- प्रगीत और समाज
महत्त्वपूर्ण बिंदु
'प्रगीत और समाज' के रचनाकार नामवर सिंह हैं।
इनका जन्म 28 जुलाई, 1927 ई० को उत्तर प्रदेश के जीअनपुर, वाराणसी में हुआ था।
इनके माता-पिता का नाम बागेश्वरी देवी एवं नागर सिंह था।
इनकी कुछ रचनाएँ इस प्रकार से हैं-
बकलम खुद (व्यक्ति व्यंजक ललित निबंध), हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, छायावाद, पृथ्वीराज रासो की भाषा इत्यादि।
| लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- प्रगीतात्मकता का अर्थ आलोचकों की दृष्टि में क्या है ?
[2016ए]
- प्रगीत क्या है ?
[2017ए]
- नामवर सिंह किन कविताओं को श्रेष्ठ मानते हैं ?
[2018ए]
उत्तर
- सुख-दुःख की आवेशमयी अवस्था विशेष को गिने-चुने शब्दों में स्वर-साधना के उपयुक्त अभिव्यक्ति देना ही गीत है, प्रगीत है। ये आत्मपरक प्रगीत यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं।
आलोचकों की दृष्टि में सच्चे अर्थों में प्रगीतात्मकता का यही है, जिसका आधार है समाज के विरुद्ध व्यक्ति। इस प्रकार प्रगीतात्मकता का अर्थ हुआ 'एकांत संगीत' अथवा 'अकेले कंठ की पुकार'।
सुख-दुःख की आवेशमयी अवस्था विशेष को गिने-चुने शब्दों में स्वर-साधना के उपयुक्त अभिव्यक्ति देना ही गीत है, प्रगीत है। ये आत्मपरक प्रगीत यथार्थ को प्रतिध्वनित करते हैं। आज भी प्रगीत के रूप में प्रायः उसी कविता को स्वीकार किया जाता है जो नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक हो। कविता में जब प्रगीतात्मकता | सीमित हुई तो दूसरे में प्रगीतात्मकता के कुछ नए आयाम विकसित हुए। प्रगीतात्मकता का आरंभ बहीं है जहाँ कवि समाज के विरुद्ध खड़ा होता है।
नामवर सिंह जीव, जगत और प्रकृति के विविध रूप-रंगों से युक्त कविताओं को श्रेष्ठ मानते हैं। कवि की बर्हिमुखी आक्रामकता का भी कविता में दर्शन होता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
- नामवर रचित 'प्रगीत और समाज' निबंध की विवेचना करें।
[2014ए]
उत्तर
- हिन्दी के शीर्षस्थ मार्क्सवादी, आलोचकों में नामवर सिंह का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। 'प्रगीत और समाज' शीर्षक आलोचनात्मक निबंध में 6 हजार वर्षों में फैली हिन्दी काव्य परंपरा पर ऐतिहासिक अंतदृष्टि के साथ विचार करते हुए 'प्रगीत' नामक काव्य-रूप की निरंतरता का हिन्दी समाज की जातीय प्रकृति और प्रवाह की उपज में परिभाषित किया गया है।
कोई भी काव्य-रूप ऐतिहासिक-सामाजिक जरूरतों की उपज और संपूरक हुआ करता है। हिन्दी में 'प्रगीत' की सामाजिकता और ऐतिहासिकता क्या है और कैसी रही है, हमारी साहित्यिक परंपरा में उसकी अहमियत क्या है-इन बातों की पड़ताल यह निबंध अत्यन्त संयत और प्रच्छन विवेचन शैली तथा भाषा में करता है।
कवितां पर समाज का दबाव तीव्रता से महसूस किया जा रहा है।
प्रबंध काव्यों और लंबी कविताओं में ही सामाजिक यथार्थ और व्यापक जीवन का चित्रण पाया जाता है। छोटी कविताएँ और प्रगीतधर्मी कविताएँ भी नितांत वैयक्तिक और आत्मपरक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति मात्र हैं।
मुक्तिबोध ने सिर्फ लंबी कविताएँ ही नहीं लिखीं। उनकी अनेक कविताएँ | छोटी भी हैं और छोटी होने के बावजूद लंबी कविताओं से किसी कदर कम सार्थक
नहीं है। वे कविताएँ अपने रचना-विन्यास में प्रगीतधर्मी हैं। मुक्तिबोध का समूचा काव्य मूलतः आत्मपरक है-तीव्रतम रूप में। मुक्तिबोध की कविता में जीवन | यथार्थ केवल भाव बनकर प्रस्तुत होता है, या बिम्ब बनकर या विचार बनकर। आत्मपरकता अथवा भावमयता मुक्तिबोध की सीमा नहीं बल्कि शक्ति है। यह उनकी कविता को गति और ऊर्जा प्रदान करती है।
त्रिलोचन ने कुछ चरित्र केन्द्रीत लंबी वर्णनात्मक कविताओं के साथ-साथ कुछ सॉनेट और गीत लिखे हैं। ये प्रगीत हैं। जीवन, जगत और प्रकृति के जितने रंग-बिरंगे चित्र त्रिलोचन के काव्य-जगत में मिलते हैं, वे अन्यत्र दुर्लभ हैं। त्रिलोचन के एक संग्रह का नाम ही है- "उस जनपद का कवि हूँ।"
नागार्जुन की बहिर्मुखी आक्रामक काव्य प्रतिभा के बीच आत्मपरक प्रगीतात्मक अभिव्यक्ति के क्षण कम आते हैं, लेकिन जब आते हैं तो उनकी विकट तीव्रता प्रगीतों के परिचित संसार को एक झटके से छिन्न-भिन्न कर देती है। नागार्जुन के काव्य संसार के प्रगीत नायक का निष्कवच फक्कड़ व्यक्तित्व उनके प्रगीतों को | विशिष्ट रंग तो देता ही है, निश्चित सामाजिक अर्थ भी ध्वनित करता है।
तुलसी के विनय के पदों में पूरे युग की वेदना व्यक्त हुई है। उनकी चरम वैयक्तिकता ही परम सामाजिकता है।
तुलसी के अलावा कबीर, सूर, मीरा, नानक, रैदास आदि अधिकांश संतों ने प्रायः दोहे और गेय पद ही लिखे हैं। इन कवियों की गीतात्मकता और सामाजिकता रेखांकित करने योग्य है।
विद्यापति हिन्दी के प्राथमिक कवियों में परिगणित होते हैं। उनकी गीतात्मकता का ही प्रभाव संतों की सामाजिकता पर पड़ा।
आधुनिक राष्ट्रीय कविताओं में भी प्रगीतात्मकता का उन्मेष हुआ। इस रोमांटिक उत्थान में आत्मीयता और ऐंद्रियता अधिक पाई जाती है।
हुई थी। मैथिलीशरण गुप्त की असामाजिकता में ही उनकी सच्च सामाजिकता छिपी
व्यक्ति बनाम समाज के द्वन्द्व का स्थान समाज के अंतर्विरोध ने ले लिया। यह नई कविता में पाया जाता है।
शमशेर बहादुर सिंह की कविता को सिर्फ वही समझ सकता है, जो एकाकीपन में मानवता की आवाज सुन-समझ सकता हो। कविता है- 'मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल/जीवन/कण-समूह मैं हूँ केवल एक कण। 'कौन सहारा/मेरा कौन सहारा !' इस कविता में समाज का दबाव और अकेलापन भी है। इस अर्थ में यह कविता 'बच्चन' की कविता से आगे बढ़ जाती है।
प्रगतिवाद में कवि अंदर से बाहर निकलकर जनता के पास जाता है। शमशेर जी भी कभी-कभी इस रास्ते पर चलते नजर आते हैं। ऐसा होने पर कविता नितांत सामाजिक हो जाती है और प्रगीतात्मकता और कवित्व से वंचित हो जाती है। रघुवीर सहाय ने ठीक ही लिखा है- "बाहर बाहर जाते जाते। अब अपना मन खाली है।"
इसके बाद कुछ कवियों ने अंर्गुहावास किया तो कुछ ने आत्मसंघर्ष। नई कविता के अनेक कवियों ने अंतर्गुहावास का रास्ता अपनाया तो मुक्तिबोध ने आत्मसंघर्ष का, जो उन्हें प्रायः बहिः संघर्ष में भी झोंकता रहा। एक में प्रगीतात्मकता | सीमित हुई तो दूसरे में प्रगीतात्मकता के कुछ नए आयाम उद्घाटित हुए।
अभी कुछ साल पहले एक दशक ऐसा फिर आया था जब अनेक कवि | अपने अंदर का दरवाजा तोड़कर एकदम बाहर निकल आए थे और व्यवस्था के विरोध के जुनून में उन्होंने ढेर सारी 'सामाजिक' कविताएँ लिख डालीं। यह दौर जल्दी ही खत्म हो गया।
पिछले पाँच वर्षों में कविता की पुनः प्रतिष्ठा अवश्य हुई। यह नई प्रगीतात्मकता का उभार कहा जा सकता है। आज कवि को न तो अपने अंदर झाँककर देखने में संकोच है, न बाहर के यथार्थ का सामना करने में कोई हिचक। अंदर न तो किसी असंदिग्धा विश्वदृष्टि का मजबूत खूँटा गाड़ने की जिद है और न बाहर व्यवस्था का एक विराट पहाड़ के रूप में आँकने की हवस। बाहर छोटी-से-छोटी घटना, स्थिति, वस्तु आदि पर नजर है और कोशिश है उसे अर्थ देने | की। इसी प्रकार बाहर की प्रतिक्रिया स्वरूप अंदर उठने वाली छोटी-सी-छोटी लहर | को भी पकड़कर उसे शब्दों में बाँध लेने का उत्साह। एक नए स्तर पर कवि-व्यक्ति अपने और समाज के बीच के रिश्ते को साधन की कोशिश कर रहा | है और इस प्रक्रिया में जो व्यक्तित्व बनता दिखाई दे रहा है वह निश्चय ही एक
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नए ढंग की प्रगीतात्मकंता के उभार का संकेत है। मितकथन में अंतिकथन से अधिक शक्ति होती है और ठंडे स्वर की तासीर भी कभी-कभी काफी गरम होती है। केदारनाथ सिंह ने लिखा है-" उसका हाथ / अपने हाथ में लते हुए मैंने सोचा / दुनिया का / हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए।"
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