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BSEB Class 12 Hindi Chapter 6 Ek Lekh Aur Ek Patra

!

  1. एक लेख और एक पत्र

महत्त्वपूर्ण बिंदु

'एक लेख और एक पत्र' के रचनाकार भगत सिंह हैं।

इनका जन्म 28 सितम्बर, 1907 ई० को पाकिस्तान के लायलपुर में हुआ था।

इनके माता-पिता का नाम, विद्यावती एवं सरदार किशन सिंह था।

इनका निधन 23 मार्च, 1931 ई० को हुआ था।

इनकी कुछ रचनाएँ इस प्रकार से हैं-

पंजाब की भाषा तथा लिपि की समस्या (हिन्दी में 1924), विश्वप्रेम (कलकत्ता के मतवाला में 1924 में प्रकाशित हिन्दी लेख), 'युवक' (मतवाला में 1924 में प्रकाशित हिन्दी लेख), मैं नास्तिक क्यों हूँ (1930-31), अछूत समस्या, विद्यार्थी और राजनीति, सत्याग्रह और हड़तालें, बम का दर्शन, भारतीय क्रांति का आदर्श आदि अनेक लेखा

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर

विद्यार्थियों से भगत सिंह की अपेक्षा क्या था ?

[2010ए, 20214]

  1. विद्यार्थियों को राजनीति में भाग क्यों लेना चाहिए ? 'एक लेख और एक पत्र' शीर्षक पाठ के आधार पर लिखें।

(2012, 2013ए, 2024ए, 2025ए)

  1. भगत सिंह के अनुसार देश को कैसे युवकों की आवश्यकता है ?

[2018ए]

  1. भगत सिंह कौन थे ?

[2019ए]

  1. भगत सिंह विद्यार्थियों के लिए कैसी शिक्षा जरूरी मानते हैं ?

[2026ए]

उत्तर

  1. भगत सिंह कहते हैं कि हिन्दुस्तान को ऐसे देशसेवकों की जरूरत है जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आजादी के लिए या देश के विकास में न्योछावर कर दे। यह कार्य सिर्फ विद्यार्थी ही कर सकते हैं। सभी देशों को आजाद करने वाले वहाँ के विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं। वे ही क्रांति कर सकते हैं। अतः विद्यार्थी पढ़े। जरूर पढ़े। साथ ही पॉलिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करे और जब जरूरत हो तो मैदान में कूद पड़े-और अपना जीवन इसी काम में लगा दे। अपने प्राणों को इसी में उत्सर्ग कर दे। यही अपेक्षाएँ हैं विद्यार्थियों से भगत सिंह की।

  2. सरदार भगत सिंह के अनुसार विद्यार्थी देश के कर्णधार होते हैं। आने वाले समय में देश की बागडोर उन्हें अपने हाथ में लेनी है। उन्हें देश की समस्याओं और सुधार में हिस्सा लेना है। अतः देश के विकास के लिए विद्यार्थी को राजनीति में भाग लेना चाहिए। क्योंकि सत्ता राजनीतिज्ञ के हाथ में होती है। छात्र जीवन में विद्यार्थी को पढ़ाई के साथ-साथ अन्य सामाजिक कार्य भी देखने हैं। भगत सिंह मानते हैं कि नौजवान "वह चढ़ सकता है उन्नति की सर्वोच्च शिखर पर, वह गिर सकता है अर्द्धपतन के अंधेरे खंदक में" विद्यार्थियों के हाथ में है पतितों के उत्थान। वे ही क्रांति का संदेश देश के कोने-कोने में पहुँचा सकते हैं। फैक्ट्री, कारखाना, गंदी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वालों के बीच क्रांति की अलख जगा सकते हैं जिससे आजादी आएगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असंभव होगा। छात्रों में देश की समझदारी और समस्याओं में सुधार की योग्यता होना बेहद जरूरी है और जो शिक्षा ऐसी नहीं कर सकती है वह निकम्मी शिक्षा है जो केवल देश में क्लर्क पैदा कर सकती है। हम सभी जानते हैं कि हिन्दुस्तान को ऐसे सेवकों की जरूरत है जो तन, मन, धन देश पर अर्पित कर दे और पागलों की तरह पूरी उम्र देश सेवा में बिता दे। ये वही विद्यार्थी या नौजवान कर सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फँसे हों। जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो। यह व्यावहारिक ज्ञान ही राजनीति है। अतः विद्यार्थी पढ़े मगर साथ ही राजनीति का ज्ञान भी हासिल करे। देश को सही दिशा देने के लिए विद्यार्थी को राजनीति का पाठ जरूर पढ़ना चाहिए।

  3. भगत सिंह के अनुसार देश को जुझारू, कर्मठ एवं बलिदानी युवकों की आवश्यकता है, जो देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दे।

  4. भगत सिंह एक महान क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी और विचारक थे।

  5. भगत सिंह विद्यार्थियों के लिए वैज्ञानिक, व्यावहारिक और राष्ट्रवादी शिक्षा को आवश्यक मानते हैं। उनके अनुसार शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज की सच्चाइयों को समझना, तर्कशील बनना और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस पैदा करना होना चाहिए।

भगत सिंह ऐसी शिक्षा के पक्षधर थे जो अंधविश्वास से मुक्त, वैचारिक स्वतंत्रता पर आधारित और सामाजिक समानता को बढ़ावा देने वाली हो। वे मानते थे कि विद्यार्थी देश का भविष्य हैं, इसलिए उन्हें जागरूक नागरिक, नैतिक रूप से मजबूत और क्रांतिकारी सोच वाला बनाया जाना चाहिए।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर

  1. भगत सिंह ने कैसी मृत्यु को 'सुन्दर' कहा है ? वे आत्महत्या को कायरता कहते हैं, इस संबंध में उनके विचारों को स्पष्ट करें।

उत्तर

[2009ए, 2011ए]

  1. भगत सिंह देश सेवा के बदले दी गई फाँसी (मृत्युदंड) को सुंदर मृत्यु कहा है। भगत सिंह इस संदर्भ में कहते हैं कि जब देश के भाग्य का निर्णय हो रहा हो

तो व्यक्तियों के भाग्य को पूर्णतया भुला देनी चाहिए। इसी दृढ़ इच्छा के साथ हमारी मुक्ति का प्रस्ताव सम्मिलित रूप में और विश्वव्यापी हो और उसके साथ ही जब यह आंदोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँचे तो हमें फाँसी दे दी जाय। यह मृत्यु भगत सिंह के लिए सुंदर होगी जिसमें हमारे देश का कल्याण होगा। शोषक यहाँ से चले जायेंगे और हम अपना कार्य आप करेंगे। इसी के साथ व्यापक समाजवाद की कल्पना भी करते हैं जिसमें हमारी मृत्यु बेकार न जाय। अर्थात् संघर्ष में मरना एक आदर्श मृत्यु है। भगत सिंह आत्महत्या को कयरता कहते हैं क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो आत्महत्या करेगा वह थोड़ा दुख, कष्ट सहने के चलते करेगा। वह अपना समस्त मूल्य एक ही क्षण में खो देगा। इस संदर्भ में उनका विचार है कि मेरे जैसे विश्वास और विचारों वाला व्यक्ति व्यर्थ में मरना कदापि सहन नहीं | कर सकता। हम तो अपने जीवन का अधिक-से-अधिक मूल्य प्राप्त करना चाहते | हैं। हम मानवता की अधिक-से-अधिक सेवा करना चाहते हैं। संघर्ष में मरना एक | आदर्श मृत्यु है। प्रयत्नशील होना एवं श्रेष्ठ और उत्कृष्ट आदर्श के लिए जीवन दे | देना कदापि आत्महत्या नहीं कही जा सकती। आत्महत्या को कायरता इसलिए. | कहते हैं कि केवल कुछ दुखों से बचने के लिए अपने जीवन को समाप्त कर देते | हैं। इस संदर्भ में वे एक विचार भी देते हैं कि विपत्तियाँ व्यक्ति को पूर्ण बनाने | वाली होती हैं।

| परिभाषाओं पर सवाल और जवाब

  1. "हम तो केवल अपने समय की आवश्यकता की उपज है।"

[2022ए]

उत्तर

  1. प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक दिगन्त, भाग-2 के 'एक लेख और एक पत्र' पाठ से ली गई है। इन पंक्तियों में क्रान्ति के अग्रदूत भगत सिंह का विचार है कि हमें यह नहीं समझना चाहिए कि यदि हम इस क्षेत्र में न उतरे होते तो कोई भी क्रांतिकारी कार्य कदापि नहीं हुआ होता। ऐसा सोचना हमारी भूल होगी। | निस्संदेह हम भी वातावरण को बदलने में काफी हद तक सहायक सिद्ध हुए, | अर्थात् हमारी भी भूमिका महत्वपूर्ण है, किन्तु हम तो केवल अपने समय की | आवश्यकता की उपज हैं। हमने समय की पुकार को समझा एवं सहयोग दिया है।

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