- ओ सदानीरा
महत्त्वपूर्ण बिंदु
'ओ सदानीरा' निबंध के रचनाकार जगदीशचन्द्र माथुर हैं।
इनका जन्म 16 जुलाई, 1917 ई० को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था।
इनका निधन 14 जुलाई, 1978 ई० को हुआ था।
इनकी कुछ रचनाएँ इस प्रकार से हैं-
1936 में प्रथम एकांकी 'मेरी बाँसुरी' का मंचन व 'सरस्वती' में प्रकाशन। पाँच एकांकी नाटकों का संग्रह 'भोर का तारा' 1946 में प्रकाशित। इसके बाद 'ओ मेरे सपने' (1950), 'मेरे श्रेष्ठ रंग एकांकी, 'कोणार्क' (1951), 'बंदी' (1954), 'शारदीया' (1959), 'पहला राजा' (1969), 'दशरथ नंदन' (1974)
'कुँवर सिंह की टेक' (1954) और 'गगन सवारी' (1958) इत्यादि।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- गाँधीजी के शिक्षा संबंधी आदर्श क्या थे ?
[2012ए, 2013ए]
- 'पुंडलीक' जी कौन थे ?
[2009ए, 2014ए]
- 'गंगा पर पुल बनाने में अंग्रेजों ने क्यों दिलचस्पी नहीं ली ?
[2016ए]
- 'ओ सदानीरा' किस नदी के लिए कहा गया है ?
[2009ए, 2022ए]
- 'धाँगड़' शब्द का क्या अर्थ है ?
[2023ए, 2025ए]
उत्तर
गाँधीजी शिक्षा का मतलब सुसंस्कृत बनाने और निष्कलुष चरित्र निर्माण समझते थे। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आचार्य पद्धति के समर्थक थे अर्थात् बच्चे सुसंस्कृत और निष्कलुष चरित्र वाले व्यक्तियों के सान्निध्य से ज्ञान प्राप्त करें। अक्षर ज्ञान को वे इस उद्देश्य की प्राप्ति में विधेय मात्र मानते थे।
वर्तमान शिक्षा पद्धति को वे खौफनाक और हेय मानते थे क्योंकि शिक्षा का मतलब है-बौद्धिक और चारित्रिक विकास, लेकिन यह शिक्षा पद्धति उसे कुंठित
करती है। इस पद्धति में बच्चों को पुस्तक रटाया जाता है ताकि आगे चलकर वे क्लर्क का काम कर सकें, उनका सर्वांगीण विकास से कोई सरोकार नहीं है।
गाँधीजी जीविका के लिए नये साधन सीखने के इच्छुक बच्चों के लिए औद्योगिक शिक्षा के पक्षधर थे। तात्पर्य यह नहीं था कि हमारी परंपरागत व्यवसाय में खोट है वरन् यह कि हम ज्ञान प्राप्त कर उसका उपयोग अपने पेशे और जीवन को परिष्कृत करने में करें।
- पुंडलीक जी भितिहरवा आश्रम विद्यालय के शिक्षक थे। गाँधीजी ने उन्हें बेलगाँव से सन् 1917 में बुलाया था शिक्षा देने और ग्रामीणों के भय को दूर करने के लिए।
पुंडलीक जी, गाँधीजी के आदर्शों को सच्चे दिल से मानने वाले बड़े ही निर्भय पुरुष थे। पहले एक कायदा था कि साहब जब आएँ तो गृहपति उसके घोड़े की लगाम पकड़े। एक दिन एमन साहब, जो उस समय बड़े अत्याचारी थे आए तो पुंडलीकजी ने कहा, "नहीं, उसे आना है तो मेरी कक्षा में आए, मैं लगाम पकड़ने नहीं जाऊँगा।" पुंडलीकजी ने गाँधीजी से सीखी निर्भीकता गाँव वालों को दी। यही निर्भीकता चंपारण अभियान की सबसे बड़ी देन है।
- तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत निलहे गोरों के हाथ का पुतला था। उन दिनों उत्तर बिहार में दौरा करने वाले अफसरों के लिए देहात में डाकबंगले नहीं बनते थे। वे सभी साहबों की कोठियों में ठहरते थे। दक्षिण बिहार के बागी विचारों का असर चम्पारण में देर से पहुँचे। इसलिए गंगा पर पुल बनाने की स्कीम में तत्कालीन शासन ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। बरसों तक चम्पारण में गोरे निलहों का
ब्रिटिश साम्राज्य की छत्रछाया में पनपता रहा।
'ओ सदानीरा' गंडक नदी के लिए कहा गया है।
- – धाँगड़ शब्द का अर्थ ओराँब भाषा में है-भाड़े का मजदूर।
धाँगड़ एक आदिवासी जाति है, जिसे 18 वीं शताब्दी के अंत में नील की खेती के सिलसिले में दक्षिण बिहार के छोटानागपुर पठार से चंपारण के इलाके में लाया गया था। धाँगड़ जाति आदिवासी जातियों-ओराँव, मुंड़ा, लोहार इत्यादि के वंशज हैं, लेकिन ये अपने आप को आदिवासी नहीं मानते हैं। धाँगड़ मिश्रित ओराँव भाषा में बात करते हैं। धाँगड़ों का सामाजिक जीवन बेहद उल्लासपूर्ण है, स्त्री-पुरुष ढलती शाम के मंद प्रकाश में सामूहिक नृत्य करते हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- 'ओ सदानीरा' पाठ का सारांश लिखिए।
[2010ए]
- 'ओ सदानीरा' पाठ में आए नौका विहार प्रसंग का वर्णन करें।
[2012ए, 2013ए]
- चम्पारण क्षेत्र में बाढ़ आने के प्रमुख कारण क्या हैं ?
[2019ए]
- चम्पारण में शिक्षा की व्यवस्था के लिए गाँधीजी ने क्या किया ? [2020आ]
उत्तर
- जगदीशचन्द्र माथुर 'ओ सदानीरा' शीर्षक निबंध के माध्यम से गंडक नदी को निमित्त बनाकर उसके किनारे की संस्कृति और जीवन प्रवाह की अंतरंग झाँकी | पेश करते हैं जो स्वयं गंडक नदी की तरह प्रवाहित दिखलाई पड़ता है। सर्वप्रथम चंपारन क्षेत्र की प्राकृति वातावरण का वर्णन करते हुए उसकी एक-एक अंग का मनोहारी अंकन करते हैं। जैसे छायावादी कविताओं में प्रकृति का मानवीकरण देखा जा सकता है उसी तरह निबंध में भी देखा जा सकता है। एक अंश देखिए-"बिहार के उत्तर-पश्चिम कोण के चंपारण इस क्षेत्र की भूमि पुरानी भी और नवीन भी। हिमालय की तलहटी में जंगलों की गोदी से उतारकर मानव मानो शैशव-सुलभअंगों और मुस्कान वाली धरती को ठुमक ठुमककर चलना सिखा रहा है।" इसके साथ माथुर संस्कृति के गर्त में जाकर नदियों में बाढ़ आना उन्हें लगता है जैसे उन्मत यौवन वीरांगना हो जो प्रचंड नृत्य कर रही हो। उन्हें साठ-बासठ की बाढ़ 1. रामचरितमानस के क्रोधरूपी कैकयी की तरह दिखलाई पड़ती है। वे बताते हैं | नदियों में बाढ़ आना मनुष्यों के उच्छृंखलता के कारण हैं। यदि महावन जो चंपारण | से गंगा तट तक फैला हुआ था न कटता तो बाढ़ न आती। माथुर तर्क देते हैं कि | वसुंधराभोगी मानव और धर्मांधमानव एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। क्योंकि | वसुंधरा भोगी मानव अपने भोग-विलास के लिए जंगलों की कटाई कर रहा है तो | धर्मांध मानव पूजा-पाठ के सड़ी गली सामाग्री को गंगा नदी में प्रवाहित कर उसे
दूषित कर रहा है। माथुर मध्ययुगीन समाज की सच्चाई भी बताते हैं कि आक्रमण | के कारण या अपनी महत्वाकांक्षा की तृप्ति के लिए मुसलमान शासकों ने अंधाधुंध | जंगलों की कटाई की। इसी तरह यहाँ अनेक संस्कृति का परिणाम कीमियो प्रक्रिया | है। चंपारण के प्रत्येक स्थल पर प्राचीन युग से लेकर आधुनिक युग में गाँधी के। चंपारण आने तक के पूरा इतिहास को अपने लेखनी के माध्यम से अच्छे-बुरे प्रभाव को खंगालते हैं। इस परिचय के संदर्भ में कहीं भी कला संस्कृति उसकी भाषा उनकी आँखों से ओझल नहीं हो पाती।
अंत में गंडक की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि ओ सदानीर । ओ चक्र । ओ नारायणी। ओ महागंडक । युगों से दीन-हीन जनता इन विधि नामों से तुझे संबोधित करती रही है। आ तरे पूजन के लिए जिस मंदिर की प्रतिष्ठा हो रही है, उसकी नींव बहुत गाढ़ी हैं। इसे तू ठुकरा न पाएगी।
- जगदीशचन्द्र माथुर द्वारा रचित 'ओ सदानीरा' शीर्षक निबंध के माध्यम से गंडक नदी को निमित्त बनाकर उसके किनारे की संस्कृति और जीवन-प्रवाह की | अंतरंग झाँकी पेश करते हैं जो स्वयं गंडक नदी के तरह प्रवाह दिखलाई पड़ता है।।
ओ सदानीरा पाठ में आए नौका विहार प्रसंग बहुत ही मनमोहक है। गंडक | नदी में नौका विहार अनुभव लेखक को प्राप्त है। उनका कहना है कि गंडक नदी | में नौका विहार बहुत ही मनमोहक लगता है। नौका विहार होने से गंडक नदी के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। साथ ही गंडक नदी के किनारे की संस्कृति और जीवन प्रवाह के बारे में नौका विहार से विशेष अनुभव भी प्राप्त होता है।
चम्पारण क्षेत्र में बाढ़ का प्रमुख कारण जंगलों का कटना है। वन के वृक्ष जल राशि को अपनी जड़ों में थामें रहते हैं। नदियों को उन्मुक्त नवयौवना बनने से बचाते हैं। उत्ताल वृक्ष नदी की धाराओं की गति को भी संतुलित करने का काम करते हैं। यदि जलराशि नदी की सीमाओं से ज्यादा हो जाती है, तब बाढ़ आती ही हैं, लेकिन जब बीच में उनकी शक्तियों को ललकारने वाले ये गगनचुम्बी वन न हो तब नदियाँ प्रचंड कालिका रूप धारण कर लेती हैं। वृक्ष उस प्रचंडिका को रोकने वाले हैं। आज चंपारण में वृक्ष को काट कर कृषियुक्त समतल भूमि बना दी। गई है। अब उन्मुक्त नवयौवना को रोकने वाला कोई न रहा, इसलिए अपनी ताकत | का अहसास कराती है। लगता है मानो मानव के कर्मों पर अट्टाहास करने के लिए, | उसे दंड देने के लिए नदी में भयानक बाढ़ आते हैं।
चम्पारण में शिक्षा की व्यवस्था के लिए गाँधी जी ने महत्त्वपूर्ण काम किए। | उनका विचार था कि ग्रामीण बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था किए बिना केवल आर्थिक समस्याओं को सुलझाने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए उन्होंने तीन गाँवों में आश्रम विद्यालय स्थापित किया-बड़हरवा, मधुबन और भितिहरवा। कुछ निष्ठावान कार्यकर्त्ताओं को तीनों गाँवों में तैनात किया। बड़हरवा के विद्यालय में श्री बवनजी गोखले और उनकी विदुषी अवंतिकाबाई गोखले ने चलाया। मधुबन में नरहरिहास पारिख और उनकी पत्नी तथा अपने सेक्रेटरी महादेव देसाई को नियुक्त किया। भितिहरवा में वयोवृद्ध डॉक्टर देव और सोपन जी ने चलाया। बाद में पुंडलिक जी गए। स्वयं कस्तूरबा भितिहरवा आश्रम में रहीं और इन कर्मठ और विद्वान स्वयंसेवकों की देखभाल की।
परिभाषाओं पर प्रश्न और उत्तर
"वसुंधरा भोगी मानव और धर्माध मानव एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।"।
"कैसी चंपारण की यह भूमि ? मानो विस्मृति के हाथों अपनी बड़ी से बड़ी निधियों को सौंपने के लिए प्रस्तुत रहती है।"
[2020ए] |
[2021ए]
उत्तर
प्रस्तुत पंक्तियाँ जगदीशचन्द्र माथुर लिखित 'ओ सदानीरा' शीर्षक पाठ से उद्धृत हैं। इन पंक्तियों में लेखक के कहने का अभिप्राय यह है कि एक तरफ मनुष्य जंगल काटे जा रहे हैं; खेतों, पशु-पक्षियों आदि को नष्ट कर रहा है। नदियों पर बाँध बनाकर उसे नष्ट कर रहा है तो दूसरी ओर धर्मान्ध मानव गंगा को मइया कहता है पर अपने घर की नाली, कूड़ा-करकट, पूजन-सामग्री जो प्रदूषण ही फैलाते हैं, गंगा नदी में प्रवाहित करता है। इस प्रकार दोनों इस प्रकृति को नष्ट करने | में लगे हुए हैं। अतः कहा जा सकता है कि वसुंधराभोगी मानव और धर्मांध मानव एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
प्रस्तुत पंक्तियाँ जगदीशचन्द्र माथुर लिखित 'ओ सदानीरा' शीर्षक पाठ से | उद्धृत हैं। इन पंक्तियों में लेखक ने कहा कि चंपारण की यह गौरवशाली भूमि - महान है। यहाँ अनेक आक्रमणकारी तथा बाहरी व्यक्ति आए। उन्होंने या तो इस | पावन भूमि को छति पहुँचाई या आकर बस गए। किन्तु धन्य है इसकी सहनशीलता एवं उदारता। इसने इन सबको भूला दिया, क्षमा कर दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि इसने विस्मृति के हाथों अपनी बड़ी-से-बड़ी निधियों को सौंप दिया। इसने किसी प्रकार का प्रतिकार नहीं किया। स्वयं को उन आततायियों के हाथों समर्पित कर दिया। उन्हें अपनी निधियों से समृद्ध किया।
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