहीं रही। | उसके सुख और दुःख, प्रतिष्ठा और अप्रतिष्ठा, यहाँ तक कि जीवन और मरण | पुरुष की मर्जी पर टिकने लगे। उसका सारा मूल्य इस बात पर जा ठहरा कि पुरुषों | को उसकी कोई आवश्यकता है या नहीं। इसी से नारी की पद-मर्यादा प्रवृत्तिमार्ग | के प्रचार से उठती और निवृत्तिमार्ग के प्रचार से गिरती रही है।
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