- रोज
महत्त्वपूर्ण बिंदु
'रोज' कहानी के रचनाकार सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' हैं।
इनका जन्म 7 मार्च 1911 ई० को उत्तर प्रदेश के कसेया, कुशीनगर में हुआ था।
उनके माता-पिता व्यंती देवी और डॉ. हीरानंद शास्त्री थे।
इनका निधन 4 अप्रैल, 1987 ई० को हुआ था।
इनकी कुछ रचनाएँ इस प्रकार से हैं-
सैनिक (आगरा), विशाल भारत (कोलकाता), प्रतीक (प्रयाग), दिनमान (दिल्ली), नया प्रतीक (दिल्ली), नवभारत टाइम्स (नई दिल्ली); थॉट वाक्, एवरीमैंस (अंग्रेजी में संपादन)।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- मालती के घर का वातावरण कैसा था ?
[2011ए]
- 'रोज' कहानी की मालती ने किताब का क्या किया था ?
[2019ए]
- मालती के पति का परिचय दें।
[2022ए]
- लेखक और मालती के सम्बन्ध का परिचय 'रोज' शीर्षक कहानी के आधार पर दें।
[2024ए]
उत्तर
अज्ञेय रचित कहानी 'रोज' की मालती का घर यंत्रवत् चलता था। उसमें आनंद नहीं था। समय की ही पाबंदी का पालन मात्र होता था। जीवन नीरस हो गया था। एक विवाहित स्त्री अभाव में घुटती जा रही थी। उसका जीवन त्रासदी भरा हो गया था।
रोज कहानी के मालती को पढ़ने-लिखने का बहुत अधिक शौक था मालती ने किताब को एक सुरक्षित स्थान पर रख दिया था बाद में उसने उस किताब को पढ़ा भी था।
महेश्वर मालती का पति है जो एक पहाड़ी गाँव में सरकारी डिस्पेंसरी में डॉक्टर है। उनका जीवन यंत्रवत है। अस्पताल में रोगियों को देखने और अन्य जरूरी हिदायतें करने उनका जीवन भी बिल्कुल निर्दिष्ट ढरें पर चलता है, नित्य वही काम, उसी प्रकार का मरीज, वही हिदायतें, वही नुस्खे, वही दवाइयाँ। वह स्वयं उकताए हुए हैं और साथ ही इस भयंकर गर्मी के कारण वह अपने फुरसत के समय में भी सुस्त रहते हैं।
लेखक ने कहानी में महेश्वर की उपस्थिति कराकर कहानी को जीवंत बना दिया है। कहानी की नायिका मालती का जीवन उसी के इन्तजार एवं थकान की | लम्बी साँस । महेश्वर की जिन्दगी के समान ही मालती की जिन्दगी ऊब और | उदासी के बीच यंत्रवत चल रही है। किसी तरह के मनोविनोद, उल्लास उसके | जीवन में नहीं रह गये हैं। महेश्वर मरीज और डिस्पेंसरी के चक्कर में अपने जीवन | को भार समान ढो रहा है तो मालती चूल्हा-चक्की, पति का इन्तजार तथा बच्चे
| के लालन-पालन में।
- लेखक मालती के दूर के रिश्ते का भाई है। किंतु लेखक का संबंध सख्य का ही रहा है। लेखक और मालती बचपन में एक साथ इकट्ठे खेले हैं, लड़े हैं और पिटे भी हैं। लेखक की पढ़ाई भी मालती के साथ ही हुई है। लेखक और मालती का व्यवहार एक-दूसरे के प्रति सख्य की स्वेच्छा और स्वच्छंदता भरा रहा है। कभी भ्रातृत्व के रूप में या कभी किसी और रूप में। कभी बड़े-छोटेपन के बंधनों में नहीं बंधे।
| दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- 'रोज' कहानी का सारांश लिखिए।
अथवा, 'रोज' कहानी के केन्द्रीय संदेश की समीक्षा करें।
- 'रोज' शीर्षक कहानी का उद्देश्य लिखें।
[2010ए, 2012ए, 2013ए]
[2021ए]
[2017ए]
उत्तर
- कहानी के पहले भाग में मालती द्वारा अपने भाई के औपचारिक स्वागत का उल्लेख है जिसमें कोई उत्साह नहीं है, बल्कि कर्त्तव्यपालक की औपचारिकता अधिक है। वह अतिथि का कुशलक्षेम तक नहीं पूछती, पर पंखा अवश्य झलती है। उसके प्रश्नों का संक्षिप्त उत्तर देती है। बचपन की बातूनी चंचल लड़की शादी | के दो वर्षों बाद इतनी बदल जाती है कि वह चुप रहने लगती है। उसका व्यक्तित्व | बुझ-सा गया है। अतिथि का आना उस घर के ऊपर कोई काली छाया मँडराती हुई | लगती है।
मालती और अतिथि के बीच के मौन को मालती का बच्चा सोते सोते रोने | से तोड़ता है। वह बच्चे को सँभालने के कर्तव्य का पालन करने के लिए दूसरे कमरे में चली जाती है। अतिथि एक तीखा प्रश्न पूछता है तो उसका उत्तर वह एक | प्रश्नावाचक 'हूँ' से देती है। मानो उसके पास कहने के लिए कुछ नहीं है। यह आचरण उसकी उदासी, ऊबाहट और यांत्रिक जीवन की यंत्रणा को प्रकट करता है। दो वर्षों के वैवाहिक जीवन के बाद नारी कितनी बदल जाती है, यह कहानी के इस भाग में प्रकट हो जाती है। कहानी के इस भाग में मालती कर्त्तव्यपालन की औपचारिकता पूरी करती प्रतीत होती है पर उस कर्त्तव्यपालन में कोई उत्साह नहीं | है, जिससे उसके नीरस, उदास, यांत्रिक जीवन की ओर संकेत करता है। अतिथि | से हुए उसके संवादों में भी एक उत्साहहीनता और ठंडापन है। उसका व्यवहार | उसकी द्वन्द्वग्रस्त मनोदशा का सूचक है। इस प्रकार कहानीकार बाह्य स्थिति और | मनःस्थित के संश्लिष्ट अंकन में सफल हुआ है।
रोज कहानी के दूसरे भाग में मालती का अंतर्द्वन्द्वग्रस्त मानसिक स्थिति, बीते बचपन की स्मृतियों में खोने से एक असंज्ञा की स्थिति, शारीरिक जड़ता और थकान का कुशल अंकन हुआ है। साथ ही उसके पति के यांत्रिक जीवन, पानी, सब्जी, नौकर आदि के अभावों का भी उल्लेख हुआ है। मालती पति के खाने के बाद दोपहर को तीन बजे और रात को दस बजे ही भोजन करेगी और यह रोज का क्रम है। बच्चे का रोना, मालती का देर से भोजन करना, पानी का नियमित रूप से वक्त पर न आना, पति का सवेरे डिस्पेन्सरी जाकर दोपहर को लौटना और शाम | को फिर डिस्पेन्सरी में रोगियों को देखना, यह सबकुछ मालती के जीवन में रोज | एक जैसा हीं है। घंटा खड़कने पर समय की गिनती करना मालती के नीरस जीवन | की सूचना देता है अथवा यह बताता है कि समय काटना उसके लिए कठिन हो | रहा है।
इस भाग में मालती, महेश्वर, अतिथि के बहुत कम क्रियाकलापों और अत्यंत संक्षिप्त संवादों के अंकन से पात्रों की बदलती मानसिक स्थितियों को प्रस्तुत किया गया है, जिससे यही लगता है कि लेखक का ध्यान बाह्य दृश्य के बजाए अंतर्दृश्य पर अधिक है।
कहानी के तीसरे भाग में महेश्वर की यांत्रिक दिनचर्या, अस्पताल के एक जैसे ढरें, रोगियों की टांग काटने या उसके मरने के नित्य चिकित्सा-कर्म का पता चलता है, पर अज्ञेय का ध्यान मालती के जीवन-संघर्ष को चित्रित करने पर केद्रित है।
महेश्वर और अतिथि बाहर पलंग पर बैठ कर गपशप करते रहे और चाँदनी रात का आनन्द लेते रहे, पर मालती घर के अंदर बर्तन माँजती रही, क्योंकि यही उसकी नियति थी।
बच्चे का बार-बार पलंग से नीचे गिर पड़ना और उस पर मालती की चिड़चिड़ी प्रतिक्रिया मानो पूछती है वह बच्चे को सँभाले या बर्तन मले ? यह काम नारी को ही क्यों करना पड़ता है? क्या यही उसकी नियति है ?
इस अचानक प्रकट होने वाली जीवनेच्छा के बावजूद कहानी का मुख्य स्वर चुनौती के बजाए समझौते का और मालती की सहनशीलता का है। इसमें नारी जीवन को विषम स्थितियों का कुशल अंकन हुआ है। बच्चे की चोटें भी मामूली बात है, क्योंकि उसे चोटें रोज लगती हैं। मालती के मन पर लगने वाली चोटें भी चिन्ता का विषय नहीं है, क्योंकि वह रोज इन चोटों को सहती रहती है। 'रोज' की ध्वनि कहानी में निरन्तर गूँजती रहती है।
कहानी का अंत 'ग्यारह' बजने की घंटा-ध्वनि से होता है और तब मालती करुण स्वर में कहती है 'ग्यारह बज गए"। उसका घंटा गिनना उसके जीवन की निराशा और करुण स्थिति को प्रकट करता है।
कहानी एक रोचक मोड़ पर वहाँ पहुँचती है, जहाँ महेश्वर अपनी पत्नी को आम धोकर लाने का आदेश देता है। आम एक अखबार के टुकड़े में लिपटे हैं। जब वह अखबार का टुकड़ा देखती है, तो उसे पढ़ने में तल्लीन हो जाती है। उसके घर में अखबार का भी अभाव है। वह अखबार के लिए भी तरसती है। इसलिए अखबार का टुकड़ा हाथ में आने पर वह उसे पढ़ने में तल्लीन हो जाती है। यह इस बात का सूचक है कि अपनी सीमित दुनिया से बाहर निकल कर वह उसके आस-पास की व्यापक दुनिया से जुड़ना चाहती है। जीवन की जड़ता के बीच भी उसमें कुछ जिज्ञासा बनी है, जो उसकी जिजीविषा की सूचक है। मालती की जिजीविषा के लक्षण कहानी में यदा-कदा प्रकट होते हैं, पर कहानी का मुख्य स्वर चुनौती का नहीं है, बल्कि समझौते और परिस्थितियों के प्रति सहनशीलता का है जो उसके मूल में उसकी पति के प्रतिनिष्ठा और कर्त्तव्यपरायणता को अभिव्यक्त करता है। वह भी परंपरागत सोच की शिकार है, जो इसमें विश्वास करती है कि यह उसके जीवन का सच है। इससे इतर वह सोच भी नहीं सकती। जिस प्रकार से समाज के सरोकारों से वह कटी हुई है, उसे रोज का अखबार तक हासिल नहीं है, जिससे अपने ऊबाठपन जीवन से दो क्षण निकालकर बाहर की दुनिया में क्या कुछ घटित हो रहा है, उससे जुड़ने का मौका मिल सके। ऐसी स्थिति में एक आम महिला से अपने अस्तित्व के प्रति चिंतित होकर सोचते, उसके लिए संघर्ष करने अथवा उबाठ जीवन से उबरने हेतु जीवन में कुछ परिवर्तन लाने की उम्मीद ही नहीं बचती।
- 'रोज' शीर्षक कहानी के लेखक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' हैं। इस कहानी की नायिका मालती है। लेखक द्वारा लिखे गए इस कहानी का उद्देश्य स्त्री की कारुणिक दशा को बताना है। मालती अपने घर-गृहस्थी में हर रोज लगी रहती है और अपने कर्तव्यों को निभाती है। वह अपने पति और बच्चे की सेवा में लगी रहती है। वह अपने कर्तव्य में हमेशा लीन बनी रहती है। हमेशा घर में रहने और पारिवारिक जीवन के कर्तव्य को निभाते रहने से उसका जीवन एक यांत्रिक जीवन बन गया है। वह हमेशा अपने कर्तव्य पालन की औपचारिकता को पूरी करती रहती है। इस तरह के जीवन से उसमें उबाऊपन आ गया है। वह समाज के सरोकारों से कही हुई है। उसे अखबार पढ़ने की भी फुरसत नहीं है। वह अबला नारी-जीवन बिताती है और हमेशा घर-गृहस्थी में लगी रहती है। उसे बाहरी दुनिया से कोई सरोकार नहीं है। लेकिन लेखक का यह कहना है कि नारी को कुछ स्वतंत्रता भी मिलना चाहिए। उसे बाहरी दुनिया से भी संबंध बनाए रखने का भी समय अवश्य मिलना चाहिए। उसकी इच्छाओं पर भी ध्यान रखना चाहिए। तभी एक स्त्री का जीवन सफल हो सकता है।
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