- सिपाही की माँ
महत्त्वपूर्ण बिंदु
'सिपाही की माँ' एकांकी के रचनाकार मोहन राकेश हैं।
इनका जन्म 8 जनवरी, 1925 ॐ को पंजाब के जंडीवाली गली, अमृतसर में हुआ था।
इनके माता-पिता का नाम बच्चन कौर एवं करमचन्द गुगलानी था।
इनका निधन 3 दिसम्बर, 1972 ई को हुआ था।
इनकी कुछ रचनाएँ इस प्रकार से हैं-
इंसान के खंडहर (1950), नए बादल (1957), जानवर और जानवर (1958), एक और जिन्दगी (1961), फौलाद का आकाश (1972), वारिस (1972),
अंडे के छिलके और अन्य एकांकी (1973)।
लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- मानक और सिपाही एक-दूसरे को क्यों मारना चाहते हैं ?
[2016ए, 2021ए]
- मानक स्वयं को वहशी और जानवर से भी बढ़कर क्यों कहता है ?
[2020ए]
- बिशनी और मुन्नी को किसकी प्रतीक्षा है ? वे डाकिये की राह क्यों देखती हैं ?
[2020ए]
- कुंती का परिचय दें।
[2021ए]
- बिशनी कौन है ? इसको किसकी प्रतीक्षा है ?
[2022ए]
उत्तर
मानक और सिपाही एक-दूसरे को मारना चाहते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में दोनों दों सेनाओं की ओर से लड़ते हैं। मानक ने हजारों दुश्मनों को मारा। मानक ने उस सिपाही को भी मारा सिपाही भी उसकी मानक की जान का दुश्मन बन गया था।
मानक का पीछा करते हुए एक आहत सिपाही आता है। वह मानक को मारना चाहता है, उसकी माता उसे रोकती है। वह सिपाही को भी मना करती है कि वह मानक को न मारे और वह मानक को भी रोकती है कि वह भी उस सिपाही को न मारे। उस पर मानक कहता है अपना दुश्मन बताकर यदि वह उसको | नहीं मारेगा तो वह उसको मार देगा। मैं उसको जरूर मारूँगा। वह आगे बढ़कर | सिपाही को धक्का देता है और वह बन्दूक उठा लेता है और गरजता है- मैं बहशी | हूँ, मैं जानवर हूँ। मैं बहशी और जानवर से भी बढ़कर हूँ। वह उसी तरह हँसता | है जैसे वह सिपाही हँस रहा था।
वह भी आहत है, सिपाही भी आहत है-दोनों एक-दूसरे के शत्रु हैं। माता दोनों को रोकती है, मानक उसका आसरा पाकर स्वयं को बहशी कह उठता है और यह उसका उन्माद ही है। उसके सिर पर शत्रुता का भूत सवार है।
बिशनी को अपने सिपाही पुत्र एवं मुन्नी को सिपाही भाई की प्रतीक्षा है। वे डाकिए की राह चिट्ठी आने को देखती है। क्योंकि उसने पिछली चिट्ठी में लिखा था वे वर्मा की लड़ाई पर जा रहे हैं। माँ और बेटी किसी अनिष्ट की शंका के कारण चिट्ठी का इंतजार करते हैं।
कुंती 'सिपाही की माँ' शीर्षक एकांकी में एक प्रमुख पात्र है। वह एक अच्छी पड़ोसन के रूप में रंगमंच पर प्रस्तुत हुई है। यद्यपि कुंती की भूमिका थोड़े | समय के लिये है। तब भी उसे थोड़े में आँका नहीं जा सकता। वह बिशनी की पुत्री | मुन्नी के विवाह के लिये चिंतित है। वह स्वयं मुन्नी के लिये वर-घर खोजने को | भी तैयार है। वह बिशनी को सांत्वना भी देती है। बिशनी के पुत्र नामक के बर्मा | से सकुशल लौटने की बात भी वह करती है। बिशनी के प्रति उसकी सहानुभूति |
| उसके शब्दों में स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वह कहती है तू इस तरह दिल क्यों हल्का | कर रही है। कुंती वर्मा के लड़कियों के प्रति थोड़ा कठोर दिखाई देती है। उनके | हाव-भाव एवं पहनावे तथा भिक्षाटन पर थोड़ा क्रुद्ध भी हो जाती है। उनका इस तरह से भिक्षा माँगना कतई अच्छा नहीं लगता है। यह कहती भी है-'हाय रे राम ! ये लड़कियाँ कि…………… 5. बिशनी एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार की महिला है। उसे अपनी मुन्नी की शादी के लिए पैसों की जरूरत है। बिशनी को अपने सिपाही पुत्र की प्रतीक्षा है। वे डाकिए की राह चिट्ठी आने को देखती है। क्योंकि उसने पिछली चिट्ठी में | लिखा था वे वर्मा की लड़ाई पर जा रहे हैं। माँ और बेटी किसी अनिष्ट की शंका | के कारण चिट्ठी का इंतजार करते हैं।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- 'सिपाही की माँ' की कथावस्तु प्रस्तुत करें। अथवा, 'सिपाही की माँ' शीर्षक एकांकी का सारांश लिखें।
[2018ए]
[2024ए]
उत्तर
- 'सिपाही की माँ' हिन्दी के लब्ध प्रतिष्ठ नाटककार श्री मोहन राकेश द्वारा लिखित एक अविस्मरणीय कृति है। नाटक काव्य का सर्वाधिक रमणीय विधा है। | एकांकी भी नाटक की भाँति रूपक है। यह दृश्य काव्य की परिधि में आता है।
'सिपाही की माँ' द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखित एक मौलिक | विचार को प्रस्तुत करने वाली एकांकी है। इस एकांकी के माध्यम से युद्ध की | विभीषिका पर प्रकाश डाला गया है। जब दो या दो से अधिक देशों के बीच युद्ध | होता है आधे व्यापक सर्वनाश होता है। युद्ध एक गंभीर समस्या है। प्राचीन काल | से अर्वाचीन काल तक युद्ध की विभीषिका में हजारों-लाखों लोग हताहत हुए हैं। | द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी के खिलाफ ब्रिटिश साम्राज्य लड़ रहे थे। भारतीय सिपाही अंग्रेजों के पक्ष से लड़ रहे थे। जापान जर्मनी के खिलाफ ब्रिटिश साम्राज्य लड़ रहे थे। जापान जर्मनी के पक्ष से लड़ रहा था। भारतीय फौज वर्मा की लड़ाई में जुझ रही थी। इस एकांकी का नायक मानक वर्मा के युद्ध में लड़ रहा था। मानक की माँ का नाम विश्नी है। वह एक वृद्ध महिला है। उसकी एक बेटी मुन्नी है। वह अपने बेटे मानक को इसलिए फौज में नौकरी में भेजी है कि जो वेतन | मिलेगा, उससे मुन्नी का विवाह करेगी। मानक की माँ विश्नी एक दयालु और उदार | स्त्री है। माँ-बेटी मानक के पत्र का इंतजार करते रहती है। गाँव में डाकिया आता | है, लेकिन मानक का पत्र नहीं आता। युद्ध के बारे में अनेक तरह की अफवाहें | फैली हुई है। मानक की माँ को सदैव यह आशंका बनी रहती है कि कहीं उसके | बेटे को कुछ हो न जाए। वह सदैव डरते रहती है। वह अपने बेटे के पल-पल के समाचार जानना चाहती है। लेकिन उसे अपने बेटे की कोई समाचार नहीं मिलता।
सिपाही की माँ विश्नी गहरी नींद में स्वप्न देखती है कि उसका बेटा घायल अवस्था में भागता हुआ घर आया है। वह माँ से लपट जाता है। उसका पीछा करता हुआ एक सिपाही की आत्मा भी आता है। दोनों एक-दूसरे से लड़ने का प्रयत्न करते हैं। मानक का पीछा करने वाला सिपाही बताता है कि मानक क्रूर है, वहशी | है, जानवर है, उसने निर्दयता से युद्ध के मैदान में सिपाहियों का वध किया है। वह | इसे नहीं छोड़ेगा। मानक की माँ कहती है कि वह दोनों को समझाती है कि वे | आपस में न लड़ें। मानक उठकर अपने शत्रु से लड़ने लगता है। दोनों एक-दूसरे के | खून के प्यासे हो जाते हैं। सिपाही की माँ चाहकर भी दोनों को नहीं रोक पाती है। | तभी उसकी नींद खुल जाती है। माँ इस डरावने सपने से घबरा जाती है। वह पुनः | दूसरे दिन अपने पुत्र के पत्र का इंतजार करती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रस्तुत एकांकी में युद्ध में लड़ने वाले सिपाही के परिजन अत्यन्त चिंतित रहते हैं। उनके प्राण उनके परिवार के लिए मूल्यवान होते हैं, लेकिन वे युद्ध में उन्मादी होते हैं। प्रत्येक फौजी दूसरे पक्ष के लोगों को देखते ही गोली मार देते हैं। जिनसे इनका कोई जान-पहचान नहीं, जिनसे कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं, उसे मौका मिलते ही खत्म कर देते हैं। युद्ध में की गयी हिंसा बहादुरी कहलाती है जो सिपाही जितने अधिक दुश्मनों को मार सके, वह उतना ही वीर कहलाता है। लेकिन मानवीयता की कसौटी युद्ध में की गयी नृशंस हत्या उचित नहीं। यही इस एकांकी का मूल विषय-वस्तु है। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन उसके परिवार और समाज के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। युद्ध में की गयी हत्या भी हिंसा है।
परिभाषाओं पर प्रश्न और उत्तर
नहीं, फौजी वहाँ लड़ने के लिए हैं, वे नहीं भाग सकते। जो फौज छोड़कर भागता है, उसे गोली मार दी जाती है।
[2010ए]
"यह भी हमारी तरह गरीब आदमी है।"
उत्तर
[2025]
- प्रस्तुत पक्तियाँ 'सिपाही की माँ' एकांकी के प्रथम दृश्य से ली गयी हैं। । इसके एकांकीकार मोहन राकेश हैं। यह इनकी अनूठी रचना है। नाटक की भाँति एकांकी के लिए भी मोहन राकेश ने रंगमंचीय सामंजस्य प्रदान किया है।
वर्मा की रिफ्यूजी लड़कियों के यह बताने पर कि वह किसी प्रकार भागकर जंगल के रास्ते हिन्दुस्तान में आयी है। यह सुनकर मुन्नी के भीतर भी उत्सुकता जगती है और वह सोचती है कि उसका भाई मानक फौज से भागकर घर क्यों नहीं आ सकते। मुन्नी की इस बात पर लड़की का यह उत्तर कि फौजी वहाँ लड़ने के लिए गये हैं, ये नहीं भाग सकते। जो फौज छोड़कर भागता है, उसे गोली मार दी जाती है।
उपर्युक्त पंक्तियों को पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि फौज में अनुशासन का बड़ा महत्त्व है। इसकी अनदेखी करनेवालों को इसके बुरे परिणाम भी भोगने होते हैं। सचमुच जीवन में हर कार्य का एक मानक होता है और उस मानक के विपरीत कार्य करने वाले कहीं से भी मान्य नहीं होते।
- प्रस्तुत पंक्तियाँ मोहन राकेश की एकांकी 'सिपाही की माँ' से ली गयी है। इस एकांकी के द्वितीय दृश्य में सिपाही मानक की माँ स्पप्न देखती है कि उसके पुत्र मानक को एक सिपाही खदेड़ता हुआ मानक के पीछे-पीछे आता है। मानक माँ के पास लिपट जाता है। परन्तु मानक संभलकर उस सिपाही से उससे बंदूक छीनकर उस पर तान देता है। मानक की माँ बिशनी जानती है कि युद्ध में जो सिपाही होते हैं वे अन्य निम्न तब कैसे मेरे पुत्र की तरह ही जाते होंगे। उसके भी बाल-बच्चे माँ-बहन होगी। वह भी कोई आकांक्षा लेकर ही सिपाही में भर्ती हुआ होगा। इसलिए अपनी स्थिति की तुलना उस सिपाही से करते हुए कहती है कि यह भी हमारी तरह गरीब आदमी है।
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