2. उसने कहा था (कहानी)

चंद्रधर शर्मा गुलेरी
- जन्म : 7 जुलाई, 1883 ।
- निधन : 12 सितंबर, 1922।
- जन्म-स्थान : जयपुर, राजस्थान ।
- मूल निवास : 'गुलेर' नामक ग्राम, जिला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश ।
- पिता : पं० शिवराम ।
- शिक्षा : बचपन में संस्कृत की शिक्षा, 1899 में इलाहाबाद तथा कोलकाता विश्वविद्यालयों से क्रमशः एंट्रेंस तथा मैट्रिक, 1901 में कोलकाता विश्वविद्यालय से इंटरमीडिएट, 1903 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी० ए० ।
- वृत्ति : 1904 में जयपुर दरबार की ओर से खेतड़ी के नाबालिग राजा जयसिंह के अभिभावक बनकर मेयो कॉलेज, अजमेर में आ गए। जयपुर भवन छात्रावास के अधीक्षक । 1916 में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष । अंतिम दिनों में मदन मोहन मालवीय के निमंत्रण पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्राच्य विभाग के कार्यवाहक प्राचार्य तथा मनींद्र चंद्र नंदी पीठ के प्रोफेसर ।
- संपादन : आलोचक, काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका।
- रचनाएँ : कहानियाँ : सुखमय जीवन (1911), बुद्ध का काँटा (1911) और उसने कहा था (1915)। प्राच्यविद्या, इतिहास, पुरातत्त्व, भाषा विज्ञान और समसामयिक विषयों पर निबंध लेखन । कछुआ धरम, मारेसि मोहिं कुठाँव, पुरानी हिंदी, भारतवर्ष, डिंगल, संस्कृत की टिपरारी, देवानां प्रिय आदि प्रमुख निबंध । इनके अतिरिक्त अनुवादों की बाढ़, खोज की खाज, क्रियाहीन हिंदी, वैदिक भाषा में प्राकृतपन आदि टिप्पणियाँ भी प्रकाशित । अंग्रेजी में 'ए पोयम बाय भास, ए कमेंटरी ऑन वात्सयायंस कामसूत्र, दि लिटरेरी क्रिटिसिज्म आदि निबंध । देशप्रेम को लेकर कुछ कविताएँ भी लिखीं ।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी बीसवीं शती के प्रथम चरण में हिंदी गद्य साहित्य के एक प्रमुख लेखक थे । वे अपने समय में हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी आदि भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे । प्राकृत, अपभ्रंश आदि भाषाओं में भी उनकी गहरी गति थी । पुरातत्त्व, इतिहास, भाषाशास्त्र आदि विषयों का उनका ज्ञान अपने समय में अद्यतन और तलस्पर्शी माना जाता था । साहित्य के अतिरिक्त अपनी अभिरुचि के अन्य विषयों पर उन्होंने हिंदी में निबंध, लेख, टिप्पणियाँ बराबर लिखीं । वे द्विवेदी युग के एक प्रमुख निबंधकार और बहुमान्य विद्वान थे । गूढ़ और विदग्ध हास-परिहास तथा व्यंग्य से परिपूर्ण अपनी कलात्मक भाषा-शैली को देखते हुए वे अपने समय से बहुत आगे दिखाई पड़ते हैं। वस्तुतः वे अपने युग के अत्यंत प्रतिभाशाली और समर्थ लेखक थे ।
गुलेरी जी ने कुल तीन ही कहानियाँ लिखीं और उन्हीं के बल पर कहानीकार के रूप में हिंदी में अमर हो गए । उनकी कहानियाँ विषयवस्तु, भाषा-शैली और शिल्प के कारण अपने समय से बहुत आगे की रचनाएँ प्रतीत होती हैं और हिंदी कहानी के विकास में इनका प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभाव पड़ा है। संस्कृत का इतना बड़ा पंडित और शास्त्र निष्णात, गंभीर प्रकृति का विद्वान ऐसी सर्जनात्मक भाषा-शैली में, कल्पना और यथार्थ के ऐसे संतुलित संधान के साथ, आधुनिक कथ्यों वाली ये कहानियाँ लिख सका; यह सचमुच चमत्कृत कर देने वाली, आश्चर्य से भर देने वाली रचनात्मक घटना है। ये कहानियाँ अपनी भाषा-शैली और शिल्प को लेकर आज भी उतनी ही तरोताजा और रचनात्मक कौतुक-सरीखी प्रतीत होती हैं । कौतुक का अभिप्राय कतई यह नहीं कि इनकी विषयवस्तु या कथ्य कम महत्त्वपूर्ण अथवा अगंभीर हैं । सचाई इसके विपरीत है । इनकी विषयवस्तु और कथ्य अधिक गंभीर, महत्त्वपूर्ण तथा समय से आगे के हैं।
यहाँ प्रस्तुत कहानी 'उसने कहा था' उनकी अमर रचना है। यह हिंदी कहानी के विकास में 'मील का पत्थर' मानी जाती है । यह एक कालजयी रचना है। प्रसिद्ध फिल्मकार विमल राय ने इस कहानी पर फिल्म भी बनाई थी और इसके अनेक नाट्य रूपांतर हो चुके हैं । शुद्ध प्रेम की आध्यात्मिक अनुभूति और उसकी स्वाभाविक उत्सर्गमय अभिव्यक्ति इस कहानी का कथ्य है। कहानी अमृतसर के भीड़ भरे बाजार में शुरू होती है जहाँ बारह वर्ष का लड़का (लहना सिंह) आठ वर्ष की एक लड़की को ताँगे के नीचे आने से बचाता है । लड़का लड़की को यह पूछते हुए छेड़ता है : "तेरी कुड़माई (मँगनी) हो गई ?' लड़की 'धत्' कहकर भाग जाती है। एक दिन वह 'धत्' कहकर भागने की बजाय कहती है "हाँ, कल हो गई। देखते नहीं, यह रेशम के फूलों वाला सालू ?" लहना सिंह हतप्रभरह जाता है । इसके बाद लहना सिंह से भेंट प्रथम विश्वयुद्ध के मोर्चे पर होती है। वह याद करता है कि छुट्टी के बाद घर से लाम पर जाते समय वह सूबेदार हजारा सिंह के घर गया था । वहाँ सूबेदारनी ने उसे एकांत में बुलाकर कहा था कि मेरे पति और बेटे (बोधा) का ख्याल रखना । यह सूबेदारनी बचपन में अमृतसर में मिली वही लड़की थी । लहना सिंह सूबेदारनी के प्यार की उस किरण को दुनिया से बचाकर अपने हृदय में सँजोए रहा और युद्ध में अपने प्राणों की बलि देकर भी हजारा सिंह और बोधा की रक्षा की। कहानी की घटनाओं में स्वाभाविक नाटकीयता है जो मन पर अपने उत्कर्ष की ओर संचरण करती हुई गतिशीलता के कारण जबर्दस्त असर डालती है । इस तरह प्रभावान्विति जो कहानी का प्राण मानी जाती है, उसका अद्भुत रचाव है । वातावरण की सृष्टि करने में लेखक को अपूर्व सफलता प्राप्त हुई । आरंभ से ही एक कुतूहल पाठक को अपने प्रभाव में बाँध लेता है और कहानी को उत्कर्ष बिंदु पर पहुँचाकर ही विराम लेता है । किंतु तब कहानी का प्रभाव मन में गूंजता रह जाता है ।
उसने कहा था में पक्के यथार्थवाद के बीच, सुरुचि की चरम मर्यादा के भीतर, भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यंत निपुणता के साथ संपुटित है। घटना इसकी ऐसी है जैसी बराबर हुआ करती है, पर उसमें भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय स्वरूप झाँक रहा है- केवल झाँक रहा है। निर्लज्जता के साथ पुकार या कराह नहीं रहा है। कहानी भर में कहीं प्रेमी की निर्लज्जता, प्रगल्भता, वेदना की वीभत्स विवृति नहीं है। सुरुचि के सुकुमार स्वरूप पर कहीं आघात नहीं पहुँचता । इसकी घटनाएँ ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं ।
- रामचंद्र शुक्ल
उसने कहा था
बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ीवालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बंबूकार्टवालों की बोली का मरहम लगावें । जब बड़े-बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्केवाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट संबंध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अँगुलियों के पोरों को चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरीवाले तंग चक्करदार गलियों में, हर एक लड्ढीवाले के लिए ठहरकर सब्र का समुद्र उमड़ाकर 'बचो खालसाजी' 'हटो भाईजी' 'ठहरना भाई' 'आने दो लालाजी' 'हटो बाछा' करते हुए सफेद फेटों, खच्चरों और बतकों, गन्ने और खोमचे और भारेवालों के जंगल में राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े । यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती ही नहीं; चलती है, पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती है । यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं - 'हट जा, जीणे जोगिए; हट जा, करमा वालिए; हट जा, पुत्ताँ प्यारिए; बच जा, लंबी वालिए ।' समष्टि में इसका अर्थ है कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रों को प्यारी है, लंबी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहियों के नीचे आना चाहती है ? - बच जा ।
ऐसे बंबूकार्टवालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दूकान पर आ मिले । उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं । वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और यह रसोई के लिए बड़ियाँ । दूकानदार एक परदेशी से गुथ रहा था, जो सेर भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था ।
"तेरे घर कहाँ है ?"
"मगरे में - और तेरे !"
"माँझे में; यहाँ कहाँ रहती है ?"
"अतरसिंह की बैठक में, वे मेरे मामा होते हैं ।".
"मैं भी मामा के यहाँ हूँ, उनका घर गुरुबाजार में है ।"
इतने में दूकानदार निबटा और इनका सौदे देने लगा । सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले । कुछ दूर जाकर लड़के ने मुसकुराकर पूछा –
"तेरी कुड़माई हो गई ?" इस पर लड़की कुछ आँखें चढ़ाकर 'धत्' कहकर दौड़ गई और लड़का मुँह देखता रह गया ।
दूसरे-तीसरे दिन सब्जीवाले के यहाँ, दूधवाले के यहाँ, अकस्मात् दोनों मिल जाते । महीना भर यही हाल रहा । दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा, "तेरी कुड़माई हो गई ?" और उत्तर में वही 'धत्' मिला । एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तब लड़की, लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली - "हाँ हो गई ।"
"कब ?"
"कल - देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू !" लड़की भाग गई । लड़के ने घर की राह ली । रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छाबड़ीवाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते को पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उड़ेल दिया । सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकराकर अंधे की उपाधि पाई । तब कहीं घर पहुँचा ।
(2)
"राम राम, यह भी कोई लड़ाई है ! दिन-रात खंदकों में बैठे हड्डियाँ अकड़ गईं । लुधियाने से दस गुना जाड़ा, और मेंह और बरफ ऊपर से । पिंडलियों तक कीच में धँसे हुए हैं । गनीम कहीं दिखता ही नहीं-घंटे दो घंटे में कान के परदे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खंदक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ती है ! इस गैबी गोले से बचे तो कोई लड़े । नगरकोट का जलजला सुना था, यहाँ दिन में पचीस जलजले होते हैं । जो कहीं खंदक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई तो चटाक से गोली लगती है । न मालूम बेईमान मिट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं ।"
"लहनासिंह, और तीन दिन हैं । चार तो खंदक में बिता ही दिए । परसों 'रिलीफ' आ जाएगी और फिर सात दिन की छुट्टी । अपने हाथों झटका करेंगे और पेट भर खाकर सो रहेंगे । उसी फिरंगी मेम के बाग में-मखमल की सी हरी घास है । फल और दूध की वर्षा कर देती है । लाख कहते हैं, दाम नहीं लेती । कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आए हो ।"
"चार दिन तक पलक नहीं झेंपी । बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही । मुझे तो संगीन चढ़ाकर मार्च का हुक्म मिल जाए फिर सात जर्मनों को अकेला मारकर न लौटूं तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो । पाजी कहीं के, कलों के घोड़े संगीन देखते ही मुँह फाड़ देते हैं और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अँधेरे में तीस-तीस मन का गोला फेंकते हैं । उस दिन धावा किया था-चार मील तक एक जर्मन नहीं छोड़ा था ! पीछे जनरल ने हट आने का कमान दिया, नहीं तो-"
"नहीं तो सीधे बर्लिन पहुँच जाते ! क्यों ?" सूबेदार हजारासिंह ने मुसकुराकर कहा, "लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाए नहीं चलते । बड़े अफसर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है । एक तरफ बढ़ गए तो क्या होगा ?"
"सूबेदारजी, सच है," लहनासिंह बोला, "पर करें क्या ? हड्डियों में तो जाड़ा धँस गया है । सूर्य निकलता नहीं और खाई में दोनों तरफ से चंबे की बावलियों के-से सोते झड़ रहे हैं। एक धावा हो जाए तो गरमी आ जाए ।"
"उदमी, उठ, सिगड़ी में कोले डाल । वजीरा, तुम चार जन बाल्टियाँ लेकर खाई का पानी बाहर फेंको । महासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाजे का पहरा बदल दे।" यह कहते हुए सूबेदार सारी खंदक में चक्कर लगाने लगे ।
वजीरासिंह पलटन का विदूषक था । बाल्टी में गँदला पानी लेकर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला-"मैं पाधा बन गया हूँ। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण !" इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गए ।
लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी भर उसके हाथ में देकर कहा- "अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो । ऐसा खाद-पानी पंजाब भर में नहीं मिलेगा !"
"हाँ, देश क्या है, स्वर्ग है ! मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस घुमा जमीन यहाँ माँग लूँगा और फलों के बूटे लगाऊँगा ।"
"लाड़ीहोराँ को भी यहाँ बुला लोगे ? या वही दूध पिलानेवाली फिरंगी मेम -"
"चुप कर । यहाँ वालों को शरम नहीं ।"
"देस-देस की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तमाकू नहीं पीते । वह सिगरेट देने में हठ करती है, ओठों में लगाना चाहती है, और मैं पीछे हटता हूँ तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिए लड़ेगा नहीं ।"
"अच्छा अब बोधासिंह कैसा है ?"
"अच्छा है ।"
"जैसे मैं जानता ही न होऊँ । रात भर तुम अपने दोनों कंबल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुजर करते हो ! उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो । अपने सूखे लकड़ी के तख्तों पर उसे सुलाते हो और आप कीचड़ में पड़े रहते हो । कहीं तुम न माँदे पड़ जाना । जाड़ा क्या है, मौत है और 'निमोनिया' से मरनेवालों को मुरब्बे नहीं मिला करते ।"
"मेरा डर मत करो । मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूँगा । भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाए हुए आँगन के आम के पेड़ की छाया होगी ।"
वजीरासिंह ने त्यौरी चढ़ाकर कहा- "क्या मरने-मरने की लगाई है ! मरे जर्मनी और तुरक ! हाँ भाइयो, कुछ गाओ । हाँ कैसे –
"दिल्ली शहर ते पिशौर नूँ जाँदिए,
कर लेणा लौगाँ दा व्यौपार मंडिएच
कर लेणा नाड़ेदा सौदा अड़िए –
(ओय) लाणा चटाका कदुए नूँ।
कद्दू वण्याए मजेदार गोरिए,
हुण लागा चटाका कदुए नूँ।।"
('ऐ दिल्ली शहर से पेशावर को जाने वाली ! मंडी में लौंगों का व्यापार कर लेना । अरी ! नाड़े भी कर लेना । ओय अब हमें कदू चखना है । ऐ गोरे वर्णवाली ! कदू अत्यंत स्वादिष्ट पका है ! अब हमें कद्दू चखना है ।)
कौन जानता था कि दाढ़ियों वाले, घरबारी सिख ऐसा लुच्चे का गीत गाएँगे, पर सारी खंदक गीत से गूंज उठी और सिपाही फिर ताजे हो गए, मानो चार दिन से सोते और मौज ही करते रहे हों ।
(3)
दो पहर रात गई है । अँधेरा है । सन्नाटा हुआ है । बोधासिंह खाली बिस्किटों के तीन टिनों पर अपने दोनों कंबल बिछाकर लहनासिंह के दो कंबल और एक बरानकोट ओढ़ कर सो रहा है । लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आँख खाई के मुँह पर है और एक बोधासिंह के दुबले शरीर पर । बोधासिंह कराहा ।
"क्यों बोधा भाई, क्या है ?"
"पानी पिला दो ।"
लहनासिंह ने कटोरा उसके मुँह से लगाकर पूछा- "कहो, कैसे हो ?" पानी पीकर बोधा बोला- "कँपनी छूट रही है। रेम-रोम में तार दौड़ रहे हैं । दाँत बज रहे हैं ।"
"अच्छा, मेरी जरसी पहन लो ।"
"और तुम ?"
"मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है । पसीना आ रहा है ।"
"ना, मैं नहीं पहनता; चार दिन से तुम मेरे लिए-"
"हाँ, याद आई । मेरे पास दूसरी गरम जरसी है । आज सबेरे ही आई है । विलायत से मेमें बुन-बुनकर भेज रही हैं। गुरु उनका भला करें ।" यों कहकर लहना अपना कोट उतारकर जरसी उतारने लगा ।
"सच कहते हो ?"
"और नहीं झूठ ?" यों कहकर नाही करते बोधा को उसने जबरदस्ती जरसी पहना दी और आप खाकी कोट जीन का कुरता भर पहनकर पहरे पर आ खड़ा हुआ । मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी ।
आधा घंटा बीता । इतने में खाई के मुँह से आवाज आई "सूबेदार हजारासिंह !"
"कौन लपटन साहब ? हुकुम हुजूर," कहकर सूबेदार तनकर फौजी सलाम करके सामने हुआ ।
"देखो, इसी दम धावा करना होगा । मील भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई है।
उसमें पचास से जियादह जर्मन नहीं हैं । इन पेड़ों के नीचे-नीचे दो खेत काटकर रास्ता है । तीन-चार घुमाव हैं । जहाँ मोड़ है वहाँ पंद्रह जवान खड़े कर आया हूँ । तुम यहाँ दस आदमी छोड़कर सब को साथ ले उनसे जा मिलो । खंदक छीनकर वहीं, जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे रहो । हम यहाँ रहेगा ।"
"जो हुक्म ।"
चुपचाप सब तैयार हो गए । बोधा भी कंबल उतारकर चलने लगा । तब लहनासिंह ने उसे रोका । लहनासिंह आगे हुआ, तो बोधा के बाप सूबेदार ने उँगली से बोधा की ओर इशारा किया । लहनासिंह समझकर चुप हो गया । पीछे दस आदमी कौन रहें, इस पर बड़ी हुज्जत हुई । कोई रहना न चाहता था । समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया । लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुँह फेरकर खड़े हो गए और जेब से सिगरेट निकालकर सुलगाने लगे । दस मिनट बाद उन्होंने लहना की ओर हाथ बढ़ाकर कहा-
"लो तुम भी पियो ।"
आँख मारते-मारते लहनासिंह सब समझ गया । मुँह का भाव छिपाकर बोला- "लाओ, साहब ।" हाथ आगे करते ही उसने सिगड़ी के उजाले में साहब का मुँह देखा । बाल देखे । तब उसका माथा ठनका । लपटन साहब के पट्टियोंवाले बाल एक दिन में कहाँ उड़ गए और उनकी जगह कैदियों के-से कटे हुए बाल कहाँ से आ गए ?
शायद साहब शराब पिए हुए हैं और उन्हें बाल कटाने का मौका मिल गया है ! लहनासिंह ने जाँचना चाहा । लपटन साहब पाँच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में थे ।
'क्यों साहब, हमलोग हिंदुस्तान कब जाएँगे ?"
"लड़ाई खत्म होने पर । क्यों, क्या यह देश पसंद नहीं ?"
"नहीं साहब, शिकार के वे मजे यहाँ कहाँ ? याद है, पारसाल नकली लड़ाई के पीछे हम-आप जगाधरी जिले में शिकार करने गए थे ।… हाँ, हाँ-वहीं जब आप खोते पर सवार थे और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मंदिर में जल चढ़ाने को रह गया था । … बेशक, पाजी कहीं का । …सामने से वह नीलगाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी न देखी थी । और आपकी एक गोली कंधे में लगी और पुट्ठे में निकली । ऐसे अफसर के साथ शिकार खेलने में मजा है। क्यों साहब, शिमले से तैयार होकर उस नीलगाय का सिर आ गया था न ? आपने कहा था कि रेजिमेंट की मैस में लगाएँगे ।
"हाँ, पर मैंने वह विलायत भेज दिया ।"
"ऐसे बड़े-बड़े सींग ! दो-दो फुट के तो होंगे !"
"हाँ, लहनासिंह, दो फुट चार इंच के थे । तुमने सिगरेट नहीं पिया ?"
'पीता हूँ साहब, दियासलाई ले आता हूँ।' कहकर लहनासिंह खंदक में घुसा । अब उसे संदेह नहीं रहा था और उसने झटपट निश्चय कर लिया कि क्या करना चाहिए ।
अँधेरे में किसी सोने वाले से वह टकराया ।
"कौन ? वजीरासिंह ?"
"हाँ, क्यों लहना ? क्या कयामत आ गई ? जरा तो आँख लगने दी होती ?"
(4)
"होश में आओ । कयामत आई है और लपटन साहब की वर्दी पहनकर आई है।"
"क्या ?"
लपटन साहब या तो मारे गए हैं या कैद हो गए हैं। उनकी वर्दी पहनकर यह कोई जर्मन आया है । सूबेदार ने इसका मुँह नहीं देखा । मैंने देखा और बातें की हैं । सौहरा साफ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू । और मुझे पीने को सिगरेट दिया है ।"
"तो अब ?"
"अब मारे गए । धोखा है । सूबेदार कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा। उधर उन पर खुले में धावा होगा । उठो, एक काम करो । पलटन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ । अभी बहुत दूर न गए होंगे । सूबेदार से कहो कि एकदम लौट आएँ ! खंदक की बात झूठ है । चले जाओ, खंदक के पीछे से निकल जाओ । पत्ता तक न खड़के । देर मत करो ।"
"हुकुम तो यह है कि यहीं-"
"ऐसी-तैसी हुकुम की ! मेरा हुकुम जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफसर है, उसका हुकुम है । मैं लपटन साहब की खबर लेता हूँ ।"
"पर यहाँ तो तुम आठ ही हो !"
"आठ नहीं, दस लाख । एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है ! चले जाओ ।"
लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया । उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले । तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार सा बाँध दिया । तार के आगे सूत की एक गुत्थी थी जिसे सिगड़ी के पास रखा । बाहर की तरफ कर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी पर रखने…
बिजली की तरह दोनों हाथों से उलटी बंदूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तानकर दे मारा । धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी । लहनासिंह ने एक कुंदा साहब की गर्दन पर मारा और साहब आँख ! मीन गौट्ट (ओ ! माइ गॉड) कहते हुए चित हो गए । लहनासिंह ने तीनों गोले बीनकर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीट कर सिगड़ी के पास लिटाया । जेबों की तलाशी ली । तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकाल कर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया ।
साहब की मूर्च्छा हटी । लहनासिंह हँसकर बोला - "क्यों लपटन साहब ! मिजाज कैसा है ? आज मैंने बहुत बातें सीखीं । यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं । यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नील गायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियों पर जल चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं । पर यह तो कहो, ऐसी साफ उर्दू कहाँ से सीख आए ? हमारे लपटन साहब तो बिना 'डैम' के पाँच लफ्ज भी नहीं बोला करते थे ।"
लहना ने पतलून की जेबों की तलाशी नहीं ली थी । साहब ने मानो जाड़े से बचाने के लिए दोनों हाथ जेबों में डाले ।
लहनासिंह कहता गया "चालाक तो बड़े हो, पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है । उसे चकमा देने के लिए चार आँखें चाहिए । तीन महीने हुए, एक तुरकी मौलवी मेरे गाँव में आया था । औरतों को बच्चे होने की ताबीज बाँटता था और बच्चों को दवाई देता था । चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था जर्मनीवाले बड़े पंडित हैं । वेद पढ़-पढ़कर उसमें से विमान चलाने की विद्या जान गए हैं। गौ को नहीं मारते । हिंदुस्तान में आ जाएँगे तो गौ-हत्या बंद कर देंगे । मंडी के बनियों को बहकाता था कि डाकखाने से रुपए निकाल लो, सरकार का राज्य जाने वाला है । डाक बाबू पोल्हूराम भी डर गया था । मैंने मुल्लाजी की दाढ़ी मूँड़ दी थी और गाँव से बाहर निकालकर कहा था जो मेरे गाँव में अब पैर रखा तो-"
साहब की जेब में से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ में गोली लगी । इधर लहना की हैनरी-मार्टिनी के दो फायरों ने साहब की कपाल क्रिया कर दी । धड़ाका सुनकर सब दौड़ आए ।
बोधा चिल्लाया- "क्या है ?"
लहनासिंह ने उसे तो यह कहकर सुला दिया कि "एक हड़का हुआ कुत्ता आया था, मार दिया" और औरों से सब हाल कह दिया । सब बंदूकें लेकर तैयार हो गए । लहना ने साफा फाड़कर घाव की दोनों तरफ पट्टियाँ कसकर बाँधी । घाव मांस में ही था । पट्टियों के कसने से लहू निकलना बंद हो गया ।
उतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े । सिखों की बंदूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका । दूसरे को रोका । पर यहाँ थे आठ (लहना सिंह तक-तककर मार रहा था-वह खड़ा था, और लेटे हुए थे) और वे सत्तर । अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुसे आते थे । थोड़े से मिनटों में वे…
अचानक आवाज आई- 'वाह गुरुजी की फतह ! वाह गुरुजी का खालसा !' और धड़ाधड़ बंदूकों के फायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे । ऐन मौके पर जर्मन दो चक्की के पाटों के बीच में आ गए । पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे । और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे । पास आने पर पीछेवालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया ।
एक किलकारी और "अकाल सिक्खाँ दी फौज आई । वाह गुरुजी दी फतह ! वाह गुरुजी दा खालसा !! सत् सिरी अकाल पुरुष !!!" और लड़ाई खतम हो गई । तिरसठ जर्मन या तो खेत रहे या कराह रहे थे । सिखों में पंद्रह के प्राण गए । सूबेदार के दाहिने कंधे में से गोली आर-पार निकल गई । लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी । उसने घाव को खंदक की गीली मिट्टी से पूर लिया और बाकी का साफा कसकर कमरबंद की तरह लपेट लिया । किसी को खबर न हुई कि लहना के दूसरा घाव-भारी घाव लगा है।
लड़ाई के समय चाँद निकल आया था । ऐसा चाँद, जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियों का दिया हुआ 'क्षयी' नाम सार्थक होता है । और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा में
'दंतवीणोपदेशाचार्य' कहलाती । वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन भर फ्राँस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था । सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर, उसकी तुरंत-बुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते ।
इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाईवालों ने सुन ली थी । उन्होंने पीछे से टेलीफोन कर दिया था । वहाँ से झटपट दो डॉक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चलीं, जो कोई डेढ़ घंटे के अंदर आ पहुँचीं । फील्ड अस्पताल नजदीक था । सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएँगे, इसलिए मामूली पट्टी बाँधकर एक गाड़ी में घायल लिटाए गए और दूसरी में लाशें रखी गईं । सूबेदार ने लहनासिंह की जाँघ में पट्टी बँधवानी चाही । पर उसने यह कहकर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सबेरे देखा जाएगा । बोधासिंह ज्वर में बर्रा रहा था । वह गाड़ी में लिटाया गया । लहना को छोड़कर सूबेदार जाते नहीं थे । यह देख लहना ने कहा- "तुम्हें बोधा की कसम है और सूबेदारनी की सौगंध जो इस गाड़ी में न चले जाओ ।"
"और तुम ?"
"मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना । और जर्मन मुरदों के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होंगी । मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं मैं खड़ा हूँ ? वजीरासिंह मेरे पास है ही ।"
"अच्छा पर…"
"बोधा गाड़ी पर लेट गया ? भला । आप भी चढ़ जाओ । सुनिए तो, सूबेदारनी होराँ को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना । और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझसे जो उन्होंने कहा था, वह मैंने कर दिया ।"
गाड़ियाँ चल पड़ी थीं । सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा- "तूने मेरे और बोधा के प्राण बचाए हैं । लिखना कैसा ? साथ ही घर चलेंगे । अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना । उसने क्या कहा था ?"
"अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ । मैंने जो कहा है वह लिख देना और कह भी देना ।"
गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया । "वजीरा पानी पिला दे और मेरा कमरबंद खोल दे । तर हो रहा है ।
(5)
मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है । जन्म भर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं । सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं, समय की धुंध बिलकुल उन पर से हट जाती है !
लहनासिंह बारह वर्ष का है । अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है । दहीवाले के यहाँ सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है । जब वह पूछता है तेरी कुड़माई हो गई ? तब 'धत्' कहकर वह भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा- "हाँ, कल हो गई, देखते नहीं, यह रेशम के फूलोंवाला सालू ?" सुनते ही लहनासिंह को दुख हुआ । क्रोध हुआ । क्यों हुआ ?
"वजीरासिंह, पानी पिला दे ।"
पच्चीस वर्ष बीत गए । अब लहनासिंह नं० 77 राइफल्स में जमादार हो गया है । उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा । न मालूम वह कभी मिली थी या नहीं। सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकदमें की पैरवी करने वह अपने घर गया । वहाँ रेजिमेंट के अफसर की चिट्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है । फौरन चले आओ । साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं, लौटते समय हमारे घर होते जाना । साथ चलेंगे । सूबेदार का गाँव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था । लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा ।
जब चलने लगे तब सूबेदार बेड़े में से निकलकर आया । बोला- "लहना, सूबेदारनी तुमको जानती है । बुलाती है । जा मिल आ ।" लहनासिंह भीतर पहुँचा । सूबेदारनी मुझे जानती है ? कब से ? रेजिमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं । दरवाजे पर जाकर 'मत्था टेकना' कहा । असीस सुनी । लहनासिंह चुप ।
"मुझे पहचाना ?"
"नहीं"
"तेरी कुड़माई हो गई ? 'धत्'- कंल हो गई-देखते नहीं रेशमी बूटोंवाला सालू-अमृतसर में-"
भावों की टकराहट से मूर्च्छा खुली । करवट बदली । पसली का घाव बह निकला ।
"वजीरा पानी पिला !" - उसने कहा था ।
स्वप्न चल रहा है । सूबेदारनी कह रही है- "मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया । एक काम कहती हूँ । मेरे तो भाग फूट गए । सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में जमीन दी है, आज नमकहलाली का मौका आया है । पर सरकार ने हम तीमियों की घघरिया पलटन क्यों न बना दी, जो मैं भी सूबेदारजी के साथ चली जाती ? एक बेटा है। फौज में भरती हुए उसे एक ही वर्ष हुआ । उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नहीं जिया ।" सूबेदारनी रोने लगी- "अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग ! तुम्हें याद है एक दिन टाँगेवाले का घोड़ा दहीवाले की दूकान के पास बिगड़ गया था । तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाए थे । आप घोड़े की लातों में चले गए थे और मुझे उठाकर दूकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था । ऐसे ही इन दोनों को बचाना । यह मेरी भिक्षा है । तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ ।"
रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गई । लहना भी आँसू पोछता हुआ बाहर आया ।
"वजीरासिंह पानी पिला !" उसने कहा था ।
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लहना का सिर अपनी गोद में रखे वजीरासिंह बैठा है । जब माँगता है, तब पानी पिला देता है।
आध घंटे तक लहना चुप रहा, फिर बोला-
"कौन कीरत सिंह ?"
वजीरा ने कुछ समझकर कहा- "हाँ ।"
"भईया, मुझे और ऊँचा कर ले । अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले ।"
वजीरा ने वैसा ही किया।
"हाँ, अब ठीक है । पानी पिला दे । बस, अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा । चाचा-भतीजा दोनों यहीं बैठ कर आम खाना । जितना बड़ा तेरा भतीजा है उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था उसी महीने मैंने इसे लगाया था ।"
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कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा-
फ्राँस और बेल्जियम-68वीं सूची-मैदान में घावों से मरा-नं० 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह ।
🎖️ पाठ का महा-सारांश: 'उसने कहा था' (लेखक: चंद्रधर शर्मा गुलेरी)
👤 लेखक परिचय: चंद्रधर शर्मा गुलेरी (1883 - 1922)
- अमर कहानीकार: गुलेरी जी ने जीवन में केवल तीन कहानियाँ लिखीं ('सुखमय जीवन', 'बुद्ध का काँटा' और 'उसने कहा था')। केवल इन्हीं के बल पर वे हिंदी साहित्य में हमेशा के लिए अमर हो गए।
- मील का पत्थर: 'उसने कहा था' (1915) को हिंदी कहानी के विकास में 'मील का पत्थर' और एक कालजयी रचना माना जाता है। प्रसिद्ध फिल्मकार विमल राय ने इस पर फिल्म भी बनाई थी।
🚀 कहानी का जादुई घटनाक्रम (Story Highlights)
1. 🍭 अमृतसर का बाजार और बचपन का निष्कपट प्रेम
- कहानी अमृतसर के भीड़भाड़ वाले बाजार से शुरू होती है, जहाँ एक 12 वर्ष का लड़का (लहना सिंह) और एक 8 वर्ष की लड़की दुकान पर मिलते हैं।
- लहना सिंह उस लड़की को एक ताँगे के नीचे आने से बचाता है। वह रोज़ लड़की को चिढ़ाने के लिए पूछता है—"तेरी कुड़माई (मँगनी) हो गई?" और लड़की 'धत्' कहकर भाग जाती है।
- एक दिन लड़की अचानक कहती है—"हाँ, कल हो गई। देखते नहीं, यह रेशम के फूलों वाला सालू (दुपट्टा)?" यह सुनकर लहना सिंह का दिल टूट जाता है।
2. 🪖 25 साल बाद: प्रथम विश्वयुद्ध का मोर्चा
- समय बीतता है और लहना सिंह ब्रिटिश सेना की नंबर 77 सिख राइफल्स में जमादार बन जाता है। वह प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान फ्रांस के मोर्चे पर जर्मन सेना के खिलाफ लड़ रहा है।
- मोर्चे पर भयंकर ठंड, कीचड़ और बर्फबारी है। लहना सिंह वहाँ अपने साथी सैनिक बोधा सिंह (जो बीमार है) को ठंड से बचाने के लिए अपने कंबल और जरसी तक दे देता है और खुद खाकी कोट में पहरा देता है।
3. 🎯 लहना सिंह की सूझबूझ और वीरता
- एक रात जर्मन जासूस लपटन साहब का भेष बदलकर सिखों की खंदक (खाई) में बम लगाने आता है और सूबेदार हजारा सिंह को गलत हुक्म देकर फौज के साथ बाहर भेज देता है।
- लहना सिंह अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से उस नकली लपटन साहब को पहचान लेता है और बंदूक के कुंदे से मारकर उसे ढेर कर देता है।
- तभी 70 जर्मन सैनिक खंदक पर हमला कर देते हैं। लहना सिंह और उसके केवल 8 साथी डटकर मुकाबला करते हैं और ऐन मौके पर सूबेदार की पलटन वापस आकर जर्मनों को हरा देती है।
4. 🤫 "उसने कहा था" — वह पवित्र वादा
- इस लड़ाई में लहना सिंह की जाँघ और पसली में गंभीर गोलियाँ लगती हैं, लेकिन वह अपने घाव को खंदक की मिट्टी से दबाकर छिपा लेता है।
- जब घायलों को ले जाने के लिए गाड़ियाँ आती हैं, तो लहना खुद न जाकर सूबेदार हजारा सिंह और उनके बीमार बेटे बोधा सिंह को जबरदस्ती गाड़ी में भेज देता है।
- वह सूबेदार से कहता है—"घर जाओ तो सूबेदारनी से कह देना कि मुझसे जो उन्होंने कहा था, वह मैंने कर दिया।"
- रहस्य: युद्ध पर आने से पहले लहना सिंह सूबेदार के घर गया था। वहाँ सूबेदारनी (जो बचपन की वही अमृतसर वाली लड़की थी) ने आँचल पसारकर लहना से भीख माँगी थी कि युद्ध में मेरे पति और इकलौते बेटे की रक्षा करना।
5. 🍂 अंतिम क्षण और शहादत
- गाड़ी जाने के बाद लहना सिंह अपने मित्र वजीरा सिंह की गोद में सिर रखकर लेट जाता है।
- मौत से ठीक पहले उसकी आँखों के सामने बचपन की सारी यादें साफ हो जाती हैं। वह वजीरा से पानी माँगता है और अपनी अंतिम सांस लेता है। अखबारों में छपता है—मैदान में घावों से मरा—नंबर 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह।
💡 प्रेरणादायक निष्कर्ष और व्याख्या (Inspirational Conclusion & Explanation)
यह कहानी वासना-रहित, निश्छल और सर्वोच्च प्रेम का एक जीवंत उदाहरण है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में, इसमें यथार्थवाद के बीच भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यंत सुरुचि के साथ छुपा है। लहना सिंह का चरित्र हमें सिखाता है कि प्रेम केवल पाने का नाम नहीं है, बल्कि कर्तव्य, त्याग और अपने दिए हुए वचन को प्राणों की बाजी लगाकर भी निभाना ही सच्चे प्रेम की पराकाष्ठा है। लहना सिंह ने बचपन के उस निश्छल प्रेम की लाज रखने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया और इतिहास में अमर हो गया! 🌟🎖️
📌 📝 एक पैराग्राफ में संक्षिप्त सारांश (One-Paragraph Summary)
✨ 'उसने कहा था' कहानी का 15-मिनट क्विक निचोड़: चंद्रधर शर्मा गुलेरी द्वारा रचित यह कालजयी कहानी अमृतसर के बाजार में 12 वर्ष के लड़के (लहना सिंह) और 8 वर्ष की एक लड़की के बीच पनपे एक निश्छल और पवित्र बचपन के प्रेम से शुरू होती है। समय के चक्र के साथ लहना सिंह ब्रिटिश सेना में जमादार बनकर प्रथम विश्वयुद्ध के मोर्चे पर जाता है, जहाँ उसकी मुलाकात सूबेदार हजारा सिंह और उसके बेटे बोधा सिंह से होती है। युद्ध पर जाने से पहले, सूबेदारनी (जो बचपन की वही लड़की थी) लहना से अपने पति और बेटे के प्राणों की रक्षा करने का आँचल पसारकर वचन माँगती है। मोर्चे पर लहना सिंह न केवल अपनी अद्भुत सूझबूझ से जर्मन जासूस के बड़े षड्यंत्र को नाकाम करता है, बल्कि भीषण युद्ध में खुद गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद सूबेदार और बोधा को सुरक्षित अस्पताल भेज देता है। अंत में, अपने मित्र वजीरा की गोद में सिर रखकर वह दम तोड़ देता है, पर मरते दम तक सूबेदारनी को दिए उस पवित्र वचन—"उसने कहा था"—को अपने प्राणों की आहुति देकर पूरा करता है, जो कर्तव्य-परायणता और सर्वोच्च आत्मोत्सर्ग की एक बेहद प्रेरणादायक मिसाल है। 🪖❤️🌟
लघु कथा (Short Story)
अमृतसर के व्यस्त चौक की एक दुकान पर एक बारह वर्ष का सिख लड़का और एक आठ वर्ष की सिख लड़की अचानक मिले. लड़का अपने मामा के बाल धोने के लिए दही लेने आया था और लड़की रसोई के लिए बड़ियाँ. सौदा लेकर दोनों साथ चले. रास्ते में लड़के ने मुस्कुराकर पूछा, "तेरी कुड़माई (सगाई) हो गई?" लड़की कुछ आँखें चढ़ाकर 'धत्' कहकर दौड़ गई और लड़का मुँह देखता रह गया. महीने भर दोनों कभी सब्जीवाले तो कभी दूधवाले के यहाँ अकस्मात मिलते रहे. लड़का हर बार वही सवाल दोहराता और लड़की 'धत्' कहकर भाग जाती. एक दिन जब लड़के ने फिर चिढ़ाने के लिए पूछा, तो लड़की उसकी उम्मीद के उलट बोली, "हाँ, हो गई—कल, देखते नहीं यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू!" यह कहकर वह भाग गई. लड़के के मन को गहरी ठेस लगी. वह उदास और क्षुब्ध होकर घर लौट आया.
पच्चीस वर्ष बीत गए. वह लड़का, लहनासिंह, अब ब्रिटिश सेना की ७७ सिख राइफल्स में जमादार बन चुका था. समय के साथ वह उस बचपन की मुलाकात और लड़की को पूरी तरह भूल चुका था. एक बार सात दिन की छुट्टी बिताकर जब वह अपने घर से वापस युद्ध (लाम) पर जाने लगा, तो रास्ते में सूबेदार हजारासिंह का गाँव पड़ा. सूबेदार उसे बहुत मानता था, इसलिए लहनासिंह उनके घर रुका ताकि वे सब साथ चल सकें. चलने से पहले सूबेदार ने कहा कि सूबेदारनी उसे जानती है और अंदर बुला रही है. लहनासिंह जब भीतर गया, तो सूबेदारनी ने उसे देखते ही पहचान लिया और अतीत की याद दिलाते हुए पूछा, "तेरी कुड़माई हो गई? 'धत्'—कल हो गई…" यह सुनते ही लहनासिंह चौंक उठा; वह समझ गया कि यह वही बचपन की लड़की है. सूबेदारनी ने रोते हुए आँचल पसारकर भिक्षा माँगी, "मेरा एक ही बेटा है बोधासिंह, जो साल भर पहले फौज में भर्ती हुआ है. मेरे पति और पुत्र दोनों युद्ध पर जा रहे हैं. एक बार तुमने टांगे के नीचे आने से मेरे प्राण बचाए थे, वैसे ही इन दोनों की भी रक्षा करना. यह मेरी भिक्षा है." लहनासिंह ने उसका यह वचन अपने दिल में बसा लिया.
फ्रांस के युद्ध मैदान में, कड़ाके की ठंड और कीचड़ से भरी खंदकों में सिपाही दिनों से डटे हुए थे. लुधियाने से दस गुना जाड़ा था और बर्फ गिर रही थी. लहनासिंह ने सूबेदार से कहा, "बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही।" वह बेचैन था और दुश्मनों से आमने-सामने की लड़ाई चाहता था ताकि शरीर में कुछ गर्मी आए. सूबेदार का बेटा बोधासिंह ठंड के कारण गंभीर रूप से बीमार था और निमोनिया की कगार पर था. सूबेदारनी को दिए वचन को निभाने के लिए लहनासिंह अपनी जान की परवाह किए बिना रात भर अपने दोनों कंबल और गरम जर्सी बोधासिंह को ओढ़ा देता और खुद खाकी कोट पहनकर सिगड़ी के सहारे पहरा देता रहा.
तभी आधी रात को खंदक के मुहाने पर ब्रिटिश सेना के नकली 'लपटन साहब' के भेष में एक जर्मन जासूस आया. उसने सूबेदार हजारासिंह को झांसा देकर अधिकांश सैनिकों के साथ तुरंत एक मील दूर जर्मन खाई पर हमला करने भेज दिया और खंदक में सिर्फ दस सैनिक छोड़ दिए. लहनासिंह ने सिगड़ी के उजाले में लपटन साहब का बदला हुआ हुलिया, उनके कटे हुए बाल और उनकी किताबी उर्दू पकड़ ली. उसने चतुराई से शिकार की पुरानी बातें छेड़कर जासूस की असलियत का पक्का पता लगा लिया. जब वह जासूस खंदक की दीवारों में बम के गोले फिट कर दियासलाई जलाने लगा, तब लहनासिंह ने बिजली की फुर्ती से बंदूक के कुंदे से उस पर हमला कर उसे बेहोश कर दिया. उसने तुरंत वजीरासिंह को गुप्त रास्ते से भेजकर सूबेदार की टुकड़ी को वापस बुलाया. तभी सत्तर जर्मन सैनिकों ने खंदक पर धावा बोल दिया. खंदक में मौजूद मुट्ठी भर सिखों ने लहनासिंह के नेतृत्व में वीरता से मुकाबला किया. अचानक सूबेदार के सैनिक भी पीछे से आ पहुँचे और जर्मनों को दोनों ओर से घेर कर ढेर कर दिया. इस भयंकर लड़ाई में लहनासिंह की जाँघ और पसली में गोलियाँ लगीं, लेकिन उसने खंदक की गीली मिट्टी से अपने घाव को छुपाया और किसी को भनक तक नहीं लगने दी.
सुबह होते ही फील्ड अस्पताल से डॉक्टरों और घायलों को ले जाने वाली गाड़ियाँ आ पहुँचीं. लहनासिंह ने गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद सूबेदार और बीमार बोधासिंह को जबरदस्ती गाड़ी में बिठा दिया. सूबेदार जब उसे भी साथ चलने के लिए कहने लगे, तो लहनासिंह ने बोधा और सूबेदारनी की सौगंध देकर उन्हें रवाना कर दिया. विदा होते समय उसने सूबेदार से कहा, "जब घर जाओ तो सूबेदारनी होराँ से कह देना कि मुझसे जो उन्होंने कहा था, वह मैंने कर दिया।" गाड़ियों के चले जाने के बाद लहनासिंह खंदक के किनारे लेट गया और वजीरासिंह से पानी माँगा.
मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है। जन्म भर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं, समय की धुंध बिल्कुल उन पर से हट जाती है। मरणासन्न लहनासिंह के दिमाग में अतीत की स्मृतियाँ घूम गईं—अमृतसर का वह बाजार, वह आठ साल की लड़की, उसका 'धत्' कहना, रेशमी फूलों वाला सालू, और अंत में सूबेदारनी का आँचल पसारकर अपने पति-पुत्र की रक्षा की भीख माँगना. उसने वजीरासिंह की गोद में सिर रखकर अंतिम सांस ली. कुछ दिनों बाद अखबारों में छपा—फ्रांस और बेल्जियम की युद्ध भूमि में घावों से मरे, नं० ७७ सिख राइफल्स के जमादार लहनासिंह.
मुख्य घटनाएँ और सुरक्षित रखे गए महत्वपूर्ण अनुच्छेद
- अमृतसर का बचपन और प्रथम परिचय: लहनासिंह और उस लड़की की चौक पर मुलाकात, 'कुड़माई' का सवाल और लड़की का 'धत्' कहकर भागना तथा अंत में सगाई की बात सुनकर लहनासिंह का दुखी होना.
- सूबेदारनी की भिक्षा (वचन): २५ साल बाद सूबेदारनी द्वारा लहनासिंह को पहचानना और अपने पति (हजारासिंह) व पुत्र (बोधासिंह) की रक्षा का वचन लेना.
- सिपाही का शौर्य और कठिन परिस्थितियाँ: खंदक में सैनिकों की मनोदशा को दर्शाने वाला महत्वपूर्ण वाक्य सुरक्षित रखा गया: "बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही।"
- त्याग और कर्तव्यपरायणता: बोधासिंह की बीमारी में लहनासिंह द्वारा अपने कंबल और जर्सी देना व खुद ठंड में पहरा देना.
- नकली लपटन साहब का पर्दाफाश: जर्मन जासूस की चालाकी को भांपना, खंदक को बम से उड़ने से बचाना और घायल होने पर भी सूबेदार की सेना को वापस बुलाकर युद्ध जीतना.
- वचन पूर्ति: घायल लहनासिंह द्वारा सूबेदार और बोधा को सुरक्षित भेजना तथा सूबेदारनी को यह संदेश देने को कहना कि "उसने जो कहा था, वह मैंने कर दिया".
- अंतिम क्षण (स्मृति का दृश्य): मृत्यु से ठीक पहले का सबसे भावुक और दार्शनिक अनुच्छेद पूरी तरह सुरक्षित रखा गया: "मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है…" जिसके बाद लहनासिंह का वजीरासिंह की गोद में दम तोड़ना और वीरगति को प्राप्त होना.
'उसने कहा था' कहानी का चरित्र-चित्रण, उद्देश्य एवं संदेश
1. मुख्य पात्रों का चरित्र-चित्रण
लहनासिंह (जमादार, 77 सिख राइफल्स):
- अटल देशभक्त और वीर सिपाही: लहनासिंह एक निडर और पराक्रमी सैनिक है। वह खंदक की भीषण ठंड में भी युद्ध के लिए हमेशा तत्पर रहता है और कहता है कि "बिना लड़े सिपाही बिगड़ता है।" सत्तर जर्मनों के अचानक हमले का वह मुट्ठी भर साथियों के साथ डटकर सामना करता है।
- विलक्षण बुद्धि और चतुर: वह केवल शारीरिक रूप से ही वीर नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी बेहद कुशाग्र है। वह नकली लपटन साहब की छोटी-छोटी गलतियों (जैसे किताबी उर्दू बोलना, सिगरेट देना और बालों का कटा होना) को तुरंत भांप लेता है और चतुराई से उनका पर्दाफाश कर खंदक को तबाही से बचा लेता है।
- त्याग और कर्तव्य की प्रतिमूर्ति: लहनासिंह का चरित्र निश्छल प्रेम और अभूतपूर्व त्याग का प्रतीक है। बचपन के उस मासूम प्रेम के सम्मान में, वह सूबेदारनी को दिए वचन की खातिर अपने प्राणों की आहुति दे देता है। वह बीमार बोधासिंह को ठंड से बचाने के लिए अपने कंबल और जर्सी तक दे देता है।
- घावों को छिपाने वाला साहसी: युद्ध में गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद वह सूबेदार हजारासिंह और बोधासिंह को जबरदस्ती अस्पताल की गाड़ी में भेज देता है, पर खुद का घाव छिपाए रखता है ताकि वे सुरक्षित घर लौट सकें।
सूबेदारनी (होराँ):
- मातृ-हृदय और वात्सल्य भाव: सूबेदारनी एक स्नेही माँ और समर्पित पत्नी है। उसका इकलौता बेटा बोधासिंह और पति हजारासिंह दोनों युद्ध पर जा रहे हैं, जिससे उसका मातृ-हृदय और स्त्री-मन अत्यंत आशंकित और व्याकुल है।
- विश्वास और याचना: वह पच्चीस वर्ष बाद भी लहनासिंह की भलाई और उसके उपकार (बचपन में टांगे के नीचे से बचाना) को नहीं भूलती। उसे लहनासिंह की वीरता पर पूरा भरोसा है, इसलिए वह उसके सामने आँचल पसारकर अपने सुहाग और बेटे की रक्षा की भिक्षा माँगती है।
वजीरासिंह:
- पलटन का विदूषक (हँसोड़): वजीरासिंह सेना का एक ऐसा सिपाही है जो विषम परिस्थितियों में भी मजाक करके साथियों का हौसला बढ़ाता है और उदासी के बादल छांट देता है।
- सच्चा मित्र और सहयोगी: वह लहनासिंह का अत्यंत वफादार और आत्मीय मित्र है। अंतिम क्षणों में वह लहनासिंह का सिर अपनी गोद में रखकर उसे पानी पिलाता है और उसकी आखिरी इच्छाओं का साक्षी बनता है।
2. कहानी का मुख्य उद्देश्य
- निश्चल और पवित्र प्रेम की स्थापना: चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' जी का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना है कि सच्चा प्रेम केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि एक आत्मिक मोड़ है जो इंसान को कर्तव्यपथ पर सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा देता है। बचपन का एक छोटा सा प्रसंग लहनासिंह के जीवन का मार्ग तय कर देता है।
- कर्तव्यपरायणता और बलिदान की महिमा: यह कहानी दर्शाती है कि एक सैनिक के लिए अपने देश के प्रति कर्तव्य और किसी को दिया गया वचन (वचन-पालन) उसके अपने जीवन से कहीं अधिक मूल्यवान होते हैं।
3. कहानी का संदेश
- 'उसने कहा था' का संदेश: यह कहानी समाज को यह संदेश देती है कि प्रेम में वासना नहीं बल्कि 'त्याग' सर्वोपरि है। लहनासिंह का बलिदान अमर है क्योंकि वह किसी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि सूबेदारनी के विश्वास और अपने सैनिक धर्म को निभाने के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण दे देता है। यह कहानी सिखाती है कि इंसान को हर परिस्थिति में अपनी सूझबूझ बनाए रखनी चाहिए और अपनों के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।
4. शीर्षक की सार्थकता (Significance of the Title) पर नोट
चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' द्वारा रचित 'उसने कहा था' एक कालजयी कहानी है, जिसका शीर्षक पूरी तरह से सार्थक, कौतूहलपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण है।
- कथानक का केंद्रबिंदु: पूरी कहानी का ताना-बाना इसी एक वाक्य "उसने कहा था" के इर्द-गिर्द बुना गया है। यहाँ "उसने" शब्द सूबेदारनी (बचपन की उस लड़की) के लिए प्रयुक्त हुआ है।
- कर्तव्य और बलिदान की प्रेरणा: युद्ध पर जाने से पहले सूबेदारनी ने लहनासिंह से रोते हुए अपने पति और पुत्र की रक्षा की भीख माँगी थी। सूबेदारनी का यही कथन लहनासिंह के लिए एक पावन आदेश बन जाता है। लहनासिंह खंदक की भीषण ठंड और जर्मनों के आक्रमण के बीच जो भी कदम उठाता है—चाहे बोधासिंह को अपनी जर्सी देना हो, नकली लपटन साहब को मारना हो या अंत में खुद घायल होकर भी उन दोनों को सुरक्षित अस्पताल भेजना हो—वह सब केवल इसी वचन को निभाने के लिए करता है।
- रहस्यात्मकता और सार्थकता: शीर्षक पाठक के मन में जिज्ञासा पैदा करता है कि आखिर "किसने, किससे और क्या कहा था?" कहानी के अंतिम भाग में जब लहनासिंह बार-बार वजीरासिंह से कहता है कि "उसने कहा था", तब जाकर इस रहस्य का पटाक्षेप होता है।
अतः यह शीर्षक कहानी की मूल संवेदना, नायक के चरित्र और उसके सर्वोच्च बलिदान को सीधे अभिव्यक्त करता है, इसलिए यह सर्वथा उपयुक्त और सटीक है।
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