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BSEB Class 12 Hindi Ch 5 Summary & Notes: रोज

5. रोज (कहानी) ​

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NCERT, Bihar Board, CBSE, State Board,SCERT, VVI Point, Extra

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन आग्नेय ​

  • जन्म : 7 मार्च 1911 ।
  • निधन : 4 अप्रैल 1987 1
  • जन्म-स्थान : कसेया, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश ।
  • मूल निवास : कर्तारपुर, पंजाब ।
  • माता-पिता : व्यंती देवी और डॉ. हीरानंद शास्त्री (जाने-माने आर्कियोलॉजिस्ट)
  • शिक्षा : प्रारंभिक चार साल लखनऊ में घर पर । मैट्रिक 1925 में, पंजाब विश्वविद्यालय से। इंटर 1927 में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से । बी० एससी० 1929 फोरमन कॉलेज, लाहौर, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान); एम० ए० (अंग्रेजी, पूर्वार्ध), लाहौर से । क्रांतिकारी आंदोलन में गिरफ्तार हो जाने से आगे पढ़ाई रुक गई ।
  • भाषा-ज्ञान : संस्कृत, अंग्रेजी, हिंदी के अतिरिक्त फारसी, तमिल आदि अनेक भाषाओं का ज्ञान था ।
  • व्यक्तित्व एवं स्वभाव : सुंदर, लंबा, गठीला शरीर । सुरुचि, सुव्यवस्था एवं अनुशासनप्रियता । एकांतप्रिय अंतर्मुखी स्वभाव । गंभीर एवं चिंतनशील, मितभाषी। अपने मौन एवं मितभाषण के लिए प्रसिद्ध । पिताजी का तबादला होते रहने के कारण लखनऊ, कश्मीर, लाहौर, पटना, मद्रास आदि स्थानों पर उनके साथ रहने और परिभ्रमण का संस्कार बचपन में ही मिला ।
  • अभिरुचि : बागवानी, पर्यटन, अध्ययन आदि के अलावा दर्जनों प्रकार के पेशेवर कार्यों में दक्षता । फोटोग्राफी, हस्तकला, शिल्प आदि में प्रवीणता । यूरोप, एशिया, अमेरिका सहित कई देशों की साहित्यिक यात्राएँ ।
  • सम्मान एवं पुरस्कार : साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञानपीठ, सुगा (युगोस्लाविया) का अंतरराष्ट्रीय स्वर्णमाल आदि पुरस्कार । देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में 'विजिटिंग प्रोफेसर' के रूप में आमंत्रित ।
  • पत्रकारिता : सैनिक (आगरा), विशाल भारत (कोलकाता), प्रतीक (प्रयाग), दिनमान (दिल्ली), नया प्रतीक (दिल्ली), नवभारत टाइम्स (नई दिल्ली); थॉट, वाक्, एवरीमैंस (अंग्रेजी में संपादन) ।
  • कृतियाँ : दस वर्ष की अवस्था में कविता लिखनी शुरू की। लेखन हिंदी-अंग्रेजी दोनों भाषाओं में । बचपन में खेलने के लिए 'इंद्रसभा' नामक नाटक लिखा । घर में एक हस्तलिखित पत्रिका 'आनंदबंधु' निकालते थे । 1924-25 में अंग्रेजी में एक उपन्यास लिखा था। 1924 में पहली कहानी इलाहाबाद की स्काउट पत्रिका 'सेवा' में प्रकाशित, 1930 के बाद नियमित लेखन । विपथगा, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप, छोड़ा हुआ रास्ता, लौटती पगडंडियाँ आदि (कहानी संकलन) ।
    • शेखर : एक जीवनी (प्रथम भाग 1941, द्वितीय भाग 1944), नदी के द्वीप (1952), अपने-अपने अजनबी (1961) - सभी उपन्यास । उत्तर प्रियदर्शी (1967) नाटक । भग्नदूत, चिंता, इत्यलम्, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, आँगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, सदानीरा, ऐसा कोई घर आपने देखा है आदि (कविता संकलन) । अरे यायावर रहेगा याद (1953), एक बूँद सहसा उछली (1961) - यात्रा साहित्य । त्रिशंकु, आत्मनेपद, आलवाल, अद्यतन, भवंती, अंतरा, शाश्वती, संवत्सर आदि (सभी निबंध) । तार सप्तक (1943), दूसरा सप्तक (1951), तीसरा सप्तक (1959), चौथा सप्तक (1978), पुष्करिणी, रूपांबरा, नेहरू अभिनंदन ग्रंथ आदि (सभी संपादित ग्रंथ) ।
    • शरतचंद्र के श्रीकांत, जैनेंद्र कुमार के त्यागपत्र तथा अपने उपन्यास अपने-अपने अजनबी सहित अनेक कृतियों का अंग्रेजी अनुवाद । रवींद्रनाथ ठाकुर के गोरा का हिंदी अनुवाद ।

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय हिंदी के आधुनिक साहित्य में एक प्रमुख प्रतिभा थे। वे आधुनिक हिंदी साहित्य के एक प्रमुख कवि, कथाकार, विचारक एवं पत्रकार थे । साहित्य की अनेक विधाओं-यात्रा साहित्य, आलोचना, डायरी आदि में भी उनकी अवदान महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने विशाल साहित्य की रचना की है जिसमें वस्तु, भाव, भाषा, शिल्प आदि के धरातल पर प्रयोगों और नवाचारों की बहुलता है। साहित्य में लेखन के अतिरिक्त संपादन, निर्देशन, अभिप्रेरण, परिसंवाद, भाषण आदि के द्वारा भी उन्होंने अपनी सर्जनात्मकता को विस्तार दिया है। उनमें युग का प्रतिनिधित्व करनेवाली, सांगठनिक क्षमताओं से युक्त नेतृत्वकारी प्रतिभा और रचनात्मक कर्मठता थी । अज्ञेय का जीवन और साहित्य, जो घनिष्ठ रूप से परस्पर संपृक्त हैं, विशेष व्यक्तित्व से संपन्न एवं वैविध्यपूर्ण हैं । स्वाधीनता आंदोलन में उग्र और विद्रोही विचारधारा वाले एक क्रांतिकारी के रूप में उनकी भूमिका रही । कारावास और जेल यातनाएँ भी उन्हें सहनी पड़ीं । द्वितीय महायुद्ध के दौरान उन्होंने सेना में नौकरी की थी। वे आजीवन सैलानी रहे, रोमांचक यात्राएँ करना उनका स्वभाव और शौक था। हिंदी में शायद ही ऐसा कोई लेखक-कलाकार हो जिसकी अज्ञेय की तरह परस्पर असंबद्ध बीसों तरह के कार्यों में पेशेवर दक्षता हो । प्रतिभा, रुचि और शौक की अपरिमित विविधता के कारण उनके व्यक्तित्व में विशेष प्रकार का विस्तार, गहराई, विविधता और एकान्विति संघटित हुई और वे विलक्षण लेखक बन गए ।

कथा साहित्य में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद के बाद आए महत्त्वपूर्ण क्रांतिकारी परिवर्तन में अज्ञेय की भूमिका निर्णायक रही है। कहानी को महज किस्सा, आख्यान और इतिवृत्त के धरातल से ऊपर उठाकर एक कसे हुए, अंतर्गुफित क़लात्मक रूप के तौर पर उभारने वालों में अज्ञेय अग्रणी रहे हैं। हिंदी कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिक गहराई लाने का श्रेय जैनेंद्र कुमार और अज्ञेय को दिया जाता है । इसके साथ ही बौद्धिकता, नैतिक-वैचारिक सजगता और कलात्मकता भी अज्ञेय ने हिंदी कथा में जोड़ी । अज्ञेय ने हिंदी कहानी के भावी विकास का प्रारूप अपनी कहानियों द्वारा प्रस्तुत किया । बिना अज्ञेय के 'नई कहानी' की कल्पना नहीं की जा सकती ।

अज्ञेय के द्वारा 'गैंग्रीन' शीर्षक से 1934 में लिखी गई कहानी यहाँ प्रस्तुत है । बाद में इसका शीर्षक लेखक के द्वारा 'रोज' कर दिया गया । यह प्रेमचंद के बाद की श्रेष्ठ हिंदी कहानियों में परिगणित होती है। वातावरण, परिस्थिति और उसके प्रभाव में ढलते हुए एक गृहिणी के चरित्र का मनोवैज्ञानिक उद्घाटन अत्यंत कलात्मक रीति से लेखक यहाँ प्रस्तुत करता है। डॉक्टर पति के काम पर चले जाने के बाद का सारा समय मालती को घर में एकाकी काटना होता है । उसका दुर्बल, बीमार और चिड़चिड़ा पुत्र हमेशा सोता रहता है या रोता रहता है । मालती उसकी देखभाल करती हुई सुबह से रात ग्यारह बजे तक घर के कार्यों में अपने को व्यस्त रखती है । उसका जीवन ऊब और उदासी के बीच यंत्रवत चल रहा है । किसी तरह के मनोविनोद, उल्लास उसके जीवन में नहीं रह गए हैं। जैसे वह अपने जीवन का भार ढोने में ही घुल रही हो । प्रसंगवश मध्यवर्गीय भारतीय समाज में घरेलू स्त्री के जीवन और मनोदशा पर लेखक अपनी सहानुभूतिपूर्ण मानवीय दृष्टि केंद्रित करता है। कहानी के गर्भ से अनेक सामाजिक प्रश्न विचारोत्तेजक रूप में पैदा होते हैं।

रोज अज्ञेय की सर्वाधिक चर्चित कहानी है क्योंकि इसमें 'संबंधों' की वास्तविकता को एकांतं वैयक्तिक अनुभूतियों से अलग ले जाकर सामाजिक संदर्भमें देखा गया है। मध्यवर्ग की पारिवारिक एकरसता को जितनी मार्मिकता से कहानी व्यक्त कर सकी है वह उस युग की कहानियों में विरल है ।
विजय मोहन सिंह

रोज ​

दोपहर में उस सूने आँगन में पैर रखते ही मुझे ऐसा जान पड़ा, मानो उस पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो, उसके वातावरण में कुछ ऐसा अकथ्य, अस्पृश्य, किंतु फिर भी बोझल और प्रकंपमय घना सा सन्नाटा फैल रहा था

मेरी आहट सुनते ही मालती बाहर निकली । मुझे देखकर, पहचानकर उसकी मुरझाई हुई मुख-मुद्रा तनिक से मीठे विस्मय से जागी सी और फिर पूर्ववत हो गई । उसने कहा, "आ जाओ।" और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए भीतर की ओर चली । मैं भी उसके पीछे हो लिया ।

भीतर पहुँचकर मैंने पूछा, "वे यहाँ नहीं हैं ?"

"अभी आए नहीं, दफ्तर में हैं। थोड़ी देर में आ जाएँगे । कोई डेढ़-दो बजे आया करते हैं ।"

"कबके गए हुए हैं ?"

"सवेरे उठते ही चले जाते हैं ।"

मैं 'हूँ' कहकर पूछने को हुआ, 'और तुम इतनी देर क्या करती हो ?' पर फिर सोचा, आते ही एकाएक प्रश्न ठीक नहीं है। मैं कमरे के चारों ओर देखने लगा ।

मालती एक पंखा उठा लाई और मुझे हवा करने लगी । मैंने आपत्ति करते हुए कहा, "नहीं, मुझे नहीं चाहिए ।" पर वह नहीं मानी, बोली, "वाह ! चाहिए कैसे नहीं ? इतनी धूप में तो आए हो ! यहाँ

मैंने कहा, "अच्छा, लाओ मुझे दे दो ।"

वह शायद 'ना' करनेवाली थी, पर तभी दूसरे कमरे से शिशु के रोने की आवाज सुनकर उसने चुपचाप पंखा मुझे दे दिया और घुटने पर हाथ टेक कर एक थकी हुई 'हुँह' करके उठी और भीतर चली गई ।

मैं उसके जाते हुए, दुबले शरीर को देख कर सोचता रहा-यह क्या है घर में छाई हुई है ?….. यह कैसी छाया सी इस

मालती मेरी दूर के रिश्ते की बहन है, किंतु उसे सखी कहना ही उचित है, क्योंकि हमारा परस्पर संबंध सख्य का ही रहा है । हम बचपन में इकट्ठे खेले हैं, इकट्ठे लड़े और पिटे हैं, और हमारी पढ़ाई

भी बहुत सी इकट्ठे ही हुई थी । हमारे व्यवहार में सदा सख्य की स्वेच्छा और स्वच्छंदता रही है, वह कभी भ्रातृत्व के, या बड़े छोटेपन के बंधनों में नहीं घिरा….

मैं आज कोई चार वर्ष बाद उसे देखने आया हूँ। जब मैंने उसे इससे पूर्व देखा था, तब वह लड़की ही थी, अब वह विवाहिता है, एक बच्चे की माँ भी है । इससे कोई परिवर्तन उसमें आया होगा और यदि आया होगा तो क्या, यह मैंने अभी तक सोचा नहीं था, किंतु अब उसकी पीठ की ओर देखता हुआ मैं सोच रहा था, यह कैसी छाया इस घर पर छाई हुई है…. और विशेषतया मालती पर…..

मालती बच्चे को लेकर लौट आई और फिर मुझसे कुछ दूर नीचे बिछी हुई दरी पर बैठ गई । मैंने अपनी कुरसी घुमाकर कुछ उसकी ओर उन्मुख होकर पूछा, "इसका नाम क्या है ?"

मालती ने बच्चे की ओर देखते हुए उत्तर दिया, "नाम तो कोई निश्चित नहीं किया, वैसे टिटी कहते हैं ।"

मैंने उसे बुलाया, "टिटी, टिटी आ जा," पर वह अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मेरी ओर देखता हुआ अपनी माँ से चिपट गया, और रुआँसा सा होकर कहने लगा, "उहुँ-उहुँ-उहुँ-ॐ…"

मालती ने फिर उसकी ओर एक नजर देखा, और फिर आँगन की ओर देखने लगी…

काफी देर मौन रहा । थोड़ी देर तक तो वह मौन आकस्मिक ही था, जिसमें मैं प्रतीक्षा में था कि मालती कुछ पूछे, किंतु उसके बाद एकाएक मुझे ध्यान हुआ, मालती ने कोई बात ही नहीं की… यह भी नहीं पूछा कि मैं कैसा हूँ, कैसे आया हूँ…. चुप बैठी है, क्या विवाह के दो वर्ष में ही वह बीते दिन भूल गई ? या अब मुझे दूर-इस विशेष अंतर पर रखना चाहती है? क्योंकि वह निर्बाध स्वच्छंदता अब तो नहीं हो सकती…. पर फिर भी, ऐसा मौन, जैसा अजनबी से भी नहीं होना चाहिए…..

मैंने कुछ खिन्न सा होकर, दूसरी ओर देखते हुए कहा, "जान पड़ता है, तुम्हें मेरे आने से विशेष प्रसन्नता नहीं हुई- "

उसने एकाएक चौंककर कहा, "हूँ ?"

यह 'हूँ' प्रश्नसूचक था, किंतु इसलिए नहीं कि मालती ने मेरी बात सुनी नहीं थी, केवल विस्मय के कारण । इसलिए मैंने अपनी बात दुहराई नहीं, चुप बैठा रहा । मालती कुछ बोली ही नहीं, तब थोड़ी देर बाद मैंने उसकी ओर देखा। वह मेरी ओर देख रही थी, किंतु मेरे उधर उन्मुख होते ही उसने आँखें नीची कर लीं । फिर भी मैंने देखा, उन आँखों में विचित्र सा भाव था, मानो मालती के भीतर कहीं कुछ चेष्टा कर रहा हो, किसी बीती हुई बात को याद करने की, किसी बिखरे हुए वायुमंडल को पुनः जगाकर गतिमान करने की, किसी टूटे हुए व्यवहार-तंतु को पुनर्जीवित करने की, और चेष्टा में सफल न हो रहा हो… वैसे जैसे बहुत देर से प्रयोग में न लाए हुए अंग को व्यक्ति एकाएक उठाने लगे और पाए कि वह उठता ही नहीं है, चिर-विस्मृति में मानो मर गया है, उतने क्षीण बल से (यद्यपि वह सारा प्राप्य बल है) उठ नहीं सकता…. मुझे ऐसा जान पड़ा, मानो किसी जीवित प्राणी के गले में किसी मृत जंतु का तौक डाल दिया गया हो, वह उसे उतारकर फेंकना चाहे, पर उतार न पाए……

तभी किसी ने किवाड़ खटखटाए । मैंने मालती की ओर देखा, पर वह हिली नहीं । जब किवाड़ दूसरी बार खटखटाए गए, तब शिशु को अलग करके उठी और किवाड़ खोलने लगी ।

वे, यानी मालती के पति आए । मैंने उन्हें पहली बार देखा था, यद्यपि फोटो से उन्हें पहचानता था । परिचय हुआ । मालती खाना तैयार करने आँगन में चली गई, और हम दोनों भीतर बैठकर बातचीतं करने लगे, उनकी नौकरी के बारे में, उनके जीवन के बारे में, उस स्थान के बारे में, और ऐसे अन्य विषयों के बारे में जो पहले परिचय पर उठा करते हैं, एक तरह का स्वरक्षात्मक कवच बनकर…….

मालती के पति का नाम है महेश्वर । वह एक पहाड़ी गाँव में सरकारी डिस्पेंसरी के डॉक्टर हैं, उसी हैसियत से इन क्वार्टरों में रहते हैं । प्रातःकाल सात बजे डिस्पेंसरी चले जाते हैं, और डेढ़ या दो बजे लौटते हैं, उसके बाद दोपहर भर छुट्टी रहती है, केवल शाम को एक-दो घंटे फिर चक्कर लगाने के लिए जाते हैं, डिस्पेंसरी के साथ छोटे से अस्पताल में रोगियों को देखने और अन्य जरूरी हिदायतें करने….उनका जीवन भी बिलकुल एक निर्दिष्ट ढर्रे पर चलता है, नित्य वही काम, उसी प्रकार के मरीज, वही हिदायतें, वही नुस्खे, वही दवाइयाँ । वह स्वयं उकताए हुए हैं और इसलिए और साथ ही इस भयंकर गरमी के कारण वह अपने फुरसत के समय में भी सुस्त ही रहते हैं….

मालती हम दोनों के लिए खाना ले आई । मैंने पूछा, "तुम नहीं खाओगी ? या खा चुकीं ?"

महेश्वर बोले, कुछ हँसकर, "वह पीछे खाया करती है…."

पति ढाई बजे खाना खाने आते हैं, इसलिए पत्नी तीन बजे तक भूखी बैठी रहेगी !

महेश्वर खाना आरंभ करते हुए मेरी ओर देखकर बोले, "आपको तो खाने का मजा ही क्या आएगा, ऐसे बेवक्त खा रहे हैं ?"

मैंने उत्तर दिया, "वाह ! देर से खाने पर तो और भी अच्छा लगता है, भूख बढ़ी हुई होती है, पर शायद मालती बहन को कष्ट होगा ।"

मालती टोककर बोली, 'ऊँहूँ, मेरे लिए तो यह नई बात नहीं है….. रोज ही ऐसा होता है….."

मालती बच्चे को गोद में लिए हुए थी । बच्चा रो रहा था, पर उसकी ओर कोई भी ध्यान नहीं दे रहा था ।

मैंने कहा, "यह रोता क्यों है ?"

मालती बोली, "हो ही गया है चिड़चिड़ा सा, हमेशा ही ऐसा रहता है ।" फिर बच्चे को डाँट कर कहा, "चुप कर ।" जिससे वह और भी रोने लगा । मालती ने भूमि पर बैठा दिया और बोली, 'अच्छा ले, रो ले ।" और रोटी लेने आँगन की ओर चली गई ।

जब हमने भोजन समाप्त किया तब तीन बजने वाले थे, महेश्वर ने बताया कि उन्हें आज जल्दी अस्पताल जाना है, वहाँ एक-दो चिंताजनक केस आए हुए हैं, जिनका ऑपरेशन करना पड़ेगा……दो की शायद टाँग काटनी पड़े, गैंग्रीन हो गया है…… थोड़ी देर में वह चले गए । मालती किवाड़ बंद कर आई और मेरे पास बैठने ही लगी थी कि मैंने कहा, "अब खाना तो खा लो, मैं उतनी देर टिटी से खेलता हूँ।"

वह बोली, "खा लूँगी, मेरे खाने की कौन बात है," किंतु चली गई । मैं टिटी को हाथ में लेकर

झुलाने लगा, जिससे वह कुछ देर के लिए शांत हो गया ।

दूर….. शायद अस्पताल में ही, तीन खड़के । एकाएक मैं चैंका, मैंने सुना, मालती वहीं आँगन में बैठी अपने आप ही एक लंबी सी थकी हुई साँस के साथ कह रही है, "तीन बज गए…." मानो बड़ी तपस्या के बाद कोई कार्य संपन्न हो गया हो ।

तो….." थोड़ी ही देर में मालती फिर आ गई, मैंने पूछा, "तुम्हारे लिए कुछ बचा भी था ? सब कुछ

"बहुत था ।"

"हाँ, बहुत था, भाजी तो सारी मैं ही खा गया था, वहाँ बचा कुछ होगा नहीं, यों ही रोब तो न जमाओ कि बहुत था ।" मैंने हँस कर कहा ।

मालती मानो किसी और विषय की बात कहती हुई बोली, "यहाँ सब्जी-वब्जी तो कुछ होती ही नहीं; कोई आता-जाता है तो नीचे से मँगा लेते हैं, मुझे आए पंद्रह दिन हुए हैं, जो सब्जी साथ लाए थे वही अभी बरती जा रही है…."

मैंने पूछा, "नौकर कोई नहीं है ?"

"कोई ठीक मिला नहीं, शायद दो-एक दिन में हो जाए ।"

"बरतन भी तुम्हीं माँजती हो ?"

"और कौन ?" कह कर मालती क्षण भर आँगन में जाकर लौट आई ।

मैंने पूछा, "कहाँ गई थी ?"

"आज पानी ही नहीं है, बरतन कैसे मँजेंगे ?

"क्यों पानी को क्या हुआ ?"

मँजेंगे ।" "रोज ही होता है…. कभी वक्त पर तो आता नहीं, आज शाम को सात बजे आएगा, तब बरतन

"चलो, तुम्हें सात बजे तक तो छुट्टी हुई," कहते हुए मैं मन ही मन सोचने लगा, अब इसे रात के ग्यारह बजे तक काम करना पड़ेगा, छुट्टी क्या खाक हुई ?

यही उसने कहा । मेरे पास कोई उत्तर नहीं था, पर मेरी सहायता टिटी ने की, एकाएक फिर रोने लगा और मालती के पास जाने की चेष्टा करने लगा । मैंने उसे दे दिया ।

थोड़ी देर फिर मौन रहा, मैंने जेब से अपनी नोटबुक निकाली और पिछले दिनों के लिखे हुए नोट देखने लगा, तब मालती को याद आया कि उसने मेरे आने का कारण पूछा नहीं, और बोली, "यहाँ आए कैसे ?"

मैंने कहा, "अच्छा, अब याद आया ? तुमसे मिलने आया था, और क्या करने ?"

"तो दो-एक दिन रहोगे न ?"

"नहीं कल चला जाऊँगा ।"

मालती कुछ नहीं बोली, कुछ खिन्न सी हो गई। मैं फिर नोटबुक की तरफ देखने लगा ।

थोड़ी देर बाद मुझे ध्यान हुआ, मैं आया तो हूँ मालती से मिलने, किंतु यहाँ वह बात करने को बैठी है और मैं पढ़ रहा हूँ, पर बात भी क्या की जाए ? मुझे ऐसा लग रहा था कि इस घर पर जो छाया घिरी हुई है, वह अज्ञात रहकर भी मानो मुझे भी वश में कर रही है, मैं भी वैसा ही नीरस निर्जीव सा हो रहा हूँ, जैसे-हाँ, जैसे…… यह घर, जैसे मालती ।

पड़ें । मैंने पूछा, "तुम कुछ पढ़ती-लिखती नहीं ?" मैं चारों ओर देखने लगा कि कहीं किताबें दीख

"यहाँ !" कहकर मालती थोड़ा सा हँस दी। वह हँसी कह रही थी, 'यहाँ पढ़ने को हैं क्या?"

गया… मैंने कहा, "अच्छा, मैं वापस जाकर जरूर कुछ पुस्तकें भेजूंगा…" और वार्तालाप फिर समाप्त हो

थोड़ी देर बाद मालती ने फिर पूछा, "आए कैसे हो, लारी में ?"

"पैदल ।"

"इतनी दूर ? बड़ी हिम्मत की ।"

"आखिर तुमसे मिलने आया हूँ ।"

"ऐसे ही आए हो ?"

"नहीं, कुली पीछे आ रहा है, सामान लेकर । मैंने सोचा, बिस्तरा ले चलूँ ।"

"अच्छा किया, यहाँ तो बस….." कहकर मालती चुप रह गई, फिर बोली, "तब तुम थके होगे, लेट जाओ ।"

"नहीं बिलकुल नहीं थका ।"

"रहने भी दो, थके नहीं, भला थके हैं ?"

"और तुम क्या करोगी ?"

"मैं बरतन माँज रखती हूँ ?"

मैंने कहा, "वाह !" क्योंकि और कोई बात मुझे सूझी नहीं…

थोड़ी देर में मालती उठी और चली गई, टिटी को साथ लेकर । तब मैं भी लेट गया और छत की ओर देखने लगा… मेरे विचारों के साथ आँगन से आती हुई बरतनों के घिसने की खन-खन ध्वनि मिलकर एक विचित्र एकस्वर उत्पन्न करने लगी, जिसके कारण मेरे अंग धीरे-धीरे ढीले पड़ने लगे, मैं ऊँघने लगा….

लगा….. एकाएक वह एकस्वर टूट गया-मौन हो गया । इससे मेरी तंद्रा भी टूटी, मैं उस मौन में सुनने

चार खड़क रहे थे और इसी का पहला घंटा सुनकर मालती रुक गई थी….

वही तीन बजे वाली बात मैंने फिर देखी, अबकी बार और उग्र रूप में । मैंने सुना, मालती एक बिलकुल अनैच्छिक, अनुभूतिविहीन, नीरस, यंत्रवत्-वह भी थके हुए यंत्र के-से स्वर में कह रही है, "चार बज गए" मानो इस अनैच्छिक समय गिनने-गिनने में ही उसका मशीन तुल्य जीवन बीतता हो, वैसे ही, जैसे मोटर का स्पीडोमीटर यंत्रवत् फासला नापता जाता है, और यंत्रवत् विश्रांत स्वर में कहता है (किससे ?) कि मैंने अपने अमित शून्यपथ का इतना अंश तय कर लिया…. न जाने कब, कैसे मुझे नींद आ गई !

तब छह कभी के बज चुके थे, जब किसी के आने की आहट से मेरी नींद खुली और मैंने देखा कि महेश्वर लौट आए हैं, और उनके साथ ही बिस्तर लिए हुए मेरा कुली । मैं मुँह धोने को पानी माँगने को ही था कि मुझे याद आया, पानी नहीं होगा। मैंने हाथों से मुँह पोंछते-पोंछते महेश्वर से पूछा, "आपने बड़ी देर की ?"

उन्होंने किंचित ग्लानि भरे स्वर में कहा, "हाँ, आज वह गैंग्रोन का ऑपरेशन करना ही पड़ा, एक कर आया हूँ, दूसरे को एंबुलेंस में बड़े अस्पताल भिजवा दिया है ।"

मैंने पूछा, "गैंग्रीन कैसे हो गया ?"

"एक काँटा चुभा था, उसी से हो गया, बड़े लापरवाह लोग होते हैं यहाँ के…."

मैंने पूछा, "यहाँ आपको केस अच्छे मिल जाते हैं ? आय के लिहाज से नहीं, डॉक्टरी के अभ्यास के लिए ?"

बोले, "हाँ मिल ही जाते हैं, यही गैंग्रीन, हर दूसरे-चौथे दिन एक केस आ जाता है, नीचे बड़े अस्पतालों में भी…."

मालती आँगन से ही सुन रही थी, अब आ गई, बोली, "हाँ केस बनाते देर क्या लगती है ? काँटा चुभा था, इस पर टाँग काटनी पड़े, यह भी कोई डॉक्टरी है ? हर दूसरे दिन किसी की बाँह काट आते हैं, इसी का नाम है अच्छा अभ्यास !"

महेश्वर हँसे, बोले, "न काटें तो उसकी जान गँवाएँ ?"

"हाँ पहले तो दुनिया में काँटे ही नहीं होते होंगे ? आज तक तो सुना नहीं था कि काँटों के चुभने से मर जाते हैं…."

महेश्वर ने उत्तर नहीं दिया, मुस्करा दिए । मालती मेरी ओर देखकर बोली "ऐसे ही होते हैं डॉक्टर, सरकारी अस्पताल है न, क्या परवाह है। मैं तो रोज ऐसी बातें सुनती हूँ ! अब कोई मर-मुर जाए तो ख्याल ही नहीं होता । पहले तो रात-रात भर नींद नहीं आया करती थी ।"

तभी आँगन में खुले हुए नल ने कहा - टिप्-टिप्-टिप्-टिप्-टिप्-टिप्…….

मालती ने कहा, "पानी !" और उठ कर चली गई । खनखनाहट से हमने जाना, बरतन धोए जाने लगे हैं……

टिटी महेश्वर की टाँगों के सहारे खड़ा मेरी ओर देख रहा था, अब एकाएक उन्हें छोड़कर मालती

बीएसटी.बीपीसी-2018

की ओर खिसकता हुआ चला । महेश्वर ने कहा, "उधर मत ज्जा !" और उसे गोद में उठा लिया, वह मचलने लगा और चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगा ।

महेश्वर बोले, "अब रो-रो कर सो जाएगा, तभी घर में चैन होगी ।"

मैंने पूछा, "आप लोग भीतर ही सोते हैं ? गरमी तो बहुत होती है ?"

"होने को तो मच्छर भी बहुत होते हैं, पर यह लोहे के पलंग उठाकर बाहर कौन ले जाए ? अब के नीचे जाएँगे तो चारपाइयाँ ले आएँगे ।" फिर कुछ रुककर बोले, "आज तो बाहर ही सोएँगे । आपके आने का इतना लाभ ही होगा ।"

टिटी अभी तक रोता ही जा रहा था । महेश्वर ने उसे एक पलंग पर बैठा दिया, और पलंग बाहर खींचने लगे, मैंने कहा, "मैं मदद करता हूँ", और दूसरी ओर से पलंग उठाकर निकलवा दिए ।

अब हम तीनों-महेश्वर, टिटी और मैं-दो पलंगों पर बैठ गए और वार्तालाप के लिए उपयुक्त विषय न पाकर उस कमी को छुपाने के लिए टिटी से खेलने लगे । बाहर आकर वह कुछ चुप हो गया था, किंतु बीच-बीच में जैसे एकाएक कोई भूला हुआ कर्त्तव्य याद करके रो उठता था, और फिर एकदम चुप हो जाता था….और कभी-कभी हम हँस पड़ते थे, या महेश्वर उसके बारे में कुछ बात कह देते थे ।

मालती बरतन धो चुकी थी। जब वह उन्हें लेकर आँगन के एक ओर रसोई के छप्पर की ओर चली, तब महेश्वर ने कहा, 'थोड़े से आम लाया हूँ, वह भी धो लेना ।"

"कहाँ हैं ?"

"अँगीठी पर रखे हैं, कागज में लिपटे हुए ।"

मालती ने भीतर जाकर आम उठाए और अपने आँचल में डाल लिए। जिस कागज में वे लिपटे हुए थे, वह किसी पुराने अखबार का टुकड़ा था । मालती चलती-चलती संध्या के उस क्षीण प्रकाश में उसी को पढ़ती जा रही थी…. वह नल के पास जाकर खड़ी उसे पढ़ती रही । जब दोनों ओर पढ़ चुकी, तब एक लंबी साँस लेकर उसे फेंककर आम धोने लगी ।

मुझे एकाएक याद आया….. बहुत दिनों की बात थी…. जब हम अभी स्कूल में भरती हुए ही थे । जब हमारा सबसे बड़ा सुख, सबसे बड़ी विजय थी हाजिरी हो चुकने के बाद चोरी से क्लास से निकल भागना और स्कूल से कुछ दूरी पर आम के बगीचे में पेड़ों पर चढ़कर कच्ची अमियाँ तोड़-तोड़ खाना । मुझे याद आता….कभी जब मैं भाग आता और मालती नहीं आ पाती थी तब मैं भी खिन्न-मन लौट आया करता था ।

मालती कुछ नहीं पढ़ती थी, उसके माता-पिता तंग थे, एक दिन उसके पिता ने उसे एक पुस्तक लाकर दी और कहा कि इसके बीस पेज रोज पढ़ा करो, हफ्ते भर बाद मैं देखूँ कि इसे समाप्त कर चुकी हो, नहीं तो मार-मार कर चमड़ी उधेड़ दूँगा : मालती ने चुपचाप किताब ले ली, पर क्या उसने पढ़ी ? वह नित्य ही उसके दस पन्ने, बीस पेज, फाड़कर फेंक देती, अपने खेल में किसी भाँति फर्क न पड़ने देती । जब आठवें दिन उसके पिता ने पूछा, "किताब समाप्त कर ली ?" तो उत्तर दिया, "हाँ कर ली," पिता ने कहा, "लाओ मैं प्रश्न पूहूँगा," तो चुप खड़ी रही । पिता ने फिर कहा, तो उद्धत स्वर में बोली,

"किताब मैंने फाड़कर फेंक दी है, मैं नहीं पढ़ेंगी ।"

उसके बाद वह बहुत पिटी, पर वह अलग बात है। इस समय मैं यही सोच रहा था कि वही उद्धत और चंचल मालती आज कितनी सीधी हो गई है, कितनी शांत, और एक अखबार के टुकड़े को तरसती है… यह क्या, यह…..

तभी महेश्वर ने पूछा, "रोटी कब बनेगी ?" "बस अभी बनाती हूँ।"

पर अबकी बार जब मालती रसोई की ओर चली, तब टिटी की कर्त्तव्यभावना बहुत विस्तीर्ण हो गई, वह मालती की ओर हाथ बढ़ाकर रोने लगा और नहीं माना, मालती उसे गोद में लेकर चली गई, रसोई में बैठकर एक हाथ से उसे थपकने और दूसरे से कई एक छोटे-छोटे डिब्बे उठाकर अपने सामने रखने लगी…..

और हम दोनों चुपचाप रात्रि की, और भोजन की, और एक दूसरे से कुछ कहने की, और न जाने किस-किस न्यूनता की पूर्ति की प्रतीक्षा करने लगे ।

हम भोजन कर चुके थे और बिस्तरों पर लेट गए थे और टिटी सो गया था । मालती पलंग के एक ओर मोमजामा बिछाकर उसे उसपर लिटा गई थी। वह सो गया था, पर नींद में कभी-कभी चौंक उठता था । एक बार तो उठकर बैठ भी गया था, पर तुरंत ही लेट गया ।

मैंने महेश्वर से पूछा- "आप तो थके होंगे, सो जाइए ।"

बह बोले, "थके तो आप अधिक होंगे…. अठारह मील पैदल चलकर आए हैं ।" किंतु उनके स्वर ने मानो जोड़ दिया…" थका तो मैं भी हूँ।"

मैं चुप रहा, थोड़ी देर में किसी अपर संज्ञा ने मुझे बताया, वह ऊँघ रहे हैं । तब लगभग साढ़े दस बजे थे, मालती भोजन कर रही थी ।

मैं थोड़ी देर मालती की ओर देखता रहा, वह किसी विचार में- यद्यपि बहुत गहरे विचार में नहीं, लीन हुई धीरे-धीरे खाना खा रही थी, फिर मैं इधर-उधर खिसककर, पर आराम से होकर, आकाश की ओर देखने लगा ।

पूर्णिमा थी, आकाश अनभ्र था ।

मैंने देखा, उस सरकारी क्वार्टर की, दिन में अत्यंत शुष्क और नीरस लगने वाली स्लेट की छत भी चाँदनी में चमक रही है, अत्यंत शीतलता और स्निग्धता से छलक रही है, मानो चंद्रिका उसपर से बहती हुई आ रही हो, झर रही हो…..

मैंने देखा, पवन में चीड़ के वृक्ष… गरमी से सूखकर मटमैले हुए चीड़ के वृक्ष धीरे-धीरे गा रहे हों… कोई राग जो कोमल है, किंतु करुण नहीं, अशांतिमय है, किंतु उद्वेगमय नहीं….

मैंने देखा, प्रकाश से धुँधले नीले आकाश के पट पर जो चमगादड़ नीरव उड़ान से चक्कर काट रहे हैं, वे भी सुंदर दीखते हैं……

मैंने देखा, …. दिन भर की तपन, अशांति, थकान, दाह, पहाड़ों में से भाप से उठकर वातावरण में खोए जा रहे हैं, जिसे ग्रहण करने के लिए पर्वत-शिशुओं ने अपनी चीड़ वृक्षरूपी भुजाएँ आकाश की ओर बढ़ा रखी हैं…..

पर यह सब मैंने ही देखा, अकेले मैंने…. महेश्वर ऊँघ रहे थे और मालती उस समय भोजन से निवृत्त होकर दही जमाने के लिए मिट्टी का बर्तन गरम पानी से धो रही थी, और कह रही थी…. "अभी छुट्टी हुई जाती है।" मेरे कहने पर ही कि "ग्यारह बजने वाले हैं," धीरे से सिर हिलाकर बता रही थी कि रोज ही इतने बज जाते हैं…. मालती ने वह सब कुछ नहीं देखा, मालती का जीवन अपनी रोज की नियत गति से बहा जा रहा था और एक चंद्रमा की चंद्रिका के लिए, एक संसार के लिए, रुकने को तैयार नहीं था ।

चाँदनी में शिशु कैसा लगता है, इस अलस जिज्ञासा से मैंने टिटी की ओर देखा और वह एकाएक मानो किसी शैशवोचित वामता से भर उठा और खिसककर पलंग से नीचे गिर पड़ा और चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगा । महेश्वर ने चौंक कर कहा…. "क्या हुआ ?" मैं झपटकर उसे उठाने दौड़ा, मालती रसोई से बाहर निकल आई, मैंने उस 'खट्' शब्द को याद करके धीरे से करुणा भरे स्वर में कहा, "चोट बहुत लग गई है बेचारे को ।"

यह सब मानो एक ही क्षण में, एक ही क्रिया की गति में हो गया ।

मालती ने रोते हुए शिशु को मुझसे लेने के लिए हाथ बढ़ाते हुए कहा, "इसके चोटें लगती ही रहती हैं, रोज ही गिर पड़ता है ।"

एक छोटे क्षण भर के लिए मैं स्तब्ध हो गया, फिर एकाएक मेरे मन ने, मेरे समूचे अस्तित्व ने विद्रोह के स्वर में कहा- मेरे मन के भीतर ही, बाहर एक शब्द भी नहीं निकला- "माँ, युवती माँ, यह तुम्हारे हृदय को क्या हो गया है, जो तुम अपने एकमात्र बच्चे के गिरने पर ऐसी बात कह सकती हो-और यह अभी, जब तुम्हारा सारा जीवन तुम्हारे आगे है !"

और तब एकाएक मैंने जाना कि वह भावना मिथ्या नहीं है, मैंने देखा कि सचमुच उस कुटुंब में कोई गहरी भयंकर छाया घर कर गई है, उनके जीवन के इस पहले ही यौवन में घुन की तरह लग गई है, उसका इतना अभिन्न अंग हो गई है कि वे उसे पहचानते ही नहीं, उसी की परिधि में घिरे हुए चले जा रहे हैं । इतना ही नहीं, मैंने उस छाया को देख भी लिया…

इतनी देर में, पूर्ववत शांति हो गई थी । महेश्वर फिर लेटकर ऊँघ रहे थे । टिटी मालती के लेटे हुए शरीर से चिपक कर चुप हो गया था, यद्यपि कभी एक-आध सिसकी उसके छोटे से शरीर को हिला देती थी । मैं भी अनुभव करने लगा था कि बिस्तर अच्छा सा लग रहा है । मालती चुपचाप आकाश में देख रही थी, किंतु क्या चंद्रिका को या तारों को ?

तभी ग्यारह का घंटा बजा, मैंने अपनी भारी हो रही पलकें उठाकर अकस्मात् किसी अस्पष्ट प्रतीक्षा में मालती की ओर देखा । ग्यारह के पहले घंटे की खड़कन के साथ ही मालती की छाती एकाएक फफोले की भाँति उठी और धीरे-धीरे बैठने लगी, और घंटा-ध्वनि के कंपन के साथ ही मूक हो जानेवाली आवाज में उसने कहा, "ग्यारह बज गए….."

🕒 रोज (Gangrene) — मुख्य सारांश ​

यह कहानी आधुनिक हिंदी साहित्य के महान शिल्पी सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' द्वारा लिखी गई है। इसमें एक मध्यमवर्गीय विवाहित नारी (मालती) के जीवन की एकतानता, ऊब और यांत्रिक दिनचर्या का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है।


📌 मुख्य बिंदु और महत्वपूर्ण बातें (Key Highlights) ​

  • 🏚️ शाप की छाया जैसा माहौल: जब लेखक (मालती का दूर के रिश्ते का भाई/सखा) चार साल बाद उससे मिलने उसके घर पहुँचता है, तो उसे पूरे घर और आँगन के वातावरण में एक अकथ्य, बोझल और घना सन्नाटा महसूस होता है, मानो वहाँ किसी शाप की छाया मँडरा रही हो।
  • 🤖 मशीन जैसा यांत्रिक जीवन: मालती का जीवन घड़ी के कांटों पर चलता है। वह दिन भर केवल बर्तन मांजने, खाना बनाने, पानी का इंतजार करने और बच्चे को संभालने में व्यस्त रहती है। जब भी घड़ी बजती है (जैसे तीन, चार या रात के ग्यारह), तो वह एक लंबी थकी हुई सांस लेकर कहती है—"इतने बज गए"। उसका जीवन समय गिनने वाली एक मशीन बन चुका है।
  • 👨‍⚕️ महेश्वर और गैंग्रीन का प्रकोप: मालती के पति महेश्वर एक सरकारी डिस्पेंसरी में डॉक्टर हैं। उनका जीवन भी पूरी तरह ढर्रे पर चल रहा है—रोज वही मरीज, वही दवाइयाँ। वे रोज अस्पताल में 'गैंग्रीन' (कांटा चुभने से होने वाला खतरनाक जख्म) के मरीजों के हाथ-पैर काटते हैं। यह 'गैंग्रीन' केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि उनके नीरस और संवेदनहीन हो चुके जीवन का प्रतीक है।
  • 👶 चिड़चिड़ा शिशु (टिटी): मालती और महेश्वर का एक छोटा बच्चा है जिसका नाम 'टिटी' है। वह हमेशा रोता और चिड़चिड़ा रहता है। एक बार वह पलंग से नीचे गिर जाता है और बुरी तरह चिल्लाने लगता है, लेकिन मालती संवेदनहीन होकर कहती है—"इसके चोटें लगती ही रहती हैं, रोज ही गिर पड़ता है"। यह बात लेखक के भीतर तक को झकझोर देती है।
  • 💔 चंचलता का अंत: लेखक याद करता है कि बचपन में मालती कितनी चंचल, जिद्दी और पढ़ाई से भागने वाली लड़की थी, जिसने अपने पिता द्वारा दी गई किताब के पन्ने फाड़कर फेंक दिए थे। लेकिन आज वही मालती संध्या के क्षीण प्रकाश में आम लिपटे हुए एक पुराने अखबार के टुकड़े को तरसती है और उसे बहुत ध्यान से पढ़ती है। उसकी सारी चंचलता और खुशियाँ वैवाहिक जीवन के बोझ तले दब चुकी हैं।

💡 प्रेरणादायक निष्कर्ष और व्याख्या (Inspirational Conclusion & Explanation) ​

'रोज' कहानी हमें यह गहरी सीख देती है कि जीवन का असली मतलब केवल सांस लेना या रोज़मर्रा के कामों को एक मशीन की तरह पूरा करना नहीं है। उत्साह, नवीनता और मानसिक स्वतंत्रता के बिना जीवन मृतप्राय हो जाता है। मालती का चरित्र हमें सचेत करता है कि घरेलू जिम्मेदारियों के बीच कभी भी अपनी आंतरिक जीवंतता, चंचलता और इच्छाओं को मरने नहीं देना चाहिए। यह समाज के लिए भी एक कड़ा संदेश है कि नारी को केवल घर की चारदीवारी और अंतहीन घरेलू कामों में कैद करके उसकी आत्मा को 'गैंग्रीन' की तरह सड़ने न दिया जाए; बल्कि उसे भी खुलकर जीने का आकाश मिले! 🌟✨


📝 एक पैराग्राफ में संक्षिप्त सारांश (One-Paragraph Summary) ​

🕒 'अज्ञेय' जी द्वारा रचित 'रोज' (गैंग्रीन) कहानी एक विवाहित नारी मालती के माध्यम से घरेलू जीवन की नीरसता, ऊब और घुटन का सजीव चित्रण करती है। बचपन में अत्यंत चंचल और अल्हड़ रही मालती विवाह के मात्र दो वर्षों के भीतर ही घड़ी की सुइयों पर नाचने वाली एक संवेदनहीन और यांत्रिक कठपुतली बनकर रह गई है, जिसका पूरा दिन केवल रोते हुए बच्चे 'टिटी' को संभालने, पानी का इंतजार करने और रसोई के अंतहीन कामों में ही बीत जाता है। उसके डॉक्टर पति महेश्वर द्वारा डिस्पेंसरी में रोज 'गैंग्रीन' के मरीजों के अंग काटना और खुद मालती का एक पुराने अखबार के टुकड़े को पढ़ने के लिए तरसना यह दर्शाता है कि इस पूरे परिवार के जीवन में एक भयंकर और उदास छाया घर कर गई है; यह मार्मिक कहानी हमें याद दिलाती है कि बिना नवीनता, संवाद और खुशियों के इंसान का जीवन एक नीरस मशीन की तरह बनकर रह जाता है। 🌾

Short Story ​

रोज ​

दोपहर के समय जब मैंने मालती के सूने आँगन में पैर रखा, तो मुझे ऐसा जान पड़ा मानो उस पर किसी शाप की छाया मँडरा रही हो. वहाँ एक अजीब, बोझिल और प्रकंपमय सन्नाटा पसरा हुआ था. मालती मेरे दूर के रिश्ते की बहन थी, पर हमारा संबंध एक सखी जैसा था, जिसके साथ मैंने बचपन में स्वच्छंदता के दिन बिताए थे. चार साल बाद आज मैं उसे देखने आया था. वह अब विवाहित थी और एक बच्चे की माँ भी.

मेरी आहट पाकर मालती बाहर आई. मुझे देखकर उसके चेहरे पर एक फीकी सी मुस्कान जागी और फिर गायब हो गई. उसने बताया कि उसके पति महेश्वर दफ्तर गए हैं और दोपहर के डेढ़-दो बजे तक आएँगे. मालती ने मेरे मना करने के बाद भी पंखा झलना शुरू किया, पर तभी दूसरे कमरे से उसके बच्चे 'टिटी' के रोने की आवाज आई और वह चुपचाप पंखा मुझे सौंपकर भीतर चली गई. उसे जाते देख मैं सोचने लगा कि इस घर पर और विशेष रूप से मालती पर यह कैसी छाया छाई हुई है!

थोड़ी देर बाद मालती बच्चे को लेकर लौटी और दरी पर बैठ गई. हमारे बीच एक असहज मौन पसरा रहा. उसने मुझसे यह भी नहीं पूछा कि मैं कैसा हूँ या कैसे आया हूँ. जब मैंने खिन्न होकर कहा कि तुम्हें मेरे आने से प्रसन्नता नहीं हुई, तो वह चौंक उठी. उसकी आँखों में एक अजीब सी छटपटाहट थी, मानो वह अपने भीतर किसी बीते हुए अतीत को जगाने की असफल चेष्टा कर रही हो.

तभी किवाड़ खटखटाने पर मालती के पति महेश्वर आए. परिचय हुआ। महेश्वर एक पहाड़ी गाँव की सरकारी डिस्पेंसरी में डॉक्टर थे. उनका जीवन भी एक निर्दिष्ट ढर्रे पर चलता था—नित्य वही मरीज, वही दवाइयाँ और वही नुस्खे. दोपहर के ढाई बजे जब महेश्वर खाना खाने बैठे, तो पता चला कि मालती हमेशा उनके बाद ही खाना खाती है और रोज ही तीन बज जाते हैं. खाना खाते समय महेश्वर ने बताया कि उन्हें आज अस्पताल में गैंग्रीन के दो मरीजों का ऑपरेशन कर उनकी टाँग काटनी पड़ सकती है. दोपहर के ठीक तीन बजे जब महेश्वर वापस चले गए, तो आँगन में बैठी मालती ने एक लंबी, थकी हुई साँस के साथ कहा, "तीन बज गए…" मानो बड़ी तपस्या के बाद कोई यंत्रवत् कार्य संपन्न हुआ हो.

शाम के चार बजे जब घड़ी बजी, तो मालती ने फिर उसी नीरस, अनुभूतिविहीन और यंत्रवत् स्वर में कहा, "चार बज गए". उसका जीवन बस इसी तरह समय गिनने में बीत रहा था. शाम को महेश्वर लौटे, तो उनके साथ मेरा कुली भी सामान लेकर आया. तभी आँगन के नल से पानी टपकने लगा—'टिप्-टिप्'. मालती पानी आते ही बरतन धोने चली गई क्योंकि पानी केवल वक्त पर ही आता था.

रात को महेश्वर जब कुछ आम लेकर आए, जो एक पुराने अखबार के टुकड़े में लिपटे थे, तो मालती संध्या के धुंधले प्रकाश में उस अखबार के पन्ने को बड़ी उत्सुकता से दोनों ओर से पढ़ने लगी. उसे देखकर मुझे उसका बचपन याद आ गया, जब उसके पिता ने उसे एक किताब पढ़ने को दी थी, तो उसने उसके पन्ने फाड़कर फेंक दिए थे और पढ़ने से साफ मना कर दिया था. आज वही चंचल मालती एक अखबार के टुकड़े के लिए तरस रही थी.

रात के भोजन के बाद जब हम बाहर पलंग पर लेटे थे, तो पूर्णिमा की सुंदर चाँदनी बिखरी हुई थी. प्रकृति शांत और स्निग्ध थी, पर मालती इन सब से दूर अपने काम में व्यस्त थी. अचानक पलंग से गिरकर टिटी चिल्लाकर रोने लगा. मालती ने उसे गोद में लेते हुए रुखेपन से कहा, "इसके चोटें लगती ही रहती हैं, रोज ही गिर पड़ता है।" माँ के इस ममत्वहीन और यांत्रिक व्यवहार ने मुझे भीतर तक झकझोर दिया. मुझे साफ़ दिखने लगा कि इस परिवार के जीवन में एक भयंकर और गहरी छाया घर कर गई है.

तभी रात के ग्यारह बजे. ग्यारह के पहले घंटे की खड़कन के साथ मालती की छाती फफोले की तरह उठी और धीरे से बैठ गई. उसने अत्यंत मूक और थके हुए स्वर में कहा, "ग्यारह बज गए….." और कहानी इसी घुटन और नीरसता के साथ समाप्त हो गई.


Story Highlights ​

  • मुख्य पात्र:
    • लेखक (अतिथि): मालती के बचपन का सखा और दूर का भाई, जो चार साल बाद उससे मिलने पहाड़ी गाँव आता है और उसके जीवन के बदलाव को महसूस करता है.
    • मालती: कहानी की मुख्य पात्रा, जो बचपन में चंचल और स्वच्छंद थी, परंतु विवाह के बाद एक नीरस, यांत्रिक और थका देने वाले घरेलू जीवन में कैद हो चुकी है.
    • महेश्वर: मालती का पति, जो एक पहाड़ी सरकारी डिस्पेंसरी में डॉक्टर है और उसका स्वयं का जीवन भी एक तयशुदा ढर्रे और गैंग्रीन जैसी बीमारियों के इलाज तक सीमित है.
    • टिटी: मालती और महेश्वर का छोटा बच्चा, जो हमेशा चिड़चिड़ा रहता है और रोता रहता है.
  • कहानी का परिवेश: एक सुदूर पहाड़ी गाँव का सरकारी क्वार्टर, जहाँ का वातावरण अत्यंत शुष्क, सूना, बोझिल और सन्नाटे से भरा हुआ है.
  • मुख्य संघर्ष: मालती के भीतर का मानसिक और भावनात्मक संघर्ष, जहाँ उसका अतीत का जीवंत और चंचल स्वभाव वर्तमान के उबाऊ, नीरस और मशीन जैसे बंधनों में घुट रहा है.
  • मुख्य घटनाएँ:
    • लेखक का चार वर्ष बाद मालती के घर पहुँचना और वहाँ के वातावरण में शाप जैसी छाया महसूस करना.
    • मालती का अपने सखा से मिलने पर भी अत्यधिक मौन और उदासीन रहना.
    • डॉक्टर महेश्वर का आना, दोपहर का भोजन करना और अस्पताल में गैंग्रीन के कारण टाँग काटने के केसों के बारे में बताना.
    • मालती द्वारा दिन भर समय बीतने पर घड़ियों के घंटों को एक थकी हुई साँस के साथ गिनना (तीन, चार और रात के ग्यारह बजाना).
    • शाम को अखबार के टुकड़े में लिपटे आम आने पर मालती का उस कागज को अत्यंत उत्सुकता से पढ़ना, जो उसके अतीत की याद दिलाता है.
    • बच्चे का पलंग से गिर जाना और मालती का बेहद असंवेदनशील और सामान्य व्यवहार दिखाना.
  • चरम बिंदु (Climax): टिटी का पलंग से नीचे गिरना और मालती का यह कहना कि "इसके चोटें लगती ही रहती हैं, रोज ही गिर पड़ता है।" यह क्षण दिखाता है कि वह भावनाओं के स्तर पर कितनी सुन्न हो चुकी है।
  • समाधान/अंत: रात के ग्यारह बजने पर मालती का एक गहरी, दर्दभरी साँस लेकर यंत्रवत् कहना कि "ग्यारह बज गए", जो यह दर्शाता है कि यह अंतहीन घुटन उसके जीवन का रोज का ढर्रा बन चुकी है।
  • मुख्य विषय: मध्यवर्गीय वैवाहिक जीवन की एकरसता, नीरसता, अकेलापन और घरेलू काम के बोझ तले दबकर एक स्त्री के व्यक्तित्व और उसकी इच्छाओं का धीरे-धीरे मर जाना.

Main Character Analysis ​

  • मालती: वह कहानी की केंद्रीय पात्रा है. विवाह से पूर्व वह एक चंचल, उद्धत, स्वच्छंद और पढ़ाई से जी अनुराने वाली लड़की थी, जिसने अपने पिता द्वारा दी गई किताब के पन्ने तक फाड़ दिए थे. परंतु विवाह के मात्र दो वर्षों के भीतर और एक बच्चे की माँ बनने के बाद वह पूरी तरह बदल चुकी है. वर्तमान में उसका स्वभाव अत्यंत नीरस, उदास, मौन और यांत्रिक हो गया है. वह अपने घर के काम, बर्तन मांजने, पानी का इंतजार करने और पति व बच्चे की देखभाल में इस कदर खो चुकी है कि उसकी अपनी कोई भावनाएँ या इच्छाएँ शेष नहीं बची हैं. यहाँ तक कि अपने एकमात्र बच्चे के बिस्तर से गिरने पर भी वह कोई ममता या घबराहट नहीं दिखाती, बल्कि इसे एक रोज का काम मानती है. वह समय के बीतने को एक थकी हुई मशीन की तरह गिनती है. उसका यह रूप दिखाता है कि कैसे एकरसता और अकेलेपन ने उसकी जीवंतता को पूरी तरह सोख लिया है.
  • महेश्वर: वह मालती का पति है और एक पहाड़ी गाँव के सरकारी अस्पताल में डॉक्टर है. महेश्वर स्वभाव से गंभीर और अपने काम के प्रति समर्पित है, परंतु उसका अपना जीवन भी एक बेहद कड़े और नीरस ढर्रे पर चलता है. रोज सुबह सात बजे जाना, दोपहर में आना, आराम करना और शाम को फिर रोगियों को देखना ही उसकी दिनचर्या है. उसके बात करने के विषय भी डिस्पेंसरी, मरीज और ऑपरेशनों (जैसे गैंग्रीन के कारण टाँग काटना) तक ही सीमित हैं. वह घर के इस घुटनभरे माहौल से अभ्यस्त हो चुका है और फुरसत के समय में सुस्त रहता है. वह मालती के देर से खाना खाने की आदत को सहजता से लेता है, जो दिखाता है कि वह भी इस यांत्रिक जीवन का एक हिस्सा बन चुका है.
  • लेखक (अतिथि): वह मालती के बचपन का मित्र और दूर का भाई है. वह संवेदनशील, तीक्ष्ण दूरदृष्टि रखने वाला और मालती की भलाई चाहने वाला व्यक्ति है. वह चार साल बाद मालती से मिलने आता है और घर में कदम रखते ही वहाँ व्याप्त अवसाद और नीरसता को तुरंत पहचान लेता है. पूरी कहानी में वह एक मूक दर्शक और विश्लेषक की भूमिका निभाता है, जो मालती के हर एक हाव-भाव, उसकी चुप्पी और समय गिनने की आदत का बारीकी से निरीक्षण करता है. वह मालती की स्थिति पर गहरा दुःख और विद्रोह महसूस करता है, पर सामाजिक मर्यादाओं और परिस्थितियों के आगे वह भी खुद को असहाय पाता है.

Inspirational Conclusion and Interpretation ​

कहानी का अंत अत्यंत मार्मिक और विचारणीय है, जहाँ रात के ग्यारह बजने पर मालती एक बेहद थकी हुई और मूक आवाज में कहती है, "ग्यारह बज गए….."। यह अंत दिखाता है कि मालती का जीवन किसी प्रेरणा या उत्साह से नहीं, बल्कि घड़ियों की टिक-टिक और बंधे-बंधाए घरेलू कामों के यांत्रिक चक्र से संचालित हो रहा है, जिसमें कोई बदलाव संभव नहीं दिख रहा है। लेखक इस बात को रेखांकित करता है कि वैवाहिक जीवन के शुरुआती वर्षों में ही इस परिवार पर एक ऐसी भयंकर छाया मंडरा रही है, जो इनकी खुशियों और जीवंतता को घुन की तरह खा रही है।

इस कहानी से यह गंभीर सीख मिलती है कि मनुष्य के जीवन में केवल कर्तव्यों और कार्यों का एकरस ढर्रा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य, आपसी संवाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी उतनी ही आवश्यक हैं। मालती के संघर्ष और उसकी चुप्पी से हमें यह सीखने को मिलता है कि जब किसी व्यक्ति की रचनात्मकता, पढ़ने-लिखने की रुचि और सामाजिक संबंध पूरी तरह कट जाते हैं, तो उसका अस्तित्व एक जीवित लाश की तरह बन जाता है। वास्तविक जीवन में यह कहानी हमें सचेत करती है कि हमें अपने रिश्तों और दिनचर्या में ठहराव या नीरसता को इस हद तक हावी नहीं होने देना चाहिए कि हमारी मानवीय संवेदनाएँ और खुशियाँ ही समाप्त हो जाएँ। रिश्तों को जीवंत रखने के लिए एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता और जीवन में थोड़े उत्साह का होना बेहद जरूरी है।


Simple Explanation of the Story ​

यह कहानी एक मध्यमवर्गीय विवाहित स्त्री, मालती के जीवन के अकेलेपन, नीरसता और अंतहीन घरेलू काम की एकरसता को दर्शाती है. लेखक, जो मालती के बचपन का सखा है, चार साल बाद उससे मिलने उसके पहाड़ी सरकारी क्वार्टर में आता है. वह देखता है कि जो मालती बचपन में अत्यंत चंचल, बातूनी और चुलबुली थी, वह शादी के मात्र दो साल बाद एक रोते रहने वाले बच्चे की माँ बनकर पूरी तरह शांत और मशीन जैसी हो गई है. उसका पूरा दिन केवल पति के दफ्तर जाने, बर्तन मांजने, पानी का इंतजार करने और घड़ियों के घंटे गिनने में बीतता है.

पात्रों के कार्यों के पीछे का अर्थ यह है कि वे सभी परिस्थितिजन्य बंधनों के शिकार हो चुके हैं। महेश्वर डिस्पेंसरी और मरीजों के ढर्रे में फंसा है, तो मालती घर की चारदीवारी में. जब मालती एक अखबार के टुकड़े को चाव से पढ़ती है या बच्चे के गिरने पर संवेदनाहीन व्यवहार करती है, तो यह दिखाता है कि वह बाहरी दुनिया और अपनी भावनाओं से कितनी कट चुकी है. कहानी का निष्कर्ष यह है कि बिना किसी बदलाव या खुशियों के, रोज़ एक ही ढर्रे पर जीने से इंसान भीतर से बिल्कुल खोखला और भावनाशून्य हो जाता है.

Main Purpose ​

इस कहानी का मुख्य उद्देश्य मध्यवर्गीय विवाहित नारी के जीवन में व्याप्त गहरे अकेलेपन, नीरसता और घरेलू जिम्मेदारियों के बोझ तले उसकी इच्छाओं के दम तोड़ने की व्यथा को उजागर करना है। लेखक मालती के यांत्रिक जीवन और उसके मौन के माध्यम से समाज को यह दिखाना चाहता है कि कैसे एकरस दिनचर्या किसी व्यक्ति की जीवंतता और मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह समाप्त कर देती है। इसके अतिरिक्त, कहानी का उद्देश्य वैवाहिक जीवन के उस पारंपरिक ढर्रे पर चोट करना है जो स्त्री को केवल घर के काम और समय गिनने वाली मशीन बनाकर छोड़ देता है।

Main Message ​

इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि जीवन में बिना किसी उत्साह, संवाद और रचनात्मकता के केवल कर्तव्यों का निर्वाह करना मनुष्य को एक मशीन या जीवित लाश की तरह बना देता है. मालती और महेश्वर के ढर्रे पर चल रहे जीवन के माध्यम से लेखक यह समझाना चाहता है कि रिश्तों और जीवन में संवेदनाओं को बचाए रखने के लिए एकरसता को तोड़ना बेहद जरूरी है। यह कहानी हमें संदेश देती है कि किसी भी इंसान, विशेषकर एक माँ और पत्नी की खुशियों व उसकी मानसिक स्वतंत्रता को घरेलू बंधनों की बलिवेदी पर होम नहीं होने देना चाहिए।

Brief Summary of the Story ​

'रोज' कहानी में लेखक चार वर्ष बाद अपनी बचपन की सखी मालती से मिलने उसके पहाड़ी गाँव स्थित सरकारी क्वार्टर में जाता है. वह देखता है कि बचपन की चंचल और अल्हड़ मालती अब विवाह के बाद एक नीरस, उदास और मशीन जैसी घरेलू स्त्री में बदल चुकी है. उसके पति महेश्वर एक सरकारी डॉक्टर हैं, जिनका स्वयं का जीवन भी डिस्पेंसरी और ऑपरेशनों के एक तय ढर्रे पर चलता है. मालती का पूरा दिन चिड़चिड़े बच्चे को संभालने, बर्तन धोने और पानी का इंतजार करते हुए घड़ी के घंटे (तीन, चार और ग्यारह) गिनने में बीतता है. यहाँ तक कि बच्चे के पलंग से गिरने पर भी वह कोई ममत्व या घबराहट नहीं दिखाती. कहानी का अंत रात के ग्यारह बजने पर मालती की एक थकी हुई साँस के साथ होता है, जो यह स्पष्ट करता है कि एक भयंकर और गहरी नीरसता की छाया ने इस परिवार की खुशियों को पूरी तरह निगल लिया है.

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Class 11 Chemistry Chapter 1 Important Questions Hindi

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JEE Main, NDA, CBSE, BSEB, UP, PYQ, Sample Questions, Model Paper Question द्रव्य के गुणधर्म और उनका मापन (Properties of Matter and their Measurement) मापन में अनिश्चितता (Uncertainty in Measurement) परमाणु द्रव्यमान और आण्विक द्रव्यमान (Atomic and Molecular Masses) मोल-संकल्पना और मोलर द्रव्यमान (Mole Concept and Molar Masses) प्रतिशत संघटन (Percentage Composition) स्टॉइकियोंमीट्री और स्टॉइकियोंमीट्रिक परिकलन (Stoichiometry and Stoichiometric Calculations) 📝 निष्कर्ष (Conclusion) द्रव्य के गुणधर्म और उनका मापन (Properties of Matter and their Measurement) ​ 1995 प्रश्‍न 1 : दाब के विमा समान है- बल प्रति इकाई आयतन ऊर्जा प्रति इकाई आयतन बल ऊर्जा उत्तर : सही विकल्प () है। मापन में अनिश्चितता (Uncertainty in Measurement) ​ 1998 प्रश्‍न 2 : 161 cm, 0.161 cm तथा 0.0161 cm के लिए सार्थक संख्याएँ हैं- क्रमशः 3, 4 और 5 क्रमशः 3, 4 और 4 क्रमशः 3, 3 और 4 क्रमशः 3, 3 और 3 उत्तर : सही विकल्प () है। 2014 प्रश्‍न 3 : समान द्रव्यमान में H₂, O₂ और मिथेन को एक आयतन V के पात्र में 27°C पर समान परिस्थि...
By Guddu Kumar
निबंध-लेखन: Hindi Grammar Essay Format for BSEB & CBSE

निबंध-लेखन: Hindi Grammar Essay Format for BSEB & CBSE

✍️ 25. निबंध-लेखन (Essay Writing) ​ यह अध्याय BSEB (कक्षा 9, 10, 11, 12), CBSE, State Boards और अन्य सभी अकादमिक परीक्षाओं के लेखन खंड (Writing Section) का सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा अंक दिलाने वाला विषय है। बोर्ड परीक्षाओं में यह प्रश्न प्रायः 8 से 10 अंकों के लिए पूछा जाता है। इस डिजिटल नोट्स में दी गई संरचना और ब्रह्मास्त्र ट्रिक्स की मदद से आप निबंध में अधिकतम अंक सुनिश्चित कर सकते हैं। CBSE, BSEB, UP, PYQ, Sample Questions, Model Paper Question ✍️ 25. निबंध-लेखन (Essay Writing) 🗺️ निबंध-लेखन का मास्टर माइंड मैप 🏗️ ① निबंध के तीन मुख्य स्तम्भ (The Ideal 3-Step Structure) 🧲 Ⓐ प्रस्तावना / भूमिका (Introduction) 📈 Ⓑ विषय-विस्तार (Body of the Essay) 🏁 Ⓒ उपसंहार (Conclusion) ⚙️ ② परीक्षा में पूरे अंक पाने के 5 सुनहरे नियम (Golden Rules) 📝 ③ लाइव मॉडल उदाहरण (Live Model Essay Segment) Bihar Board Class 12 Science PYQ 1. कोई अविस्मरणीय घटना 2. मेरा भारत महान् 3. पर्यटन का महत्व 4. मेरे प्रिय कवि 5. शहरी जीवन 6. यदि मैं प्रधानमंत्री हो जाऊँ 7. मेरे सपनों का भारत 8. भ्रष्टाचार का दान...
By Guddu Kumar

हिंदी व्याकरण Ch 2 Important Questions & PYQ नोट्स

1. शब्द Bihar Board - Class 10 Bihar Board - Class 10 PYQ Bihar Board - Class 12 Science - शब्द/वाक्य Bihar Board - Class 12 Science PYQ Bihar Board - Class 12 Arts Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 2. संज्ञा Bihar Board - Class 10 PYQ Bihar Board - Class 12 Science PYQ Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 3. लिंग Bihar Board - Class 10 PYQ Bihar Board - Class 12 Science PYQ Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 4. वचन Bihar Board - Class 10 PYQ Bihar Board - Class 12 Science PYQ Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 5. कारक Bihar Board - Class 10 PYQ Bihar Board - Class 12 Science PYQ Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 6. सर्वनाम Bihar Board - Class 10 PYQ Bihar Board - Class 12 Science PYQ Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 7. विशेषण Bihar Board - Class 10 PYQ Bihar Board - Class 12 Science PYQ Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 8. क्रिया Bihar Board - Class 10 PYQ Bihar Board - Class 12 Science PYQ Bihar Board - Class 12 Arts PYQ 9. वाच्य Bihar Board - Class 10 PYQ 10. काल Bihar Board - Class 10 PYQ Bihar Boar...
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