- हँसते हुए मेरा अकेलापन
महत्त्वपूर्ण बिंदु
'हँसते हुए मेरा अकेलापन' कहानी के रचनाकार मलयज हैं।
इनका जन्म 1935 ई० को उत्तर प्रदेश के महूई, आजमगढ़ में हुआ था।
इनके माता-पिता का नाम प्रभावती एवं त्रिलोकी नाथ वर्मा था।
इनका निधन 26 अप्रैल, 1982 ई० को हुआ था।
२. इनकी कुछ रचनाएँ इस प्रकार से हैं-
कविता-जख्म पर धूल (1971), अपने होने को अप्रकाशित करता हुआ (1980)। आलोचना-कविता से साक्षात्कार (1979), संवाद और एकालाप
(1984), रामचंद्र शुक्ल (1987)। सर्जनात्मक गद्य-हँसते हुए मेरा अकेलापन
(1982), डायरी-3 खंड, संपादक-डॉ० नामवर सिंह।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- डायरी का लिखा जाना क्यों मुश्किल है ?
[2012ए, 2013ए, 2016ए)
- डायरी क्या है ?
[2017ए, 2023ए]
- 'धरती का क्षण' से क्या आशय है ?
[2020ए]
उत्तर
- डायरी में लेखक को स्वयं के बारे में लिखना होता है। स्वयं अपनी गलती भी और सही भी। यहाँ लेखक को तटस्थ होना पड़ता है। झूठ नहीं लिखना है, यथार्थ लिखना है।
आदमी की यह कमजोरी है कि वह अपनी आलोचना स्वयं नहीं कर पाता है। इसलिए डायरी लेखन कठिन कार्य हो जाता है। अपने संघर्ष की कहानी में तो वह बड़बोलापन दिखलाता है, लेकिन अपनी गलतियों पर पर्दा डाले रखता है। थोड़ा-बहुत झूठ का भी सहारा ले लेता है।
डायरी एक साहित्य है। प्रतिदिन की घटनाओं की लेखकीय प्रतिक्रिया है, डायरी। डायरी में लेखक को अपने आलोचना भी करनी पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में तटस्थता का ईमानदारी से निर्वाह नहीं हो पाती। डायरी से लेखक को कच्चा माल मिलता रहता है। लेखकीय अभ्यास का एक उत्तम माध्यम है, डायरी लेखन। डायरी लेखन कुछ लेखकों के लिए जीवन जीने जैसा कर्म होता है। डायरी लेखन एक जलता हुआ जंगल है, तटस्थता का घोंसला नहीं। डायरी संघर्ष का प्रवक्ता है।
लेखक जब कभी डायरी लिखते समय कविता के मूड में आ जाते हैं तो शब्द और अर्थ के बीच कोई दूरी नहीं रह जाती है। शब्द अर्थ मैं और अर्थ शब्द में परिवर्तित हो जाते हैं। जब शब्द और अर्थ साथ नहीं होते, उस समय आकाश होता है। इस आकाश में रचनाएँ बिजली रूपी फूल की तरह खिल जाती हैं।
किन्तु जब अर्थ और शब्द एक साथ होते हैं तो वह धरती का क्षण होता है। उस समय रचनाएँ जड़ पा लेती है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- ' हँसते हुए मेरा अकेलापन' शीर्षक पाठ का सारांश लिखिए।
[2023ए]
उत्तर
"हँसते हुए मेरा अकेलापन
- " शीर्षक डायरी मलयज की एक उत्कृष्ट रचना है। मलयज अत्यन्त आत्मसजग किस्म के बौद्धिक व्यक्ति थे। डायरी लिखना मलयज के लिए जीवन जीने के कार्य जैसा था। ये डायरी मलयज के समय की उथल-पुथल और उनके निजी जीवन की तकलीफों बेचैनियों के साथ एक गहरा रिश्ता बनाते हैं। इस डायरी में एक औसत भारतीय लेखक के परिवेश को हम उसकी समस्त जटिलताओं में देख सकते हैं।
पाठ्य पुस्तक में प्रस्तुत डायरी के अंश की प्रथम डायरी में मलयज ने प्रकृति एवं मानव के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया है। मिलिट्री की छावनी में वृक्ष काटे जा रहे हैं। लेखक वृक्षों के एक गिरोह में उनकी एकात्मकता का संकेत देता है।
दूसरे दिन की डायरी में लेखक ने मनुष्य के जीवन की तुलना खेती की फसलों से की है। मनुष्य का जीवन फसल के समान बढ़ता, पकता एवं कटता दिखायी देता है। तीसरे दिन की डायरी में लेखक ने चिट्ठी की उम्मीद में और चिट्ठी नहीं आने पर अपनी मनोदशा का वर्णन किया है। चिट्ठी नहीं आनेपर एक अजीब-सी बेचैनी मन में आती है।
चौथे दिन की डायरी में लेखक ने लेखक बलभद्र ठाकुर नामक एक लेखक का चित्रण किया है और बताने का प्रयास किया है कि एक लेखकं कितना सरल एवं मिलनसार होता है। अपनी रचनाओं पर लेखक को गर्व होता है, उसका सहज चित्र इस डायरी में प्रस्तुत है। कौसानी में कुछ दिनों तक लेखक का प्रवास बड़ा ही आनंददायक रहा। दो शिक्षकों का चित्रण उनके सहज एवं सामाजिक स्वभाव को दिखाया गया है। पाँचवीं डायरी में भी लेखक ने कौसानी के प्राकृतिक एवं शांत वातावरण का चित्रण किया है।
छठी डायरी में मलयज ने एक सेब बेचने वाली किशोरी का चित्रण बड़ी ही कुशलतापूर्वक किया है। किशोरी इतनी भोली थी कि सेब बेचने में उसका भोलापन परिलक्षित होता है। सातवीं डायरी में मलयज यथार्थवादी दिखायी देते हैं। उनके अनुसार मनुष्य यथार्थ को रचता भी है और यथार्थ में जीता भी है। उनके अनुसार रचा हुआ यथार्थ भोगे हुए यथार्थ से अलग है। बाल-बच्चे रचे हुए यथार्थ हैं। वे सांसारिक वस्तुओं का भोग करते हैं। उनके अनुसार रचने और भोगने का रिश्ता एक द्वंद्वात्मक रिश्ता है।
आठवीं डायरी लेखक ने शब्द एवं अर्थ के बीच निकटता का वर्णन किया है। लेखक का कहना है शब्द अधिक होने पर अर्थ कमने लगता है और अर्थ की अधिकता में शब्दों की कमी होने लगती है। अर्थात् शब्द अर्थ में और अर्थ शब्द में बदलते चले जाते हैं। :
नवीं डायरी में लेखक ने सुरक्षा पर अपना विचार व्यक्त किया है। व्यक्ति की सुरक्षा रोशनी में हो सकती है, अंधेरे में नहीं। अंधेरे में सिर्फ छिपा जा सकता है। सुरक्षा तो चुनौती को झेलने में ही है, बेचैनी में नहीं। अतः आक्रामक व्यक्ति ही अपनी सुरक्षा कर सकता है। बचाव करने में व्यक्ति असुरक्षित होता है।
दसवीं डायरी में लेखक ने रचना और दस्तावेज में भेद एवं दोनों में | पारस्परिक संबंध की चर्चा की है। लेखक के अनुसार दस्तावेज रचना का. कच्चा माल है। दस्तावेज रचनारूपी करेंसी के वास्तविक मूल्य प्रदान करने वाला | मूलधन है।
ग्यारहवीं डायरी में लेखक ने मन में पैदा होने वाले डर का वर्णन किया है। लेखक अपने को भीतर से डरा हुआ व्यक्ति मानता है। मन का डर तनाव पैदा | करता है, संशय पैदा करता है। किसी की प्रतीक्षा की घड़ी बीत जाने पर मन में डर पैदा होता है। डर कई प्रकार के होते हैं। मनुष्य जैसे-जैसे जीवनरूपी समस्याओं से घिरता जाता है, उसके मन में डर की मात्रा भी बढ़ती जाती है।
अंतिम डायरी में लेखक ने जीवन में तनाव के प्रभाव का वर्णन किया है। मनुष्य जीवन में संघर्षों का सामना करते समय तनाव से भरा रहता है।
इस प्रकार प्रस्तुत डायरी के अंश में मलयज ने अपने जीवन के संघर्षों एवं | दुःखों की ओर इशारा करते हुए मानव जीवन में पाये जाने वाले सहज समस्याओं | का चित्रण बड़ी ही कुशलता से किया है। एक व्यक्ति को कितना खुला, ईमानदार | और विचारशील होना चाहिए-इस भाव का सहज चित्रण लेखक ने अपनी डायरी | में प्रस्तुत किया है। व्यक्ति के क्या दायित्व हैं और अपने दायित्वों के प्रति कैसा | लगाव, कैसी सन्निध्यता होनी चाहिए-ये सारे भाव प्रस्तुत डायरी में स्पष्ट रूप से | चित्रित हैं।
| परिभाषाओं पर सवाल और जवाब
"आदमी यथार्थ को जीता ही नहीं, यथार्थ को रचता भी है।"
[2012ए, 2013ए, 2014ए, 2015ए, 2019ए]
- "एक कलाकार के लिए यह निहायत जरूरी है कि उसमें 'आग' हो और वह
खुद 'ठंडा' हो।"
[2023ए]
उत्तर
- प्रस्तुत पक्ति समर्थ लेखक मलयज के 10 मई 78 की डायरी की है। मनुष्य अपनी दैनन्दिन जिंदगी में जो कुछ करता है, जिन संघर्षों के साथ रहता है, वह यथार्थ है। जीवमात्र को जीने के लिए हमेशा संघर्ष करना पड़ता है। वह इन संघर्षों को जीता है। यदि संघर्ष ना रहे तो जीवन का कोई मोल ही न हो। मनुष्य इन यथार्थों के सहारे जीवन जीता है। वह इन यथार्थ का भोग भी करता है और भोग करने के दौरान इनकी सर्जना भी कर देता है। संघर्ष को जन्म देती है। कहा गया है गति ही 'जीवन है और जड़ता मृत्यु। इस प्रकार आदमी यथार्थ को जीता है।
भोग हुआ यथार्थ दिया हुआ यथार्थ है। हर एक अपने यथार्थ की सर्जना | करता है और उसका एक हिस्सा दूसरे को दे देता है। इस तरह यह क्रम चलता | रहता है। इसलिए यथार्थ की रचना सामाजिक सत्य की सृष्टि के लिए एक नैतिक | कर्म है।
- प्रस्तुत पक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक दिगन्त भाग-2 के 'हँसते हुए मेरा अकेलापन' शीर्षक पाठ से ली गई है। इन पंक्तियों में लेखक मौसम के रूप की तुलना करते हुए एक कलाकार के लिए अत्यावश्यक कौन-सी चीजें हैं, उसकी ओर ध्यान आकृष्ट किया है। यह प्रसंग उसी संदर्भ में जुड़ा है।
प्रस्तुत पंक्तियाँ में मलयज जी ने अपनी डायरी के पन्नों में मौसम के मिजाज का वर्णन बड़ी बखूबी के साथ किया है। ठीक उसी प्रकार एक कलाकार के लिए किस चीज की निहायत जरूरत होती है उसकी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। लेखक का मंतव्य है कि ऐसे ठंडे मौसम में भी कलाकार के हृदय में 'आग' है, लेकिन उसका दिमाग ठंढा है। कलाकार के हृदय और मस्तिष्क के बीच संतुलन आवश्यक है तभी वह उच्चकोटि की कला का सृजन कर सकता है। उसके भीतर अगर 'आग' नहीं हो यानि जीवंतता नहीं हो तो वह सफल कलाकार नहीं हो
सकता। सृजनधर्मिता के लिए कलाकार के अंतर्मन में आग की धुनी सदैव जलती | रहनी चाहिए। तभी वह अपनी साधना को मूर्त रूप देने में सफल हो सकेगा। | लेकिन यह तभी संभव है जब उसका दिमाग ठंडा हो यानि संतुलित हो। मन और दिमाग में संतुलन, गंभीरता एवं प्रखरता हो। साथ ही स्थिरता, धीरता एवं एकात्मकता भी होनी चाहिए। भीतर प्रखर तल्ख विचारों का सागर हो तो मन में अथाह गंभीरता एवं तरलता हो। तभी कलाकार अपने लक्ष्य के शिखर को छू पाएगा।
|
|
उक्त पंक्तियों में मलयज का विचार है कि किसी भी कलाकार के लिए विचार क्रांति का मस्तिष्क में होना अत्यावश्यक है एवं दिल में तरलता, सरलता का भी साथ-साथ होना निहायत जरूरी है। तभी कलाकार का जीवन और सृजन-कर्म पूर्णता को प्राप्त कर सकेगा।
Join the Discussion